Important Announcement
PubHTML5 Scheduled Server Maintenance on (GMT) Sunday, June 26th, 2:00 am - 8:00 am.
PubHTML5 site will be inoperative during the times indicated!

Home Explore Vol.1 , issue 6, August 2015, special issue

Vol.1 , issue 6, August 2015, special issue

Published by jankritipatrika, 2020-09-27 15:37:23

Description: Vol.1 , issue 6, August 2015, बुजुर्ग विशेषांक

Search

Read the Text Version

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 ‘नही चौबे जी, इसमंे आपका कोई दोर् नही ह.ै दोर् बटे ों से एक मााँ सभंि ाली नही गयी. ताजबु की बात है तो मे ी ठकस्मत का ह.ै ठजस घ को महे नत की एक ना ठक माँा ने ठकतनी ठहम्मत से तीनों बच्चों को पाला एक ईटिं से बनाया औ सालों साल उसमंे प्या का औ एक अके ली मााँ की ोटी के ठलए तीनों बच्चे सीमटंे भ ा. आज उसी घ से एक पल में बाह सडक आपस में ठभड गय.े इसठलए नही ठक वो ठकसके यहाँा प ठनकाल ठदया गया ह.ाँ मजाक तो मे ी ठकस्मत ने मे े खाना खाएगी. बठल्क इसठलए ठक वो ठकसके घ में साथ ठकया ह,ै चौबे जी. मनै े अपनी सा ी जमा पिजंू ी खाना पहले पकाएगी. सा ी उम माँा बच्चों को अपने अपने बेटे के नाम क दी. ये सोच क ठक वो मे ी सेवा हाथों से ठखलाती नही थकती औ जब उसके हाथ क ेगा. प जैसे ही सब उसके नाम हआु बह औ बेटे थोडे कमजो पड जाते हंै तो वह छ: हाथ सहा ा देने से ने अपने ंिग ठदखाने शरु ू क ठदए. मनै े अपने जीवन मे भी इनका क दते े ह.ंै वाह ी दठु नया अजीब दस्तू है कभी ठकसी का बु ा नही ठकया. ठफ ना जाने क्याँू ते ा...’ इतना बडा खले चा कु द त ने मे े साथ. क्याँू हआु ऐसा मे े साथ..?’ ‘हमा े यहा कु ल छ्बब्बीस लोग ह.ैं सब ऐसे ही ठकसी का ण से यहााँ प ह.ैं प हम तीनों को छोड क सब श्रीवास्तव जी भावनाओ के सब दाय ों को तोड क बीमा हो चकु े ह.ैं जब मैं यहाँा आया था तो 'कोई ोने लगे. पागलों जैसे हता था, कोई ोता ही हता था जसै े कोई बच्चा ो हा हो, तो कोई द वाजे की त फ एक टक ‘समझ सकते है श्रीवास्तव. हम भी यहााँ अपनी मज़ी लगा क दखे ता हता था ठक कोई आएगा औ उन्हंे से नही आए ह.ै हमें भी यहाँा छोडा गया ह.ै मंै चौब,े यहाँा से ले जाएगा. प कोई नही आता उस द वाजे स.े बना स का सेि चौबे जी हआु क ता था. लोग मे े कोई भी नही..’ नाम से ही खशु हो जाया क ते थे प मे े अपने ही बटे े ने मे ी मसु ्कु ाहट छीन ली औ मझु े यहाँा पटक ठदया. ये सब कहते कहते चौबे जी भावकु हो क ोने लगे. ये ामस ण, ये तो अपना घ खदु ही छोड आया. इसका पर वा इसे इतना म ता था ठक एक समय ‘ठफ मनै े ठनश्चय ठकया ठक अब कोई भी यहाँा ोएगा आया ठक सब हदें पा हो गयी. औ ये यहााँ चला नही. कोई भी अपने अतीत को याद नही क ेगा. हम आया. औ ये चक ी, इसके तो तीन बटे े ह.ंै औ तीनों ठकसके ठलए ो हे ह.ैं जो खदु हमंे यहाँा झटक क चले Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 गये औ एक बा भी पलट क नही दखे ा ठक हम खाने के कम े में सब बैिे श्रीवास्तव जी का इतिं जा ठजदंि ा भी हैं या नही. नही श्रीवास्तव.. आज के बाद तू क हे थ.े जबतक सब मौजदू ना हो जाएँा कोई खाना भी नही ोएगा. बस बहतु हो गया. अब तू अपने घ में शरु ू नही क ता. ये दखे क श्रीवास्तव जी झटके से है औ यहा सब ते े अपने ह.ैं तझु े जो… जैसा क ना है कु स़ी प ठग े, जसै े कोई धक्का लगा हो उनको.. औ तू क . कोई भी नही ोके गा तझु .े . क … सब क …’ मजे प स ख क फू ट फू ट क ोने लगे… औ ठफ से चौबे जी की आखँा ों मंे अपने उन ठदनों की ठकसी भी पौधे को बढने के ठलए उसका जमीन में याद झलक ठदखा गयी जब उनका बेटा उन्हें इस ठटका हना बहुत जरू ी होता है औ उसके ठलए जड इमा त में छोड गया था. का मजबतू होना अठतआवश्यक ह.ै िीक वैसे ही घ बडे बजु गु ों के ठबना मजबतू नही हो सकता. उनके ‘माफ़ क ना, चौबे जी, मे ी वजह से आप को दखु आशीवादद के ठबना अधू ा है घ . उनके ठबना घ रूपी हआु .’ पौधा कभी फलता नही. समाज में आज कै सी ठस्थठत उत्पन्न हो गयी है ठक पु ानी वस्तओु िं के साथ-साथ ‘अ े नही श्रीवास्तव भाई. बठल्क आज तमु ्हा े का ण लोग अपने बजु गु ों को भी एक पु ानी औ बके ा वस्तु मझु े भी अतीत का आईना जो मनै े कहीं दफ़ना ठदया समझ क घ से बाह ख आते हैं ‘ओल्ड ऐज होम’ था ठदखा है औ ये जरू ी भी ह.ै जब हमा े पास कोई नामक इमा त म.ें जोठक कभी घ नही हो सकती... नही होता तो हम ही होते है खदु के पास. औ हमें क्योंठक ह इमा त घ नही होती.... हमसे ठमलाने वाला वो अतीत का आईना ही होता है जो हमा े अपनों ने हमें ठदखाया होता ह.ै ’ ‘बससस…. बहुत हो गया ोना धोना. अब चलो खाना खाते ह.ंै बहुत भखू लग ही है औ सब इतिं जा भी क हे ह.ैं ’ चक ी ने माहौल मंे अलग सी हवा को भ ने का सफल प्रयत्न ठकया. Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 cPPkksa dh ftUnxh eas cqtZxq ksZa dk egRo vkt ds cPpksa dks [kqysiu cMh+ vko’;rk gS D;ksafd cPPkkas dks I;kj vkjS vktknh gekjs tks cMs+ cqtqxZ gksrs gS oks ls j[kus esa mUgsa nqfu;k dks le>us eas cMh+ Kku dk HkMa kj gksrs gS ftuds ?kjkas eas dksbZ cqtZxq vklkuh gkxs h ysfdu tc rd cPpkas dks lgh O;fDr gS le> fyft, muds ?kjkas eas Kku dk jkLrk vkSj lgh lksp ugha feysxh] oks nfq u;k dks HkMa kj Hkjk gS vius thou eas cgqr lh vPNh ugha tkuik;saxsA D;kfsa d tkuus vkjS thou thus cqjh phtksa dk lkeuk djds og bl mez rd eas vaUrj gkrs k gS blfy;s cPpksa dh ijofj’k igpaq rs gAS ctq Zxq O;fDr ,d o`{k ds leku gksrk djrs le; muds eu dks le>uk t:jh gS gAS tlS s o`{k c<+rs tkrs gS muds Qy vkjS Nk;k cPpksa dks rc le>uk T;knk t:jh gksrk gS tc nus s dk egRo c<r+ k tkrk gSA mlh idz kj O;fDr oks ;oq k voLFkk esa dne j[krs gS cPpkas dks gh viuh mez esa vkxs c<r+ s gS muds Kku dk mudh ftUnxh eas vkxs c<u+ s eas lg;ksx djuk :i Hkh fodflr gksrk tkrk gAS pkfg,A gekjs ?kj ds ctq Zxq vius cPPkkas D;ksafd mudks viuk jkLrk rks ds fy, thou thus dk lfydk NksMd+ j tkrs gSA ekywe gksrk gs ysfdu tkuk dSls gS dgk gS ;s cPpksa dh ijofj’k fdl rjg ls dh tkrh gS ;g ekyew ugha gkrs k blfy, bl le; cPpksa dks mik; NkMs d+ j tkrs gS ftl vkxs nqfu;k dk dkbs Z le>uas dh T;knk t:jr gksrh gSA ;s le; ,ls k Hkh foKku ;k dksbZ peRdkj dHkh dke ugha vkrk vkrk gS ftl le; cPpsa liusa n[s kus yxrs gs gAS gekjs ?kjksa esa tks nknk&nknh ;k ukuk&ukuh liukas dh nqfu;k dks gh lgh le>us yxrs gS gkrs s gS mudh tks dgkfu;ka gksrh gS tks cPPkkas dks vkjS liuksa esa thus dh dksf’k’k djrs gS vkSj lyq kus ds le; luq kbZ tkrh gSA oks dgkfu;ka cPpsa vius thou eas efLr”d ¼cqf)½ vkSj fny bruh Kku Hkjh gksrh gS fd dkbs Z Hkh Ldwy ugha ds Ql tkrs gS ,ls s le; eas ctq xZq ksa dk tks Kku fl[kk ldrkA gksrk gS og cMk+ dke vkrk gAS blfy, tc cPpkas dh ijofj’k cPpksa dks viuh ftUnxh ds dh tkrh gS rks vius rjhdksa ds lkFk&lkFk ctq xZq kas jkLrs puq us esa ;k le>us eas cM+k lg;kxs feyrk ds tekus ds rjhdkas dk Hkh mi;kxs djuk pkfg, gS vkt dh bl rst xfr dh ftUnxha eas thus dk D;kfas d gesa vius cPpkas dks I;kj vkjS vktknh rjhdk lc Hkqy pqdsa gS lHkh ifjokjksa eas ijofj’k nksukas dks ,d lkFk nus k pkfg,A ftlls mUgas dk rjhdk dNq &dqN vyx gksrk gAS fu;e dkuwu ges’kk ds fy, vkxs c<+us vkSj dfBukbZ;kas ls dks cPpkas ds Åij Fkkis as er cl gekjs ctq Zxq kas ds yM+us esa lgk;rk feyxs hA crk;s ;k fn[kk;s jkLrsa ij lgh rjhds ls pyuk Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 fl[kk;sAa fQj n[s krs jgs muds ftUnxha vius vki lq/kj tk;xas h vkSj dqN djus dh vko’;drk ugha gksxhA vfuy dqekj ikyh ckcq jke ikyh rkjckgj fcyklijq eks 7722906664]7047078079 beZ sy&[email protected] Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 बदलनर् िो होर्र् घसु कर बह की पाक कला पर नकु ्ताचीनी करने से बाज नहीं आती है तो मपताजी बटे े के मबज़नसे मंे डॉ दुर्र्मप्रिर्द रग्रिर्ल टांरा ्ग अड़ाते रहते ह.ैं लेमकन सोमचये ना मक आप जब खदु र्गाड़ी चलाते हंै और जब आप र्गाड़ी अखबारों मंे प्राय: बज़ु रु ्गों से दरु्वयवय हार या उनकी चलाने वाले के बर्गल मंे बैठते हंै तब मंे कु छ िर्य उपेक्षा के समाचार पढ़ने को ममलते हैं. जहांा भी दो- होता ह.ै आप बर्गल मंे बठै कर भी चाहरंे ्गे मक र्गाड़ी चार हम उम्र लोर्ग ममलते ह,ंै अक्सर यही रोना रोया वैसे ही चलाई जाए जैसे आप चाहते हैं तो जो र्गाड़ी जाता है मक आजकल बढ़ू े मा-ंा बाप की कोई मिक्र चला रहा है उसे असमु वधा होर्गी. खीझ भी होर्गी. नहीं करता ह.ै लमे कन मरे े एक वररष्ठ सामहमययक ममत्र इसकी पररणमत बदमज़र्गी और ररश्तों के दरकने में अक्सर यह कहते हंै मक अर्गर उनके पास सासं ाधन हों होर्गी. स्वस्थ बात तो यह होर्गी मक आप चैन से बठै ें तो वे वररष्ठ लोर्गों के मलए कोमचरां ्ग क्लाससे लर्गाना और उसे अपने मववेकानसु ार र्गाड़ी चलाने दें. इस चाहरंे ्गे. उनका बहतु स्पष्ट मवचार है मक अपनी बहुत तरह वो भी अपना कतरय्वय मनवहय न करेर्गा और आप सारी पीड़ाओंा के मलए वररष्ठ जन स्वयंा उत्तरदायी ह.ैं भी यात्रा का आनांद लेरं ्गे. लमे कन क्या ऐसा होता ह?ै हम कभी यह मानने को तैयार ही नहीं होते हंै मक मझु े भी लर्गता है मक हालात उतने बरु े तो नहीं हैं हमसे बहे तर ड्राइवर कोई और हो सकता ह.ै मजतने मान मलए र्गए ह,ंै और यह भी मक अर्गर आपको कोई कष्ट न हो तो भी आपके शभु मचतंा क बड़ी मवडम्बना यह है मक इस र्गमतशील जीवन मंे हम भरसक कोमशश करते हैं मक आप महससू करंे मक मस्थरता चाहते ह.ंै हम चाहते हंै मक हम सदा आप भयांकर कष्ट में ह.ंै यामन इस बात को एक सच अमभभावक बने रह,ें और हमारे बच्चे भी कभी बड़े के रूप में पंजा ीकृ त कर मलया र्गया है मक नई पीढ़ी न हों! एक तरह से हम अपने पवू यजों की सांन्यास और परु ानी पीढ़ी को िू टी आखंा ों भी नहीं देखना चाहती वानप्रस्थ आश्रम वाली र्वयवस्था को भी नकारने का ह!ै होता यह है मक जब वदृ ्ध या वररष्ठ लोर्ग अपने हर सम्भव प्रयास करते ह.ंै बाप यह नहीं चाहता मक बच्चों के साथ रहते हंै और अर्गर वे कभी कोई काम बेटा अपने मववेकानसु ार अपना काम करे और माां करते ह,ंै जैसे सब्ज़ी लेने चले जाते हैं या अपने पोते यह नहीं चाहती मक बह अपनी पसन्द और अपनी पोमतयों को स्कू ल छोड़ने लेने चले जाते हैं तो उन्हीं समु वधा के अनसु ार घर चलाए! अर्गर आप टोकंे तो के साथी ताना मारते हंै और उनके मन मंे यह बात वे यह और कहरें ्गे मक ‘भाई! चाहे मकतने ही बड़े हो मबठा दते े हैं मक उनका शोषण मकया जा रहा है. और जाएंा, हमारे मलए तो ये बच्चे ही रहरंे ्गे!’ यह क्या बात इस तरह जीवन में मजस बात का आनदंा मलया हुई? आप उनसे प्रेम कीमजए, लाड़ लड़ाइये, लमे कन जाना चामहए उसी को वे बतौर सज़ा या शोषण जो काम वे कर रहे हंै उसे तो उन्हंे अपने तरीके से दखे ने समझने लर्गते ह.ंै करने दीमजए. क्या सारा दोष नई पीढ़ी का ह?ै क्या परु ानी पीढ़ी से मपछले कु छ बरसों में भारत में जीवन शलै ी में बहुत कहीं कोई चकू नहीं हो रही ह?ै जब मैं इस बात पर बदलाव आए ह.ैं आज से दस पन्रह बरस वाला सोचता हां तो पाता हां मक हममें से बहुत सारे लोर्ग इस बात को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते हैं मक जीवन अब मवलपु ्त हो र्गया ह.ै आज की पीढ़ी का अब हम मनणाययक नहीं रहे हंै. सास जी रसोई मंे खान-पान, पहनावा, लोक र्वयवहार सब कु छ बदल चकु ा ह.ै नए ज़माने में रह रही हमारी सतंा ान को उसी नई जीवन-शलै ी के अनरु ूप आचरण करना होता ह.ै Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 लमे कन मदक्कत यह होती है मक हमारे मलए समय बच्चों के साथ-साथ अपनी जर्गह बदलते रह.ें ऐसे ठहरा हुआ है और हम चाहते हंै मक हमारी सातं ान के मलए भी वो ठहरा हुआ ही रह,े जो ममु मकन नहीं ह.ै मंे हमंे वकै मपपक र्वयवस्थाएंा तो करनी ही होंर्गी. टकराव की एक बड़ी वजह यह भी होती है. एक अर्गर हमने कामकाजी माताओां के मशशओु ंा के मलए आदशय मस्थमत यह हो सकती है मक हम अपनी डे के यर सेण्टर या क्रे श जैसी समु वधाओंा को स्वीकार जीवन शलै ी को चाहे न बदल,ें उन्हें यामन नई पीढ़ी मकया है तो ररटायरमणे ्ट होम्स और वदृ ्धाश्रमों (कोई को अपनी आवश्यकताओां के अनसु ार जीवन जीने सम्मानजनक नाम भी हो सकता है) को भी खलु े मन की प्रसन्नतापणू य छू ट दें. बशे क हम उन्हें सलाह दे से स्वीकार करने को तैयार रहना चामहए. अर्गर बीते सकते ह,ंै लमे कन यह आग्रह करना मक हर हाल मंे वे हमारी ही बात मानें, अनमु चत होर्गा, और ज़माने मंे वानप्रस्थ की कपपना थी तो आज वदृ ्धाश्रम अयावहाररक भी. क्यों स्वीकायय नहीं हो सकता? जीवन अपनी र्गमत से जब अपने बज़ु रु ्गों के साथ यवु ाओंा के बतावय की बात चलेर्गा. बदलना तो हम को ही होर्गा. होती है तो चलते-चलते प्राय: दो-चार हाथ पमिम ●●● को भी जड़ मदए जाते ह.ैं हम मशखर पर हंै और वो र्गतय में हैं – यह भाव आम ह.ै जबमक असल मंे ऐसा सम्पकय सतू ्र: कु छ नहीं ह.ै पमिम की अपनी ज़रूरतें हैं और है अपनी जीवन शैली. अपनी जीवन शलै ी को अच्छा ई-2/211, मचत्रकू ट, जयपरु - 302021. बताने के मलए उसे र्गररयाना र्तई ज़रूरी नहीं है. [email protected] लेमकन इससे भी बड़ी बात यह है मक अब जब हमने पमिमी जीवन शैली को परू ी तरह अपना मलया ह,ै समय आ र्गया है मक हम यह भी देखंे मक उन्होंने इस मस्थमत का सामना करने के मलए अपने यहाां क्या सरु क्षा प्रबन्ध मकए ह!ैं कभी हमारे यहाां सयां कु ्त पररवार प्रथा थी जो पररवार मंे सभी को– बज़ु रु ्गों को और बच्चों को भी- पयायप्त सरु क्षा देती थी. अब बहतु सारे कारणों से संायकु ्त पररवार लर्गभर्ग खयम हो र्गए ह.ंै पहले सारे, मवस्ताररत भी- पररवार का एक साथ रहना आम बात थी. हर दम्पती के बहुत सारे बच्चे होते थ.े एक दो बाहर भी चले र्गए तो कु छ साथ रहने को बचे रह जाते थे. लेमकन अब ऐसा नहीं होता ह.ै पररवार मसमटत-े मसकु ड़ते एक-दो बच्चों वाले हो र्गए हैं और परू ी दमु नया के एक वमै िक ग्राम मंे तब्दील हो जाने की वजह से उन एक दो बच्चों का भी दरू -दरू जाना आम हो र्गया ह.ै अब न बच्चों के मलए सम्भव रह र्गया है मक वे मा-ंा बाप के पास रहें और न माां-बाप के मलए यह सम्भव होता है मक वे Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 fdl gky esa gaS gekjs cqtxq Z esa c<r+ h mez ds lkFk&lkFk lEeku Hkh c<r+ k tkrk Fkk] mudk lekt esa #rck Fkk vkSj mudh ckr ekuh tkrh && Mk- fouksn cCcj FkhA ysfdu ik'pkR; laLÑfr ds izHkko] fo[kf.Mr gksrs la;Dq r ifjokj] 'kgjhdj.k] miHkksDrkoknh laLÑfr ds ik\"kk.k dky ls vk/kfq ud lH;rk rd dk lQj izHkko ls vkRedsfUnzr gksrs lekt esa muds vfLrRo dks ekuoh; laca/kksa ds ijLij vkd\"k.Z k dh xkFkk gAS udkjuk 'k:q dj fn;k gSA lekt eas ;g vke /kkj.kk vkfnekuo ls ifjokj vkSj lekt dh vksj c<+uk fj'rksa curh tk jgh gS fd cqtqxZ Qkyrw izk.kh gAaS mudh ds dkj.k gha laHko gqvk] ftlus nqfu;k dh rLohj gh mis{kk gksus yxh gSA vuiq ;ksfxrk dk vglkl ,d o`) cny nhA vius ifjokj vkjS fudVtukas ds thou dks dks tgk¡ xfr'khy lkekftd thou ls dkV dj j[k nsrk lq[kdj cukus ds fy,] rks dHkh fj'rksa ds izfr viuh gS ogha mlds lkeus lEeku ds lkFk thou O;rhr djus izfrc)rk fl) djus ds fy, euq\"; us D;k ugha fd;kA dh leL;k Hkh vk [kM+h gksrh gAS yxrk gS tSls mudh ^vkleku ls rkjs rkMs + ykus* dh ckr vdkj.k ugha gAS n'kk ml dSys.Mj tSlh gks xbZ gS ftls u;s o\"kZ vkrs gh okLro esa] vkt dh leLr HkkSfrd lq[k&lqfo/kk,a vkjS jíh dh Vkds jh esa Qsad fn;k tkrk gS ;k fQj dkih fur u;s vkfo\"dkj ekuoh; laca/kkas ls] lca /a kksa }kjk] fdrkckas ij ftYn p<k+ us ds dke esa fy;k tkrk gSA lac/a kksa ds fy, gh rks gSA nqfu;k ls dVs ,d&vdsys 'kgj ds gj ikdZ esa fdlh rjg le; fcrkus dks O;fDr dks /ku dekus] egy [kM+k djus vkSj u;s&u;s vfHk'kIr bu cw<+ksa dh n'kk dks vki yk[k ihf<;+ kas dk vkfo\"dkjksa dk t:jr gh ugha gksrhA bruh efgek gksrs vra j dg dj Vkyus dh dkfs 'k'k djs yfs du ;g g,q Hkh vkt bUgha laca/kksa dh uhoa ij [kMk+ lekt vkjS lh/ks&lh/ks vglku Qjkeks'kh gSA lekt dh e;kZnk vkSj 'kkafr [krjs esa gSA ,ls k ugha gS fd lekt esa ,sls ifjokj fcYdqy fiNys fnukas fnYyh ds ukxa ykbs Z esa 75 lky dh ugha gaS tgk¡ o`)ksa dks iwjk lEeku feyrk gksA ysfdu eqUuh csxe dks muds rhu csVs tathj ls ckaèkdj j[krs ,sls ifjokjksa dh la[;k /khj&s /khjs de gksrh tk jgh gAS FksA fiNys dbZ eghukas ls lnÊ] xeÊ vkSj cjlkr esa gk¡] ;g Hkh laHko gS fd dNq rFkkdfFkr vk/kfq ud yksx [kqys vkleku ds uhps jg jgh ml cqtxq Z dks ,d tks ,d vkjs l;a qDr ifjokj ds ykHk rks yus k pkgrs gaS ,uthvks dh lwpuk ij iqfyl us cVs kas ij dsl ntZ yfs du mlds fo[kaMu dk nks\"k cqtxq ksZa dh jksd Vksd ij fd;kA okLro esa viuh rjg dh dksbZ bdykrS h /kVuk Mkydj viuk nkeu cpkuk pkgrs gksA ysfdu os vius ugha gSA ,ls k gh ekeyk fiNys fnuksa fnYyh gkbZ dksVZ esa cpiu dks ;kn ugha djuk pkgrs tc os gekjh gj lkeus vk;kA 75 ls vf/kd o\"kZ ds c<w s+ ek¡&cki dks ftÌ ijw k djus dks r;S kj jgrs FksA gekjh gj eqLdku ?kj fudky ckgj djus okys ekeys dh lquokbZ ds nkSjku ij viuk loLZ o U;kSNkoj djus okys viuh gj Fkdku vnkyr us odhy ls iNw k fd csVk dgk¡ gS] rks mlus Hkyw dj gekjs ihNs Hkkxrs FksA gesa tjk lh [kjkaps Hkh dgk fd og f'kjMh n'kuZ dks x, gSaA bl ij dksVZ us yx tkrh Fkh rks mudh uhan gjke gks tkrh FkhA ,sls fVIi.kh dh fd ykxs fdruh vthc iwtk djrs gS]a ,d ykxs D;kas ugha le>uk pkgrs fd c<q +kik ,d rjg ls rjQ vius ek¡&cki dks ?kj ls fudky nrs s gSa vkjS fQj cpiu dk iqujkxeu gh rks gSA vkt tc os 'kjhj ls iwtk djus f”kjMh vkfn itw k&LFkyksa ij tkrs gASa odhy v'kDr vkjS eu ls cspuS gS rks D;k gesa vius viuk us dkVs Z dks crk;k fd cVs s dks la;qDr fgUnw ifjokj ds drZO; Hkwyk ns\\ D;k mUgas lEeku nsus dh jLe vnk;xh dkuuw ds rgr lEifÙk esa fgLlk feyuk pkfg,A bl ij Hkj djrs jguk pkfg,\\ D;k mUgsa misf{kr dj e`R;q ls dkVs Z us odhy dks dMh+ QVdkj yxkrs g,q la;Dq r fgUnw iow Z gh ^Hkwr* cukuk mfpr gS\\ ifjokj dk eryc le>krs gq, dgk fd tc vki vius ekrk&firk ds izfr vius drZO; dk ikyu ugha djrs gS]a o`)koLFkk thou dk vf[kjh pj.k gS] ifjokj esa rks vkidk laifÙk esa dkbs Z gd ugha gks ldrkA ,slk okrkoj.k cuk,a ftlls ?kj esa cqtxq Z dks lEeku fey lds D;kasfd bl fLFkfr eas lHkh dks igq¡puk gS] bl iÑz fr dk Qyw ] le; ds lkFk vius ;kSou dh ckr dk vglkl lHkh uo;qodksa dks djuk pkfg,A o`)ksa lqx/a k ikrk gS rks la/;kdky esa eqj>kgV fn[kkus yxrk ds ikl vuqHkoksa] lLa ej.kks]a Le`fr;kas ds fo'kky Hk.Mkj gSA yfs du mUgas ijS ks rys jknaS k ugha tkrkA gekjh laLd`fr Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 gksrs gSAa muds vuHq ko gekjs fy, vewY; /kjkgs j gSa ftUgas latksdj j[kuk gekjk drZO; gSA lkFk gh ljdkj dk Hkh ;g ije drOZ ; gS fd o`)koLFkk isa'ku] muds iuq oklZ dh ;kts uk,a vkfn cukdj muds izfr lEeku inz f'kZr djsaA thou eas lcls mÙke deZ gS ekrk&firk dh lsok djukA ekrk&firk dh lsok Hkxoku dh iwtk djus ds cjkcj gAS euLq e`fr ds vulq kj& tks yksx fuR; ifz r vius o`)tuksa dk lEeku ,oa vfHkoknu djrs gaS] muds ;'k] fo|k] vk;q vkjS cy&cfq ) dh vfHko`f) gksrh gSaA egkRek pk.kD; ^o`) lsok; foKkuue~* vFkkZr o`)tuksa dh lsok ls fo'ks\"k Kku ,oa foKku dh izkfIr gksrh gS dk mn~?kks\"k djrs gSAa gekjs 'kkL=kas esa ekrk&firk vkSj x:q dh cM+h efgek crkbZ xbZ gAS tks rhukas dk vknj] lEeku o lsok djds mUgas izlUu djrk gS] og rhuksa ykds ksa dks thr ysrk gS vkSj vius 'kjhj ls fnO;eku gksrk gqvk lw;kfZ n nsorkvksa ds leku LoxZ eas vkuUn ysrk gSA vklS r vk;q esa o`f) ds lkFk gh] ns'k eas c<w +ksa dh la[;k eas Hkh yxkrkj o`f) gks jgh gSA tc rd mudk 'kjhj pyrk gS os Hkkj ugha gksrAs ij v'kDr gksus ;k foiUu gksus dh n'kk esa os ifjokj ij Hkkj cu tkrs gSaA ifjokjksa ds VVw us ij nknk&nknh] ekrk &firk rd dk c¡Vokjk gksus yxk gSA mudh NksVh&NksVh t:jrksa dks ysdj Hkh vDlj dyg gkus s yxrh gAS ;g fopkj.kh; gS fd vkf[kj gekjh laosnuk,a bruh e`rizk;% D;ksa vkSj dlS s gks xbZ fd gekjh uUgha& uUgha maxfy;ksa dks Fkkeus okys gkFk [knq fdlh ds lgkjs dh ryk'k esa HkVdsAa D;k ;g gekj d`r?kurk ugha fd ge muds cq<k+ is dh ykBh cuus dh ctk; cgkus ryk'kus esa viuh 'kku le>rs gsAa vkf[kj ge vius ftu ctq qxksaZ dk Jk) vR;ar J)kiow dZ djrs gSa] mudh e`R;q ds i'pkr~ cMs+&cM+s e`R;q Hkkst vk;ksftr djrs ga]S ij thr&s th mudh lq/k ugha ysrs\\ bruk lc dqN gksus ij Hkh ge] gekjk lekt vkSj gekjh ljdkjas jk\"Vª dh bl vewY; /kjksgj ds ifz r vueus D;ksa gS\\ dkbs Z lekt vius ctq qxksZa dk frjLdkj djds egku ugha cu ldrk gSA D;k Bhd ugha dgk gS fdlh dfo us %& iRFkj ds vc edku cukus yxs gaS yksx] fny ds edku fdarq fxjkus yxs gaS yksxA j[krs gaS vius cPpksa ls tks l[q k dh dkeuk] c<w k+ as dks exj jkts ]+ :ykus yxs gaS yksxAA Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 मगं लवार की सबु ह,परु ानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मैं प्रदि गसु ्सा उमड़ आया ।बाबा का ध्यान रखना ,वहाँा मोदिहारी से आ रही गाड़ी पोरबन्िर का इिं ज़ार कर बैठे यादत्रयों से ,कहकर मंै गाडी से बाहर दनकल पड़ा रहा था। गाडी अपने दनर्ााररि समय से लगभग चार ।। घंटे िरे से थी। दचलदचलािी घपू और सड़ी गमी के रेलवे स्टेशन ,बस स्टेशन ,अस्पिालों और सरकारी कारण बिन िेज़ी से िपने लगा,मंै प्लटे फॉमा नंबर कायाालयों आदि में हर िसू रा बज़ु गु ा यहु ीं मिि के पाचं पर ,एक बकु सेलर के पास खड़ा होकर गाड़ी दलए मौहिाज़ घमू िा दफरिा ह।ैं मझु े समझ नही के आने की प्रदिक्षा कर रहा था |िभी अचानक मरे ी आिा की जो माँा बाप हमें जन्म िेकर पालिे हैं दृदि नब्बे साल के एक बज़ु गु ा व्यदि पर पड़ी । ,दजनसे हमारा वज़िू कायम है जो हमारे सपनों की पदू िा के दलए अपने सपनो की बली चढ़ा िेिे ह।ंै और उनके िोनों कं र्ो पर िो भारी भारी बगै टंगे हुए हम बिले मंे उन्हंे मरने के दलए सड़कों पर छोड़ िेिे थे,हााँथ मंे लाठी लेकर, वो िेज़ी से कापं िे हएु एक - हैं ! एक किम आगे ऐसे रख रहे थे |मानो जसै े सदियों हम यह िावा करिे हैं की हम एक सभ्य और का सघं र्ा करना पड़ रहा हो । दशदक्षि समाज मंे रहिे ह।ंै मैं िरु ंि उनके पास गया उनका एक लदे कन क्या हमारी सभ्यिा और हााँथ अपने उल्टे कं र्े पर रखा और दशक्षा अपने बॉस को खशु करने पछू ा की के दलए मात्र है ? \"बाबा कहााँ जाना है आपको ??\" क्याअनावश्यक जरूरिों की \"अम्बाला कैं ट वाली गाड़ी में भरपाई के दलए ही हम दजये जा रहे छोड़ िो \" बाबा ने र्ीरे से मरे े कान ह?ैं ? मंे कहकर अपने िोनों बगै भी मझु े पकड़ा दिए । गाड़ी से बाहर आकर, मरे े मन में मैं उन्हें लके र प्लेटफामा नबं र साि एक बाि आई और मैं दफर से उसी की ओर चलने लगा बाबा ने मझु े गाड़ी मंे चढ़ गया।गाड़ी र्ीरे र्ीरे ऐसे कसकर पकड़ दलया, जसै े आगे बढ़ने लगी मैं हाफं िा हआु खाई से दगरिे हुए इसं ान को कोई बाबा के पास पहचुँा ा और कहा रस्सी दमल गयी हो। \"बाबा िमु ्हारे दकसी बच्चे का फ़ोन नम्बर है ?\" थोड़ा भटकने के बाि मझु े अम्बाला कंै ट जाने वाली \"हााँ मरे ी बटे ी है दवमलशे गपु ्ता वो एस बी आई बंकै गाड़ी दमल गयी ,दडब्बे मंे सभी सीट भरी हुई ंथीं मंे कायरा ि है \"बाबा ने मझु से कहाl ।अननु य- दवननय करने पर एक सीट खाली हईु , \"उनका फ़ोन नम्बर जल्िी िो बाबा \" मनंै े बोला बाबा अपने सामान के साथ सीट पर बैठ गए और ,क्योंदक गाड़ी िज़े ी से हॉना बजा रही थी । िोनों हाँाथ जोड़कर कहने लगे पाँवा के पास रखे बैग मंे से बाबा ने एक डायरी \"बटे ा कोई गलिी हो गयी हो िो माफ़ करना \" दनकाली दजसमंे उनके कु टुंबजनो के फ़ोन नम्बर थे । गाड़ी में बठै े सभी यात्री मरे ी ओर िखे ने लगे । मनैं े अपने फ़ोन का कै मरा ऑन दकया और सभी बाबा की आखाँ ों में लाचारी और दववशिा िेखकर फ़ोन नबं रों की एक फ़ोटो खींचकर िरु न्ि चलिी हुई मझु े खिु से और इस आर्दु नकिावािी समाज से गाड़ी से बाहर कू ि पड़ा। नफ़रि होने लगी ।मरे े मन में इस कठोर समाज के Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 गाड़ी की गदि ज्यािा ना होने की वजह से ;मंै सही सलामि था। दफर थोड़ा ठहरकर मनैं े उनकी लड़की को फ़ोन लगाया, सवाप्रथम अपना पररचय िके र दफर परू ी घटना सनु ा डाली ।। अपनी सफ़ाई मंे वो कहने लगी की \"मरे े दपिाजी बहिु दजद्दी हैं वह एक जगह ज्यािा दिन नही रहा करिे । हम सब उन्हें समझा समझा के िुु ःखी हो गए ह।ैं \" उन्होंने मझु े बाबा की बहुि सी गलदियााँ दगनाकर शांि कर दिया । हााँ ! यह बाि हक़ीक़ि ह,ै की बढ़ु ापे में इसं ान थोड़ा दज़द्दी हो जािा ह,ै शारीररक कमज़ोरी उसे दचड़दचड़ा बना िेिी ह।ै लेदकन क्या बचपन मंे हमारी दज़द्द और ज़रूरि को परू ा करने मंे उन्होंने मसु ीबि उठाकर भी अपना फ़ज़ा नही अिा दकया ??क्या सड़क पार करने के दलए उन्होंने हमें अपने कं र्ो पर नही दबठाया था?क्या मले े मंे मागं े गए दखलौने ,हमंे िरु ंि नही दिलाए गए??क्या हमारे लड़खड़ािे क़िमों को उन्होंने कभी सहारा नही दिया? अगर इन सबका जबाव ना भी है ,िब भी हमें उनकी िेखभाल करनी होगी क्योंदक बढ़ु ापा के वल बज़ु गु ों की ही जागीर नही ह।ै । र्ौ ि श्रेंिर्स्िि 09250994947 08287232685 Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 krahta baZu ,apa pr @yaa [naka mana nahIM hato a? [nako mana ka @yaa khnaa. khnao kao ekakI hO rcanaa SakM r ,Aklo aa haonao ko baavaja,dU pMKaoM kao lagaakr, iktnaI dUr tk ]D,nao kI takt Aa jaatI saubah ]zkr diO nak ik`yaaAaoM kao inapTanao ko baad h.O sadu Ur tk flO ao }cM^ ao sapnaaoM kao samaoTnao ko ilae AtIt ko JaraKo o sao yaadaoM kao Jaa^knao ko Alaavaa pKM psaarkr ]D,nao kao Aatur hao ]zta h.O yao kuC na krnao kao rhta.maOM tmaama ]na laago aaoM kI ApnaaoM kI prSo aanaI kI AahT hato o hI ivah\\vala hao baat krtI h^UM jaao [sa vadR \\Qaavasqaa ko pD,ava tk ]zto hOM .Balao hI ]nakI salaah laI jaae yaa nahIM, Aato Aato pta nahIM khaM^ sao [tnaI Sai@t Aa jaatI hO.pi` txaNa iksaI Tako a iTPpNaI kI hMU^kar Barta dBu aa-gyavaSa inatatM Aklo ao rh jaato hO.M ,baocaOnaI, Aaturta, icatM na kao baTaoro ekakI mana BaI k[- baar sabala hao jaata hO .vah Alaga baat Saayad [sa saaco a maoM hI hr lamha gaujar, ta hO [sao najar, AMdaja, kr idyaa jaae. rhta ik kaSa kBaI iksaI ko pasa kuC pla baOznao kao, ApnaI baat khnao ,saunaanao ka Avasar eosaa nahIM hO ik Akolaapna iksaI BaI imala jaata yaa kao[- samaya do dto a.iktM u yao saaco a ]ma` maoM manaYu ya pr havaI nahIM hao sakta prtM u yaa [cCa inara galat, . ApnaI saaco a kao dsU aro pr vaRdQ\\ aavasqaa ka ekakIpna Apnao Aap maMo bahtu qaaopa yaa laada @yaaMo jaae.pr Apnaa mana hO ik kkS- a kzaro evaM Baya kI AaSakM a sao AacCaidt maanata nahIM. vah baolagaama GaaDo ,o kI BaaM^it sarpT haota hO.AadSa- evaM Baaganao lagata hO.mana maoM trh trh ko ivacaar pKM psaarnao lagato hOM AaOr [Qar laaogaaMo ko ]palaBM a yaqaaqa- ka JaJM aavaat JakJaaor kr rK dto a tOyaar.[nhoM sanu anaa baju agu aao-M kI inayait va ~asadI h.O vatm- aana maoM jaInao kI kaoiSaSa kizna pt` It bana jaatI h.O salaah kI laMbaI fho irst ko ilae hato I hO. Apnao caaraMo Aaro Asahayata, ivavaSata idna CaoTo pD, jaato h.MO Apnaa mana pZn, ao maoM @yaaoM idKtI hO. AnaBu aUt haotI hO.BaivaYya sao jaDu ,ava nahIM lagaato, GaUmanaa bahut ja$, rI hO, e@sarsaa[ja, hato a nahIM yaid caahao BaI tao ek Ap`%yaxa Baya kI ikyaa? Kanao ka prhjo a krnaa pD,ogaa, Aba QaUimala pi` tmaa saamanao Aa jaatI hO.BaUt Apnao saaqa Aapkao Apnaa Qyaana Kdu rKnaa hI pD,go aa, hr rhta hO, Apnao saaqa ]sakao rhnao ka saKu canO a samaya iksaI saharo kI ]mmaId sahI nahI hO Aaid banaa rhta hO pr AtIt sao na jauD,nao ka yaa Aaid ihdayataMo ko piu ladM aMo ko baIca bacaa Kucaa AtIt kao baar baar yaad na krnao kI nasaIht jaIvana iktnaa duSvaar hao jaata hO.rhI sahI Aasa pasa ApnaaoM sao samaya- samaya pr imalatI AaSaa BaI iCna jaatI hO yaa yaaMo khoM khnao kao kCu rhtI h.O jasO ao- zIk hO Aba phlao kI baat mat rh hI nahIM jaata.khnao kao hO [sa ]ma` maoM ]nako kire ,Aapko jam, aanao kI baat AarO qaI, ABaI Balao ko ilae hI nausKo, idyao jaa rho hOM yaa [sa phlao jaOsaa nahIM hao sakta, @yaa phlao kI prMpra pD,ava maoM Aato Aato bauja,uga- Saayad Apnaa Qyaana kao pkD,kr baOznaa ?samaya ko saaqa badlanaa nahIM rK pato, eosaa maana kr calaa jaata hO. Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 ja,$rI hO hmaMo BaI hmaarI ija,dM gaI jaInao dIijae Aaid jaa rha hO.[tnao pS` na ]zto hMO ,khnao kao yahI ka tanaa- baanaa saunanao kao imala jaata h.O saaocanao rh jaata hO- pr BaI baiM dSa, Apnao AtIt kao saInao sao icapkae ]saka ijak, ` krnao pr BaI pabaMdI.yaid Apnao duK ijaM,dgaI ko AaOr dsU aro pD,ava gauja,ar ide ,ApnaaoM kao BalU ao sao kBaI CoD, idyaa tao saunanao kao tOyaar ko ilae, ApnaaoM maoM ibaKrkr rihe- Aba [sasao baahr inakilae, hmaarI KSu aI dKo I nahIM jaatI ,hr samaya @yaa dKu Da, Aba [sa AMitma pD,ava pr rh gae, kvo ala ApnaaMo Alaapnaa.bahut KbU a! rao na sakao, iksaI KSu aI kI yaadaoM kao samaoTkr ka sahara na lao sakao tao krao @yaa.saaoca samaJakr napa- tulaa baalo aao, ibanaa saaco ao na baalo aao sanu aa ,kao[- gauMjaa[Sa nahIM ,igalao- iSakvao kao yaMU^ ,ApnaaMo ko maaifk baaolaao, Apnao idla sao na ,ApnaaMo ko saamanao ]Baarkr baaolaa.o [tnao baQM anaaMo sao jakD,o heu inagaranaI kI caardIvaarI ko baIca.tna sao ivavaSa hO hI AarO mana pr doK ilayaa ija,MdgaI kao, ApnaaoM ko baIca, ApnaaMo kI saaco a ko p`dSa-na pr BaI AMkSu a.bacaa, baco aaraoM ko kr, Iba Aakr .. ka AMtman- a prtM u baco aara khnaa nyaayasagM at nahIM haogaa,.Aro yao vahIM tao hOM ijanhaMno ao Apnao baala rcanaa SaMkr gaaopalaaMo kao }^MgalaI pkD,kr calanaa isaKayaa, jaInao kI SalO aI sao piricat krayaa, saByata isaKa[- ,sasu aMskRt banaayaa. Balao hI Aaja ko saBya AaOr iSaYTta ko maapdDM maMo yao Kro nahIM ]trto. yao nahIM hO ik eosao AnaBu ava ko pa~ saBaI hOM pr jaao BaI hMO ]nako ilae ija,dM gaI bahut du$h bana jaatI hO.gaRhsqa jaIvana maMo rhto hue, vaanap`sqa ka saa jaIvana- yaapna bana jaata h.O naamamaa~ ko ilae ApnaaoM ko baIca rhnaa pD,ta hO pr ApnaaMo kao, ApnaaoM sao kao[- saraokar nahIM. jaIvana kI [sa AnauBava samadR \\Qa, A%yatM mah%vapNU a- Avasqaa kao kMQao ka sahara imalanao ko sqaana pr haqaaoM tk ka sahara nahIM imalata.yao pD,ava [tnaa k`Ur @yaaMo pt` It haota hO AarO haota Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 'जेंिन कर् पिझ ' हंै l लजे कन उन लोगों का क्या हो ज नके पररवार मंे शन्नो अग्रवाल कोई भी नहीं l इस तरह के लोग भी दजु नया के हर दशे मंे होते हंै l ज ंिदगी है तो हर कोई बढ़ू ा होगा ही और बढु ापे में अके ले रहना आसान नहीं होता l इगिं लंैड मंे रहते अके ले बढ़ु ापा जबताना जकतना मजु श्कल होता हयु े जिसमस के टाइम मन अचानक ऐसे लोगों के है l जकतना भी पसै ा हो या न हो, इस उम्र में हर कोई बारे मंे सोचने लगता है ो बढ़ू े हंै और अके ले रह रहे हंै l इस ठिंड मंे न ाने ऐसे लोगों का क्या हाल होता लाचार हो ाता है l रा ा-रिंक सब पर ही बढ़ु ापा होगा l जिटेन में जकतने ही ऐसे बढ़ू े लोग हंै ो अपने आता है l िकथ ये है जक अगर पसै ा है जकसी के पास घरों मंे अके ले ही रहते हैं l इस मौसम में अगर उन्हें कु छ हो ाता है तो कोई ान भी नहीं पाता l कई तो सवे ा के सािनों को खरीदा ा सकता है l कोई लोग तो घर के अदंि र भी ढिंग से नहीं चल पाते बाहर ाकर शाजपंिग करना तो दरू रहा l शारीररक प्राइवटे के यर करवा सकता है घर म,ंे या ओल्ड असमर्थता के कारण ऐसे लोग कई बार घर मंे कोई काम करते हयु े जगर ाते हैं l कइयों की याददाश्त भी पीपलु के नजसगंि होम ा सकता है l जकन्तु ये हर बहतु कम ोर हो चकु ी होती है l और कु छ बढ़ू े लोग जकसी के बश की बात नहीं l गरीब उस सजु विा से तो ठंिड से घरों के अदिं र अके ले रहते हयु े मर तक वजिं चत रह ाता है l इस अवस्र्ा में क्या ाते हैं और जकसी को बहुत जदनों तक पता ही नहीं हो? वदृ ्धावस्र्ा मंे लोग शरीर से तो कम ोर हो ही चलता l ब जकसी को अचानक उनका ख्याल ाते हैं और जिर ब कािी ठिंड पड़ती है तो घरों से आता है तो सदंि ेह होने लगता है l पजु लस आजद भी नहीं जनकलते l गमी के जदनों में जकसी को छड़ी आती है और घर के अदिं र से लाश जनकाल कर मजे डकल ािचं होने पर ही पता चलता है जक वो पकड़े हयु े या जबना उसके भी िीरे-िीरे चलते हुये इसंि ान जकतने जदन पहले मरा होगा l ो गया वो गया कभी दखे ती हूँ तो लगता है जक जकतनी मजु श्कल से पर ो ी रहे हंै उनकी असहायपन की अवस्र्ा को हर कदम घसीट रहे हैं l शाजपगंि के र्लै ों को हार्ों मंे सोचकर मन बड़ा द्रजवत हो ाता है l उनके बच्चे या र्ामे आड़े-जतरछे होते हयु े कछु ए की चाल से उन्हें तो उनसे कहीं दरू रह रहे हंै और महीनों में उन्हें देखने चलते हयु े दखे कर उनके प्रजत सहानभु जू त होने लगती आते हंै या जिर तमाम लोगों के पररवार ही है l जिटेन में तमाम लोगों को सामाज क सरु क्षा नहीं l कु छ ही भाग्यशाली ऐसे होते हैं ज नके घर का जमलती है जिर भी बढ़ू े लोगों की तादाद इतनी बढ़ कु छ काम, शाजपगिं व उन्हंे अस्पताल ले ाने की गई है जक हर जकसी को परू ी सहायता नहीं जमल ड्यटू ी आजद कभी-कभी पास रहने वाले उनके नाती- पाती l और तमाम लोग अपना ीवन बरु ी दशा मंे पोत,े बटे ी या बहू कर दते ी हंै l लजे कन उन लोगों की झले ते हयु े ीते हंै l समा में ऐसे लोगों की रूरत भी अपनी ज दंि गी है l उन्हंे काम पर भी ाना होता है ो अपने अड़ोस-पड़ोस के इस तरह के बढ़ू े लोगों है l उनके छोटे बच्चे भी हंै तो उन्हंे भी अजिक की स्वचे ्छा से सहायता कर सकें l और कोई वदृ ्ध िु सतथ नहीं l उनका खदु का ीवन इतना व्यस्त अगर अपने पररवार के सगंि रह रहा है तो पररवार के है जक अक्सर आकर हले ्प करना उनके जलये सिभं व लोग कभी-कभार उससे बातचीत करने को समय नहीं, आकर बातचीत करना तो दरू रहा l बहुत ही कम लोग जकसी तरह मजु श्कल से समय जनकाल पाते जनकालंे और महससू करें जक उन्होंने ऐसा करके उस व्यजि के ीवन में आनदिं की जकतनी िपू जबखरे दी है l यजद कोई बाहर ाकर घटंि ों जमत्रों के सार् समय व्यतीत कर सकता है तो जकसी अपने को कु छ समय क्यों नहीं दे सकता l माता-जपता मंे ब तक क्षमता रहती है तब तक हर तरह से जनस्वार्थ अपने बच्चों के काम आते हैं l तो उनके बच्चों को भी अपने माता-जपता का उनकी रूरत के समय ख्याल रखना Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 चाजहये l कहते हंै जक 'चरै रटी जबजगन्स एट पड़ने लगते हंै l और पता नहीं क्या-क्या बीमाररयाूँ होम l' ज न लोगों के पररवार नहीं हंै उन वदृ ्ध लोगों इस उम्र मंे लोगों को घेर लेती हैं l और ऐसी दशा में से बात करने और उनके हाल-चाल पछू ने के जलये जकतने लोग हंै ो उनकी सवे ा करने के जलये इच्छु क जकसी खास उम्र के व्यजि का होना रूरी नहीं होंग?ें आ कल भारत मंे भी बच्चे कोई श्रवन कु मार है l बच्च,े वान सभी ही ऐसे लोगों में जदलचस्पी नहीं हंै ो माता-जपता की लगन से सवे ा करें l और जदखा सकते हैं और जकसी के बचे-खचु े ीवन के समझदार माता-जपता अपने बच्चों पर खदु भी बोझ कु छ पलों को आनंदि ाजतरेक कर सकते हंै l जिसमस नहीं बनना चाहते l पर बढु ापा उन्हंे म बरू कर देता के समय लोग अपना पास्ट (अतीत) भलू कर अपना है l कािी पहले सयंि िु पररवारों में वदृ ्धों को बहतु प्रे ेंट (उपहार) याद रखते हैं l पर बढ़ू े लोग अपने सम्मान जदया ाता र्ा l लोग वदृ ्धावस्र्ा में प्रे ंटे (वतथमान) से अजिक अपना पास्ट (अतीत) स्वाभाजवक रूप से अपने बेटे की ज म्मदे ारी होते र्े l याद करते हंै l इस उम्र में उनके सार्ी ब जबछड़ बेटे को उनके बढु ापे की लाठी कहा ाता र्ा l ाते हंै तो ीवन और अके ला हो ाता है और आ कल बटे ी-बेटे का अतिं र भी कािी हद तक उनका मन करता है जक कभी उनसे भी कोई बात जमटने लगा है पर बच्चे अपने ही ीवन में इतने करे l हर ऐसा इसिं ान अपने व अपने अतीत के बारे मंे व्यस्त रहते हैं जक उनमे से अजिकतर माता-जपता से जकसी से बातें करने को लालाजयत रहता है l कई बार अलग ही रहना पसदंि करते हैं l अपनी गहृ स्र्ी कभी बस मंे या कहीं और ाते हुये ऐसे लोग जमल अलग बसाना चाहते हंै l और अगर जकसी तरह ाते हैं ो अके लपे न से ग्रस्त हंै और बातें करने को माता-जपता को रखते भी हैं तो उन वदृ ्धों का भखू े रहते हैं पर उनमे कोई जदलचस्पी नहीं अजस्तत्त्व घर में ैसे एक कबाड़ की तरह हो ाता है जदखाता l घोर अके लापन सहना भी बहुत भयानक l होता है l आ की पीढ़ी मंे सभी लोग अपनी ज िदं गी में इस तरह व्यस्त हंै जक कभी-कभार समय जमलने ब उम्र से बबे स उनके हाड़ हो गये पर भी कोई बड़-े बढ़ू ों के पास बठै ना पसदंि नहीं तो वे अपने ही घर में कबाड़ हो गये l करता l कािी समय पहले लोगों को बड़ों का वह अके लपे न के जशकार हो ाते हैं l जकसी तरह सम्मान करते हयु े उनसे बातें करने में और उनकी खाना-पीना तो जमल ाता है पर उन्हें अके लपे न से सहायता करने में बहुत अच्छा लगता र्ा l अब झू ना पड़ता है क्योंजक पररवार के सदस्य अपने लोग समय होने पर भी बढ़ू ों से बात करने की व ाय जिया-कलापों मंे व्यस्त रहते हैं और ये नहीं ानते अपनी जकसी हाबी में व्यस्त रहना अजिक पसदंि जक वदृ ्ध माता-जपता का भी मन होता है जक कोई करते हैं l कु छ देर बैठकर उनके सार् भी बातंे करे l बढ़ु ापे में ीवन के िम मंे ये दजु नया, कु छ पाती और कु छ है अके लापन इसंि ान का बहतु बड़ा दशु ्मन होता है l खोती और अगर उनसे उनकी उम्र का कोई जमलने वाला पर ब आती उम्र की सधंि ्या, तो बेबस होकर दजु नया आ ाता है तो घरवालों को अखरने लगता है l रोती l आ कल माता-जपता की सेवा वाली ो परु ानी ीवन मंे वदृ ्धावस्र्ा पतझर के मौसम के समान है कहावतंे होती र्ीं जक उनके चरणों मंे स्वगथ होता है ज समे पेड़ के झरते पत्तों की तरह एक-एक कर अगिं तो वो सब झठू ी साजबत हो रही हंै l पजिमी देशों मंे ढीले होने लगते हैं l वदृ ्धावस्र्ा मंे बहतु अजिक तो सालों से बसे भारतीयों के बच्चे पजिमी सभ्यता पररवतनथ आने लगते हैं l स्वभाव में भी जचड़जचड़ापन मंे जलप्त होकर अब शादी के तरु ंित बाद अपने अलग आ ाता है l शरीर और याददाश्त दोनों ही कम ोर घर मंे रहन पसिंद करते हैं l और भारत में भी बच्चे अनकु रण करने लगे हंै l घर मंे बोर होकर वदृ ्ध लोग Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 पाकथ मंे या शाजपगिं सटंे र आजद में बठै े अपनी हमउम्र लोग जमल लु कर बठै ते र्,े बातंे करते र्े और अब के लोगों से बजतयाकर समय गु ारते हंै l कई बार तो उसकी गह और तरह के मनोरिं न के सािनों ने ले उनके बच्चे उन्हंे वदृ ्धाश्रम मंे रहने भे दते े हैं l ली है l वदृ ्धाश्रम मंे भी रहने के जलये तो पसै े की रूरत होती है l तमाम लोगों के पास इतना पैसा नहीं होता यहाूँ अब इगंि्लडंै के हर शहर में चरै रटी पर चलने l जकतने ही वदृ ्ध अपने पैरों की दशा से म बरू वाली ऎसी संसि ्र्ायंे हंै ो जबना मनु ािा बनाये वदृ ्धों चलन-े जिरने में भी असमर्थ होते हैं l वह अपने के जलये अपनी सेवायें अजपथत करती हंै l ये सिसं ्र्ायें पररवार पर स्वयिं को बोझ समझने लगते हैं l लजे कन ऐसे स्वयिंसेवकों की तलाश करती हैं ो स्वेच्छा से असल मंे उनका मन चाहता है जक कोई कभी-कभार अपना कु छ समय चलन-े जिरने में असहाय जकसी उनसे कु छ दरे बठै कर बात कर ले l सच में उनकी वदृ ्ध को दे सकंे l उनसे कु छ देर बजतयाकर उनका मन जनरीह दशा पर दया आती है l आ के माने मंे भी बहला सकंे और उन्हें कु छ दरे बाहर भी ले ाकर वदृ ्धों को जकसी के सहारे की बहुत रूरत है l पर सैर करा सकंे l बढ़ू ों के जलये समय दने ा और उनके आ के व्यस्त ीवन में बच्चे शादी के बाद कभी जलये ियै थ रखना एक बड़ी चनु ौती है l पर इस दशे में जवदशे मंे बस ाते हंै या कभी वसै े ही अलग रहने वास्तव में तमाम ऐसे लोग हंै ो इस काम मंे लगते हैं l जनसतिं ान व सितं ान हर तरह के लोगों को वदृ ्धावस्र्ा में अके लेपन का सामना करना पड़ रहा जदलचस्पी ले रहे हंै और ये काम करना चाहते है l ऐसे लोगों के जलये जकसी को भी समय जनकालना बहतु मजु श्कल हो रहा है l बच्चों को हैं l उनके जलये पसै ा ही हर खशु ी नहीं है l ब कहते हुये सनु ा ाता ह,ै '‘वी हवै गाट टू जलव आवर कोई बढ़ू े और असमर्थ लोगों से उनके घर मंे ाकर ओन लाइि’’ l तो जिर वदृ ्ध लोगों की दखे भाल कु छ समय हसूँ ता-बोलता है तो उन बढ़ू ों मंे एक नई कौन करे? कौन उनका सहारा बन?े हमारी ज िंदगी में ऊ ा,थ एक नई ान सी आ ाती है l स्वयंिसवे क ज न ची ों की अहजमयत होती है उनके सगिं कु छ जकसी भी उम्र के हो सकते हंै l चाहें तो दोस्त और चनु ौजतयों का भी सामना करना पड़ता है l बचपन मंे ब स्कू ल से आकर होमवकथ करते हंै बच्चे तो वह पड़ोसी भी इनमे शाजमल हो सकते हैं l उन सबके एक चनु ौती होती है l ब शादी होती है तो कई ज म्मवे ाररयों की चनु ौती और मा-ँू बाप बनने पर जलये ये एक कीमती अनभु व है ो उनके आने वाले बच्चों को पालते हयु े जकतनी चनु ौजतयों और बढ़ु ापे को लेकर आखूँ ें खोलता है l अपने समय मे कजठनाइयों का सामना करना पड़ता है l कई ची ों से कु छ समय ऐसे रूरतमदंि लोगों के जलये खशु ी से के बारे में अजनच्छु क होते हुये भी इन सभी बातों को जनकाल कर कभी अके ले या कभी उन्हें ग्रपु मंे लोग ज म्मदे ारी समझदारी से जनभाते हंै l कोई उनसे पीठ टहलाने ले ाते हैं l कम्यजु नटी सटंे सथ मंे भी ऐसे पलट कर भागता नहीं l ऐसा करने पर इसंि ान को लोगों के जलये मनोरंि न के सािन हैं l वहाूँ ाने पर अपराि बोि होता है l इसी प्रकार वदृ ्ध लोग भी और लोगों से बातंे करना, बनु ाई और पजंे टिंग आजद हमारी ज दिं गी का जहस्सा होते हैं और उनकी दखे रेख करना, तमाम तरह के मनोरंि नों मंे भाग लेना, चाय- एक चनु ौती के समान है l तो उनके जलये आ कल नाश्ता और लिंच सार्-सार् करना आजद बातंे वदृ ्ध लोग क्यों नहीं कु छ समय जनकाल पात?े क्या बच्चों लोगों को खशु ी देती हंै l स्वयंसि वे क ऐसे लोगों को को पालन-े पोसने के बाद बढ़ु ापे में माता-जपता की कभी-कभी सारा जदन की आउजटंिग पर ले ाते हैं l अहजमयत नहीं रहती? पहले तो पररवार के सभी चाहंे वह पाकथ हो या समदु्र का जकनारा, म्यजू यम या जसनमे ा l कई बार कु छ जदनों को कहीं कोच में ले ाकर बाहर जकसी शहर मंे भी घमु ाने ले ाते हंै l इस देश मंे एक और खाजसयत है जक यहाूँ जवकलांगि लोगों के जलये हर गह तमाम सजु विायंे प्रदान की गयी हंै l होटल, स्टेशन, रेस्टोरंेट, पाकथ Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 और बड़ी-बड़ी जबजल्डिगं ों मंे हर गह इनके जलये अलग से खास टॉयलेट होते हैं l हाूँ आराम से अपने आप उठ या बठै सकते हैं l बस ट्रेन या कोच आजद मंे भी इस तरह लोगों के जलये चढ़ाने-उतारने व बैठने आजद की तमाम सजु विायंे होती हंै l सीटों पर ऐसे लोगों को बठै ने की प्रार्जमकता पहले दी ाती है l और कु छ खास सीटंे तो ऐसे ही जवकलागिं लोगों के जलये होती हंै l भारत के ढाचँू े में भी तब्दीली की रूरत है l सार् मंे लोगों पर यजद बढ़ू ों से कु छ दरे बातचीत करने की हाबी हावी हो ाये तो जकतने ही बढ़ू ों के ीवन में कु छ पलों की बहार आ ाये l अजिकतर बढ़ू े लोग अपने पररवार व अतीत के बारे में बजतयाना चाहते हंै l इससे उन्हें बहुत सकु ू न जमलता है l तो ऐसे लोगों को सकु ू न दके र उनके ीवन मंे कु छ पलु क पैदा करते हुय,े उल्लास की िपू जबखरे ते हुये उनके ीवन के अनभु वों से बहुत कु छ सीखा भी ा सकता है -शन्नो अग्रवाल Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 सन्नाटों का प्रकाशपर्व मधदु ीप दशहरे बाद के बीस ददन जसै े नीले घोड़े पर सवार होकर उड़े जा रहे थे . बगं लों में हो रही साफ-सफाई और रँगाई-पतु ाई ने सदू ित कर ददया था दक प्रकाशपवव नजदीक आ गया है . ज०े के ० व्हाइट सीमटंे वाली वाल-पटु ्टी तथा एदशयन पटंे से दीवारें बोल उठी थीं मगर सम्भ्रान्त कॉलोनी की इन दीवारों के बीि पािँ आदशयाने ऐसे भी थे दजनकी दीवारंे वर्षों से बोलना भलू गई हैं . इनके वाररश अपने बजु गों को दशे में अके ला छोड़ दवदशे ों मंे जा बसे हंै . ये बजु गु व सबु ह की सरै से लौटकर ऊँ िे परकोटों से दघरे अपन-े अपने आलीशान बंगलों के लॉन मंे पड़ी आराम कु दसयव ों मंे पसरे एकटक सामने दखे ते रहते हंै . माली की खरु पी िलती रहती है और गटे पर दरबान मसु ्तदै खड़ा रहता है मगर उनकी तरफ इनका ध्यान नहीं होता . इनका ददन तो तब आगे बढ़ता है जब गटे से कामवादलयाँ प्रवेश करती हैं . साफ़-सफाई होती ह,ै िाय-नाश्ता दमलता है और दोपहर का भोजन पके होता है . कु छ दरे को सन्नाटा टूटता है मगर बते ाल की तरह आकर दफर पसर जाता है . इन बजु गों के दलए दीवाली-दशहरे का कोई अथव ही नहीं रह गया है . दवदेशों से अपनों की फोन-काल्स, हाय- हलै ो, हपै्पी दीवाली, हपै ्पी दशहरा... और बस...! ये सभी शरीर से दबल्कु ल स्वस्थ लगते हैं मगर एक टूटनभरी थकान इनके पोर-पोर में भरती जा रही है . ये पािँ ों प्रदतददन आपस मंे दमलते ह,ंै लम्भ्बी-लम्भ्बी गप्पें मारते ह,ैं अपनी-अपनी जवानी की यादें दोहरातें हंै मगर इस थकान को अपने से अलग नहीं कर पाते . आज दीवाली की प्रभातवले ा में जब ये पािँ ों सबु ह की सरै के बाद एक परकोटे की लॉन मंे पड़ी कु दसयव ों मंे जाकर धसँ गए तो उस परकोटे की ऊँ िी दीवारंे बहुत दरे तक फु सफु साहटें सनु ती रहीं . अपन-े अपने मादलकों के परकोटों को बन्द पाकर वे पािँ ों कामवादलयाँ जब इस परकोटे मंे पहिुँ ीं तो वहाँ दनश्छल दखलदखलाहट फै ली हईु थी . वे कु छ न समझ सकीं और हरै ान-परेशान सी उनके ददन को आगे बढ़ाने के दलए अन्दर िली गई ं. सबु ह का नाश्ता एकसाथ करते हएु वे सभी अपनी थकान को समटे कर एक दनर्यव पर पहुिँ िकु े थे . लक्ष्मी-पजू न के बाद जब सम्भ्रान्त लोग अपन-े अपने पररवारों के साथ कॉलोनी में फै ले प्रकाशपवव को देखने छतों पर पहिुँ े तो उनकी आखँ ों के सामने अद्भुत नजारा था... साथ लगी कामगारों की कॉलोनी मंे मोमबदियों, दीयों और दबजली की लदड़यों की रोशनी का झलमला फै ल रहा था... सम्भ्रान्त कॉलोनी के वे पािँ ों बजु गु व बच्िों के साथ गोल-गोल घमू ते हएु ताली बजा रहे थ,े छोटे-छोटे पटाखे छु ड़ा रहे थे . ००० --मधदु ीप 138/16 दिनगर, ददल्ली-110 035 मो० - 09312400709 Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 बडु ्ढें रोचिका शर्ाा लीला अपने इकलौते पोते के प्यार र्ंे पागल थी चकिं तु र्जबरू ी जब से बटे े का तबादला हो गया था चसर्फा गर्ी की छु ट्टियों र्ें ही पोते से चर्ल पाती । जब उसका पोता छु ट्टियों र्ें उसके पास आता वह उसकी पसदंि के खाने , चखलोनों एविं चकताबों का भंिडार लगा दते ी ,चनत नये पकवान चखलाती । एसे करते पाािँ वर्ा बीत गये और पोता पूरे सोलह वर्ों का हो गया । तभी एक चदन उसके बेटे का फोन आया और बटे ा बोला बहू का एक्सीडंेट हो गया है तो र्ाँा तरु ् आ जाओ घर और अस्पताल दोनों ही संिभालने पडेंगे । बिे ारी ने झट से अपना सूटके स तैयार चकया और रवाना हो गयी अपने बेटे के घर जाने के चलए । र्न र्ें बहू के एक्सीडेंट का तो दखु था चकंि तु अपने पोते से चर्लने की खशु ी भी थी । बटे े के घर पहिाँ ते ही पहले चदन से ही परू े घर एविं अस्पताल की च़िम्र्दे ारी सभंि ाल ली । उसके बटे े ने भी कहा र्ाँा पोते के स्कू ल व सोने -उठने के टाइर् का थोडा ध्यान रखना, परीक्षा ऩिदीक है सो उसे थोडा पढ़ने के चलए भी कह दने ा । लीला ने भी अपना सर्झ पोते के रख-रखाव र्ें कोई कर्ी न छोडी । तभी एक रात पोते के कर्रे र्ें दधू का चगलास ले कर गयी और पोते को अपने चर्त्र से बात करते सुना । पोता कह रहा था “यार क्या करँा ये बुड्ढी सारे चदन पहरेदारी करती है ,जब से आई है नाक र्ें नकै ल डाल रखी है , न खदु िैन से रहती है न र्ुझे बैठने दते ी है \" यह सुन लीला के तो परै ों तले ़िर्ीन चखसक गयी । िपु िाप दधू का चगलास टबे ल पर रख कर्रे से बाहर आ गयी । र्गर आँसा ू थे चक थर्ने का नार् ही न ले रहे थे …… रोचिका शर्ाा , िेन्नई डाइरेक्टर, सूपर गनॅ ट्रचे डंिग अकॅ डर्ी www.tradingsecret.com Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 “बजु ुर्ग सम्मान : तथाकथथत आधुथनकता के दौर , हम एक समहू से हट कर अपने श्चलए सोचने को वक़्त मंे संघर्ग करता थिर्य” एवं ससं ाधन जटु ा पाये ह,ैं ये भी आधशु्चनकता का ही तोहफ़ा ह,ै लेश्चकन इस दौरान हम मंे एक और प्रवशृ्चत अखिलेश कु मार गौतम पैदा हईु , अपनी बशु्चनयादों के प्रश्चत लापरवाह होने की प्रवशृ्चत , समय के साथ साथ हम श्चजतने वस्तशु्चनष्ठ होते अगर पश्चिमी पररभाषाओं के आधार पर अपने गए उतने ही सीश्चमत आयामी और संकीणत होते गए , अतीत की, अपने वतमत ान के साथ तलु नात्मक श्चजतना हम भश्चवष्य की चमक-दमक के प्रश्चत मगु्ध होते पड़ताल करें तो आज का दौर यक़ीनन आधशु्चनकता गए उतने ही पीछे छू टते वक्त और व्यश्चक्तयों के प्रश्चत का दौर कहलाएगा । ये दौर लोगों को एक तरफ बहे द उदासीन होते गए । आधशु्चनकता ने जहां एक तरफ हमें स्वततं ्र और दसू री तरफ अत्यश्चधक श्चनयंश्चत्रत जीवन सोचने का एक श्चबलकु ल नया आयाम श्चदया वहीं दसू री शलै ी को एक साथ लके र जीने के श्चलए तयै ार करता तरफ हम मंे अपने से श्चभन्न श्चवचारों के साथ रहने का प्रतीत होता है । हर दौर की अपनी कु छ जरूरतें और असंतोष और उन्हे श्चपछड़ा घोश्चषत करने की प्रवशृ्चत भी श्चवशषे ताएँ होती, जो उस दौर मंे रहने वाले लोगो को श्चवकश्चसत की । इस परू ी प्रश्चिया मंे हमारे समाज के प्रश्चशश्चित करने और आचरण करने की कु छ सीमाएं बजु गु त , जो अपने के जीवन के अशं्चतम पड़ाव मंे अश्चधक श्चनधारत रत करती हैं । यह प्रश्चिया इतनी सतत एवं अमतू त सहयोग और सवं ेदनशीलता की मागं करते ह,ंै कहीं ना होती है की इससे होने वाले बदलावों को हम अक्सर कहीं मखु ्य धारा से अलग-थलग हो गए । आज जब स्पष्ट रूप से दखे नहीं पाते बस अश्चधक से अश्चधक हम मानवतावाद की श्चवस्ततृ पररभाषाएँ गढ़ रहे ह,ंै वहीं महससू ही कर पाते हंै , इसका कारण शायद समय की हम दसू री तरफ मानवतावाद के सरलतम व्यवहार को अपिे ाओं का दबाव या गहन श्चवश्लेषण की कसरत के यँू ही अनदखे ा करते हएु आगे बढ़ रहे ह,ंै यहाँ प्रश्चत उदासीनता हो सकता है । वतमत ान में हम सब महत्वपणू त सवाल ये उभर के सामने आता है की ऐसा आधशु्चनकता को लक्ष्य बना के दौड़ रहे हंै एवं श्चजन कब तक चल सके गा । यह श्चवषय वतमत ान भारत में पररभाषाओं को हम इस दौड़ का आधार मानते हैं बजु गु ो से जड़ु े मदु्दों , चनु ौश्चतयों और उसकी श्चस्थश्चत के उनके अनसु ार ये दौड़ एक अतं हीन दौड़ है । यक़ीनन सदं भत में एक श्चवशेष श्चवश्लेषण की मांग करता ह।ै आधशु्चनकता ने हमको काफी कु छ श्चदया है , हमारे जीवन को सरल बनाने का लगभग हर एक यंत्र श्चदया है Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 बदलिर् िर्शर्तजक ढर्चँा र् अके लापन – अके लेपन की समस्या बढ़ु ापे में सामने आपने वाली कु छ प्रमखु चनु ौश्चतयों मंे से एक ह,ै एक श्चदन प्रश्चतश्चदन हमारा समाज बदल रहा ह,ै उसके सामाश्चजक ससं ्था हलै ्प ऐज़ इखं िया के अध्ययन की व्यवहार और उसके सरोकार सब बदल रहें है । इन माने तो दशे में इस समय लगभग 3 करोड़ बजु गु त श्चकसी बदलावों में एक बड़ी भशू्चमका हमारी बदलती जीवन न श्चकसी प्रकार से अके लेपन के श्चशकार हंै । बच्चों का शलै ी , दरू होते कायित ते ्र और बाज़ार की जरूरत,ंे कहीं और जा कर बस जाना , अपने साथी को खो दने ा श्चनभा रही हैं । अब पररवारों का ढाचँ ा भी वो नहीं रहा , बीमाररयाँ आश्चद जसै े कारणों की वजह से बजु गु त जो आज से कु छ दशक पहले तक था । जसै े जसै े हम अक्सर अके ले हो जाते हैं । जीवन के श्चजस पड़ाव में स्वकंे श्चित होते गए वसै े वसै े पररवार भी संयकु ्त से एकल उन्हें श्चकसी के साथ की , श्चकसी की दखे भाल के सबसे होते गए , इस सभी बदलावों के श्चलए हम मात्र कु छ अश्चधक आवश्यकता होती है , उस पड़ाव मंे उसके कारकों को ही श्चजम्मदे ार नहीं ठहरा सकत,े अश्चपतु इस साथ कोई नहीं होता , श्चजसके कारण अवसाद और सबं ंध मंे सभी महत्वपणू त कारकों की खोज करने श्चलए असरु िा की भावना उनमे घर करने लगती है । श्चलए हमे एक गहन और श्चवस्ततृ श्चवश्लेषण की अश्चनवायत जरूरत होगी लेश्चकन हम यह श्चवश्वास के साथ आय के सीखमत स्रोत – चँशू्चक उम्र के इस पड़ाव मंे वे कह सकते हैं की इन बदलावों ने मानवीय संबधं ों की आश्चथकत रूप से उत्पादक नहीं रहते इसश्चलए उन्हे बनु ावट मंे भी कु छ मलू भतू बदलाव श्चकए । इन आश्चथतक रूप से श्चकसी पर श्चनभतर होना पड़ता है और बदलावों ने हमारे घरों के बजु गु ों पर प्रत्यि ही प्रभाव इस श्चस्थश्चत में उनको अक्सर अपनी गररमा और डाला है जो की काफी हद तक नकारात्मक ही है, आत्मसम्मान के साथ समझोता करने के श्चलए बाध्य क्योंश्चक वे संबंधो की बनु ावट में ऐसे स्थान पर हैं जहां होना पड़ता है । कु छ अध्ययन हमे बताते हैं की पसै े पर उन्हे अश्चधक देखभाल और सहारे की जरूरत थी, की तगं ी के कारण भारत मंे अश्चधकांश बजु गु ों को एक लेश्चकन इन पररवतनत ों की वजह से वे अके ले ही रह गए उम्र के बाद भी काम करना पड़ता ह,ै जबश्चक वो उस । काम को करने के श्चलए ना शारीररक रूप सिम होते हंै और ना ही मानश्चसक रूप से । हलै ्प ऐज़ इखं िया ससं ्था ििमशर्न शी कु छ प्रशुख चुनौतिकों िे िर्शनर् क िे बजु ुर्म Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 का ही एक अध्ययन हमे बताता है की भारत में 65- सरकारी संस्थाओं और कु छ सरकारी योजनाओं से 70 वषत की आयु के बाद 90% बजु गु ों को अपने आगे बढ़ कर इस श्चवषय मंे सोचा जाए । गज़ु ारे के श्चलए श्चकसी ना श्चकसी प्रकार के काम में लगे रहना होता है । आधुतनकिर् कर् िर्स्ितिक रर्म – हम अक्सर आधशु्चनकता का अथत पश्चिमीकरण से लते े हैं , जो की स्वास््य समस्या- उम्र के इस पड़ाव पर अपनों के साथ आधशु्चनकता की एक भ्रामक समझ का प्रचार करती है साथ जब अपना स्वास््य भी साथ छोड़ने लगता ह,ै तो । पश्चिम से प्ररे रत जीवन शलै ी , महगं े यतं ्र , श्चवलाश्चसता बजु गु ों के श्चलए श्चस्थश्चत और भी भयानक हो जाती है । और महगं ी गाश्चड़यों को जब हम आधशु्चनकता का सीश्चमत आश्चथकत साधन और सस्ती स्वास््य सवे ाओं पयातयवाची मान लेते ह,ंै तो आधशु्चनकता की की बदतर हालत बजु गु ों को और अश्चधक तोड़ दते े हैं । वास्तश्चवक पररभाषा से स्वतः ही दरू होते चले जाते है । वास्तव मंे आधशु्चनक होने का अथत है आधशु्चनक सोचन आज भारत को जवान लोगो का देश कह कर इसमे ना की आधशु्चनक साधनों का प्रयोग करना । दीपाकं र अपार सभं ावनाओं को तलाशा जाता है , जो लाज़मी गपु ्ता अपनी पसु ्तक “खमसटेकन मॉिननखनटी” में भी ह,ै लेश्चकन एक वक़्त के बाद मनषु्य जीवन का वास्तश्चवक आधशु्चनकता की कु छ श्चवशषे ता सझु ाते हैं – अशं्चतम पड़ाव बढ़ु ापा ही है । वषत 2009 में भारत में लगभग 9 करोड़ लोग 60 वषत की आयु से अश्चधक थे  व्यखि की गररमा को बनाये रिना और अगर भश्चवष्य का अनमु ान लगाया जाये तो 2050  सावभन ौखमक खनयमों का पालन करना तक ये आकं ड़ा 32 करोड़ के आसपास पहुचँ ने की  जन्म के खवशषे ाखिकार पर व्यखिगत उम्मीद है । यहाँ मंे ये तकत देने का प्रयास श्चबलकु ल नहीं कर रहा ह,ँ की 50 वषत बाद भारत में श्रमशश्चक्त और उपलखधि की उचाई प्रश्चतभाओं की कु छ कमी होने वाली ह,ै यहाँ में श्चसफत ये  सावजन खनक जीवन में जवाबदेही कहना चाहता हँ की हम कब तक समाज के इस वगत के प्रश्चत असंवदे नशील हो कर चल पाएगं े , क्या आज इस प्रकार ये श्चवशेषताएँ आधशु्चनकता को मानवीय वक़्त नहीं आ गया है की मात्र कु छ मटु्ठी भर गैर मलू ्यों और व्यश्चक्त की गररमा में स्थाश्चपत करती हंै । परन्तु हम अपने दशै्चनक जीवम मंे आधशु्चनकता का कोई और ही अथत लगाते ह,ैं श्चजसका पररणाम हमें समय Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 समय पर देखने को श्चमलता है , कहीं मानवीय मलू ्यों [email protected] के ह्रास के रूप में तो कहीं खोखले होते संबधं ों के रूप में । अब जरूरत है की हम आधशु्चनकता का सही अथत पीएचडी शोधाथी , समझे और मानव जीवन के वास्तश्चवक लक्ष्यों के प्रश्चत जागरूक हों । के न्िीय श्चशिण ससं ्थान , श्चशिा श्चवभाग , श्चदल्ली श्चवश्वश्चवद्यालया । तनिकषम – अब समय आ गया है की हम थोड़ी देर रुक कर उनके खवषय में सोचे , खजन्होंने अपना परू ा जीवन समखपनत कर हमें नयी खदशाएँ िोजने में मदद की और हमंे अपने कु शल खनदेशन में आिखु नकता की चौिट पर ला कर िड़ा कर खदया है । आज हमे कु छ वक़्त खनकालना होगा उनके खलए, खजन्हें हम अपनी रोजमरान की दौड़ मंे कहीं पीछे छोड़ चकु े हंै । भखवष्य के खलए सोचना खकसी भी मायने मंे गलत नहीं ह,ै लेखकन उसके खलए अपनी बखु नयादों की उपके ्षा करना यकीनन खकसी भी तरह से तकन संगत नहीं ठहराया जा सकता है । अब जरूरत हैं की हम आिखु नकता की खिसीखपटी पररभाषाओं को छोड़ कर आिखु नकता के वास्तखवक मायनों को समझे, जो खकसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने से पहले से पहले मानवीय मलू ्यों के प्रखत हमारी ईमानदारी सखु नखित करवाने पर बल दते े प्रतीत होते हंै । अखिलेश कु मार गौतम Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 भर् िेंक िशर्ज शी िृद्धर्िस्थर् : िशक, भजू मका होनी िाजहए, सबका अलग अलग िशर्ज औ तस्थति उत्तरदाजयत्व तय जकया िाता ह|ै सबके अलग अलग प्रजतमान जनधारत रत जकये िाते ह|ैं सबकी अलग रतनल कु शर् पर्ण्डेक अलग भजू मकाएँा स्पष्ट की िाती ह|ैं छोटे बड़े का भाव, आदर-सम्मान का भाव व्यजि के हृदय में यहीं यह दशे भारत, जिसमे हम वततमान हैं और से उत्पन्न जकया िाता है| आदशत, करुर्ा, क्षमा, जिसे जवश्व-गरु ु के रूप मंे िानने, समझने तथा बताने यािना, दया, परोपकार आजद जितने भी मानवीय का प्रयत्न करते ह,ंै यह हमारी अजभलाषा भी होती है गरु ् हंै वे सबके सब मानव को यही से प्राप्त होते ह|ैं जक ससं ार-ससं जृ त में जनवास करने वाला कोई अन्य अब इसे समय का बदलाव कहंे या पररवततन का व्यजि इस देश को उसी रूप में िाने, समझे और िब तकािा, उपयितु समस्त पारंपररक श्रोत जिनपर हम बात आये कभी तो इसी रूप में व्याख्यायाजयत भी करे| अब तक गवत करते आए ह,ंै और िो परंपरा से इसके पीछे िो सबसे बड़ी विह है वह इस देश की सबको एक एक समान उपहार- स्वरुप जमलते आये संस्कृ जत ह,ै इस दशे का अपना आदशत ह,ै मानव हंै या तो वे ख़तम से हो रहे ह,ैं इजतहास के पन्नों में िीवन को सनु ्दर साथतक और सरु ुजिपरू ्त वातावरर् मंे जसमटते िा रहे हंै अथवा मतृ प्राय हो गए ह|ंै पजु पपत, पल्लजवत और संस्काररत करने के उद्दशे ्य से इस दशे के ऋजषयों, मजु नयों और महापरु ुषों द्वारा संशय इस बात में भी नहीं होना िाजहए कजल्पत, सजृ ित और जनजमतत समाि का एक बड़ा जकसी को जक पररवार की िो जस्थजतयां कभी हमारे योगदान रहा ह|ै समाि, िो जवजभन्न प्रकार के ह्रदय मंे गवानत भु जू त की सिनत ा करती थी आि वे ससं ्थाओ,ं सगं ठनों एवं समहू ों का समजन्वत रूप ह,ै अपना पारंपररक आधार खो िकु ी ह|ंै हम दो हमारे जिनमे िीवन-यापन करते हएु सभी प्रकार के जस्थजत- दो की अवधारर्ा इस तरह से भारतीय सामाजिक पररजस्थजत को झेलना और सहना हम अपना कतवत ्य पररवशे पर हावी होने लगा है जक तीसरे की ही नहीं समझते, गवत भी महससू करते ह,ंै उन सभी उपजस्थजत मात्र से हमारे अन्दर जविलन की-सी सामाजिक ससं ्थाओं में पररवार की अवधारर्ा जस्थजत पदै ा हो िाती ह|ै ऐसा प्रायः माना िाता है जक व्यवहाररक स्तर पर मानव द्वारा कजल्पत सबसे सनु ्दर इस जवडबं ना की प्रमखु विह वह औरत होती ह,ै िो और साथकत पररकल्पना जसद्ध हुई ह|ै यह कहना जक व्याह करके लाई िाती है| उसका वह नवीन सामाजिक पररवेश में आि िीवन-मलू ्य के जितने आकषरत ् ही पजत को पररवार से अलग होने के जलए भी आयाम हैं कहीं न कहीं वे सबके सब इस पररवार बाध्य करता ह|ै पर क्या इस सच्िाई से बिा भी िा के माध्यम से ही संस्काररत और प्रिाररत ह,ैं जकसी सकता है जक दोष उस पजत का और उसके पररवार प्रकार का अजतश्योजि नहीं होगा| सत्यं जशवं सनु ्दरं, का भी उतना ही होता है, क्योंजक वे उसे ठीक से वसधु वै कु टुम्बकम, आजद जितनी भी उजियााँ समझने की कोजशस ही नहीं करते| यह एक प्रिजलत सामाजिक आदशत की प्रजतष्ठापना करती हैं और लोकोजि है जक “ताली एक हाथ से नहीं बिती|” मानव-कल्यार्-जहत जवद्वानों, आिायों द्वारा दोनों हाथों के परस्पर सहयोग से ही ताली मंे ध्वजन- िनसामान्य को सझु ाई गयी ह,ैं वे सब इसी पररवार जस्थजत का सिृ न होता ह|ै दरअसल, हमारे यहााँ की देन ह|ंै पररवार जवद्वानों द्वारा सझु ाए गए अब तक संयिु पररवार की िो अवधारर्ा रही है वह बहतु ही के समस्त प्रजतमानों का आदशत इसजलए भी माना िजटल और दरु ूह रही ह|ै हम कभी कभी िब िाता है क्योंजक मानव व्यावहाररक ससं ार में िलना पाररवजे शक-जस्थजत-जवशषे का िायिा लने े की यहीं से आरम्भ करता ह|ै यहीं से उसे अनेक प्रकार कोजशश करते हंै तो प्रायः होता ये है जक एकपक्षीय के नीजत जसखाए िाते ह|ैं ररश्तों के प्रजत जकसकी क्या जनपकषत जनकालकर अपने समीक्षात्मक दृजष्टकोर् पर Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 प्रसन्न हो उठते ह|ै आलोच्य जवषय जवल्कु ल भी जक वे शहर छोड़कर गावँा िा नहीं सकते और यजद वे इतना सरल नहीं है जक जकसी एक पक्ष के आधार पर िाएँा भी तो जकस आधार पर? कौन देगा उन्हंे िीवन- जनर्तय जकया िा सके | यह प्रयास दो जवन्दओु में स्पष्ट यापन का दजै नक खित? कौन पढ़ायेगा उनके बच्िों जकया िा सकता ह|ै को ? और वे िो माता-जपता गाँाव छोड़ने के जलए जवल्कु ल भी रािी नहीं ह,ैं उनके दवा-दारू से लके र (१) खान-पान की जिम्मदे ारी कै से और कौन जनभएगा? इस जस्थजत पर यजद ध्यान से जविार जकया िाय तो ध्यान दने े की िरूरत है जक समय तिे ी से िहां पजत-पत्नी की मिबरू ी ह,ै बबे सी ह,ै लािारी ह,ै बदला ह|ै समय-बदलाव के साथ साथ आि के शहर का न छोड़ना और िाहकर भी माता-जपता के जस्थजत-पररस्थजत के स्वरुप मंे भी व्यापक पररवतनत साथ िीवन के अनमोल क्षर् न जबता पाना, वही ँा हुए ह|ैं अब वह समय नहीं रहा जक सब गावं ों मंे ही माता-जपता की अपनी जिद होती ह,ै घर और पररवशे रह|ंे जदन भर जकसी तरह से खा-पी-टहलकर समय जवशेष को न छोड़ने की| इस अथत मंे जक उनकी गिु ार ले िायंे| यजद सखु परू ्त िीवन की पररकल्पना गहृ स्थी, उनका समाि, उनके नात-ररश्तेदार उनसे को साकार करना है तो बाहर जनकलना ही पड़ेगा| जबछड़ िायगंे े, दरू हो िायगें े| माता-जपता की अपनी “देश की िोरी परदेश की भीख” कोई बहुत जदनों जववशताएँा हंै तो पजत-पत्नी की अपनी जववशताएाँ हंै| की कहावत नहीं ह|ै यह आि के यवु ाओं की सोि बात िब आती है तो दोनों ही एक दसू रे पर आरोप- ह|ै यह सोि गलत भी नहीं है और बरु ा भी नहीं ह|ै प्रत्यारोप लगाते ह|ैं यह आरोप-प्रत्यारोप इन्हीं मात्र पर इस सोि के साथकत कदम का अनसु रर् जकतने तक सीजमत हो तो कोई बात नहीं| यह सम्परू ्त समाि व्यजि आसानी से कर पाते होंगे? इस मदु्दे पर गहन का जवषय हो उठता ह|ै समाि वह िो समझता कम जिंतन की आवश्यकता ह|ै एक समय वह था िब और उछालता ज्यादा ह|ै सारे यवु ा पथ-भ्रष्ट, आिार- गावाँ मंे कोई दो-िार ही परदशे ी के रूप में हआु भ्रष्ट, ससं ्कार-च्यतु और अनजै तक, अव्यावहाररक करते थे| शादी-जववाह की भी अिीब जस्थजत थी, तथा असामाजिक यहीं से हो उठते हैं िबजक सभी यह जकसी से जछपी नहीं ह|ै कहीं अनमले जववाह की माता-जपता जकसी भी जस्थजत और स्वभाव से क्यों न जस्थजत हुआ करती थी तो कहीं जनधनत ता और हों यकायक प्रासंजगक, करुर्ामजू त,त लावाररस, आजथकत तंगहाली की पररजस्थजत| गावाँ से जनकलने लािार तथा असहाय के रूप में यहीं से जवभजू षत के बाद परदशे में भी ऐसी सजु वधाएँा कहाँा हुआ करती होने लगते ह|ैं आरोप-प्रत्यारोप के आवरर् मंे क्षरर् थी जक व्यजि कमाता और अपने साथ-साथ अपने सम्परू ्त पाररवाररक जस्थजत की होती ह|ै आगे िलकर परू े पररवार का भरर्-पोषर् कर पाता| अब वे यही विह सामाजिक-जवघटन का प्रमखु कारर् जसद्ध जस्थजतयां नहीं रह गयी ह|ैं दसू रे िीवन साथी के होती ह|ै समाि की समाजिकत्व और पररवार की िनु ाव मंे भी अब एक पक्ष की मनमिी न होकर पररपरू ्तता अपने अक्षरु ् रूप में यथावत बनी रहे दोनों पक्षों की सहमजत आवश्यक हो गयी है| इसजलए अतं तः समझौता यहाँा भी उस यवु ा-वगत को पररर्ामतः पजत-पत्नी दोनों नौकरी के क्षेत्र मंे पदापरत ् ही करना पड़ता ह|ै क्योंजक प्रेमिदं ने “बढ़ू ी काकी” कर िकु े ह|ंै कहानी में कहा है जक “बढ़ु ापा बहधु ा बिपन का पनु रागमन हुआ करता ह|ै ” सि पछू ा िाय तो पजत-पत्नी के वनवास और माता जपता के प्रवास का दौर यहीं से सरु ु होता (२) ह|ै िहां माता-जपता ग्रामीर् पररवशे को छोड़ना अपनी तौहीनी समझते ह|ंै पररवार और परंपरा का जवछोह समझते हंै वही ाँ पजत-पत्नी की मिबरू ी ये हैं Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 दसू री जस्थजत एक और यथाथत का जदग्दाशनत कराती के बिाय एक और मागत का अनसु रर् कर बठै े, फल ह|ै माता-जपता, िो अपने िीवन का एक एक पल और फू ल दने े के बिाय बिं र हो िाए जफर उसकी हमारे पालन-पोषर् से लके र सवे ा-सशु ्रषू ा तक अजपतत आशाओं को, उसकी आकाकं ्षाओं को जकतनी क्षजत कर देते ह|ैं स्वयं के मान-सम्मान, सखु -सजु वधाओं पहिुं ती होगी? जकतना दःु ख होता होगा उसे? यह को त्यागकर दःु ख, गम, जवपदा का वरर् कर लते े ह,ंै वही िानता ह,ै जिसने उस वकृ ्ष को पाला, पोषा और इसजलए जक हमारा िीवन ठीक तरीके से गिु रता बड़ा जकया ह|ै उसे नहीं िो उसके हांड, मासं और िाए| समय-समाि के झझं टों में ही न जसमटकर पढ़- खनू द्वारा पोजषत होकर उस बिं र भजू म की शोभा जलखकर हम अनवरत जवना जकसी रुकावट के बढ़ाता ह|ै वह अपना परू ा िीवन ज्येष्ठ की तपती उन्नजत-पथ पर िलते िाए| पर िब हम उस लायक दपु हरी, माघ-पसू की कडकडाती ठण्ड और असाढ़, होते ह,ैं उन्हीं माता-जपता के एहसानों को, उनके द्वारा सावन की मसू लाधार बाररस मंे गिु ार ले िाता ह,ै जकए गए त्याग और बजलदानों को जवस्मतृ कर बठै ते लजे कन न तो उस वकृ ्ष की परवररश में कोई कमी ह|ंै उनका साथ, उनका प्यार, उनकी जशक्षाएं, उनका करता है और ना ही तो उसकी सनु ्दरता मंे जकसी आिाँ ल सबकु छ हमारे जलए अप्रासजं गक सा-हो प्रकार का आिं आने दते ा ह|ै यही जस्थजत समाि मंे उठता ह|ै जिनकी उपजस्थजत के जलए हम बिपन से माता-जपता की होती ह|ै वे लाख पररजस्थजतयों में जघरे लके र यवु ापन की दहलीि पर पहिुं ने तक व्याकु ल होने के बाविदू अपने सतं ान की सखु -सजु वधाओं रहते ह|ंै जिनका आिँा ल, जिनकी छाया मात्र छोड़ने का ख्यायाल रखते ह|ैं जखलान-े जपलाने से लेकर पढ़ान-े की पररकल्पना भर से हम जविजलत हो उठते हैं, िो जलखाने तक का परू ा बदं ोबस्त करते ह|ंै अपने अपना सम्परू ्त िीवन पररवाररक सखु का आनदं न सवु र्मत यी काया को सयू त की तपती अजग्न के सम्मखु लेने के बिाय खते , खजलहानों, कं पजनयों एवं इसजलए तपाकर कं कड़ीले पत्थर के रूप मंे पररवजततत फै क्टररयों में व्यतीत कर िाता है जक हमे जकसी कर दते े हंै जक िादँा की-सी शीतलता उनमें बराबर प्रकार के आजथतक पररजस्थजत का सामना न करना बनी रह|े यही िादाँ िब बड़ा और तेिोद्दीप होता है पड़े वही माता-जपता यकायक हमारे जलए सयू त के उस पररवजततत रूप को देखना तक अपनी अप्रासंजगक क्यों हो उठते ह?ैं क्या इसजलए जक अब तौहीनी समझता ह|ै उसके साथ व्यतीत जकये िाने वे पसै ा कमाने के काजबल नहीं रह िाते? अब वे वाले एक एक पल को अपने िीवन की सबसे अपना कायत स्वयं नहीं कर पाते, दसू रों पर जनभतर हो जवसंगजतपरू ्त समय के रूप में जिज्न्हत करता ह|ै िाते ह?ै या जफर इसजलए जक अब उनमंे वह शील, वह तिे , वह सहनशीलता नहीं रह पाती? ज्ञान से, ऐसा अक्सर दखे ा उन्हीं को िाता है िो बजु द्ध से, समय-समाि में िल रहे नवीन आिरजर्क पढ़-जलखकर जकसी बड़े ओहदे को प्राप्त कर लते े हंै| प्रवजृ त्त से समझौता कर पाने मंे उनकी पारंपररक सोि माता-जपता यजद ग्रामीर्-अिं ल मंे रहे ह,ैं जकसानों उनका साथ नहीं दे पाती, इसजलए? अथवा इसजलए का िीवन जिए ह,ंै यह उन पढ़े जलखे सज्िनों के जक उगते सरू ि से लेकर ढलते शाम तक की सम्परू ्त जलए और भी अजभशाप बन िाता है| भला वे उम्मीदंे वे अपने संतजत को सौंप बठै ते ह?ैं अफसर और उनके माता जपता गाावँ के अनपढ़, गंवार| क्या कहगे ा उनका वह समाि जिसमे वे रहते एक माली अपने बगीिे मंे बकृ ्ष इसजलए ह|ंै िो उनको बड़ा आदमी समझते हंै| इज्ित की लगता है जक वे फले, फू ले, और अपने सनु ्दर दृजष्ट से पलकें जबछाए रखते हंै| यजद यह िान िाएगें रूपाकषरत ् के माध्यम से उसके साथ-साथ सम्परू ्त जक इनके िन्मदाता जनरा अनपढ़, गवं ार, गंवई समाि को आनदं और खशु बू से आक्षाजदत करे| पर पररवशे से हैं जफर इज्ित मंे तो बट्टा लगने से रहा| िब वही वकृ ्ष उसकी इस अजभलाषा को परू ्त करने यह उनकी अनजभज्ञता ही होती है जक यह यशोगान Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 उन्हीं के सौभाग्य से प्राप्त हुआ ह|ै इनकी जिन रतनल कु शर् पर्ण्डेक इच्छाओं के प्रजत यवु ा-ह्रदय में क्षोभ उत्पन्न होता ह,ै शोधाथी, जहदं ी-जवभाग उन्हीं इच्छाओं को वे सहषत स्वीकार कर परू ्त जकया पिं ाब जवश्वजवद्यालय, िडं ीगढ़ १६००१४ | करते थे| माता-जपता के प्रजत संतान की ये उपके ्षा- मो० ८५२८८३३३१७ दृजष्ट समाि मंे एक जवकट और दयनीय पररजस्थजत को िन्म दते ी ह|ै इस पररजस्थजत से उपिे यथाथत का आभाष उन्हंे तब होता ह,ै िब माता-जपता का आवरर् उनके समय-स्वरुप पर प्रजतस्थाजपत होता ह|ै जवडबं ना की बात तो ये है जक समाि में इन जस्थजतयों का सतू ्रपात करने वाले ही आगे िलकर सामाजिक- जवघटन का रोना रोते ह|ंै पवू तिों को लके र वततमान समय में िो वाद-सवं ाद की जस्थजत पदै ा हईु ह,ै वह जकसी एक समय, एक जस्थजत या एक पररवशे मात्र की उपि नहीं ह,ै इस वस्तजु स्थजत का जिम्मदे ार आि की सम्परू ्त सामाजिक संरिना ह|ै आधजु नकता के बाद उत्तराधजु नकता की उपभोगजप्रय व्यजिवादी स्वाथजत लप्सा में सजं लप्त परंपरा जवरोधी असामाजिक प्रवजृ त्तयों से असयं जमत अधं ी मानजसकता ने हमारे मानजसक और बौजद्धक जस्थजत को पगं ु बना जदया ह|ै वतमत ान का आग्रही और अतीत को परू ्त रूप से नकार िकु ी यवु ा पीढ़ी भजवपय के जकस जस्थजत और जकस मागत का अनसु रर् कर रही ह,ै यह एक गहरे अथबत ोध का जवषय ह|ै यजद इस पर समय रहते गभं ीरता स न जविार जकया गया तो आने वाले जदनों में पररवार और समाि नाम की कोई जस्थजत संभव भी होगी, यह कहना और सोिना खलु ी आखँा ों स्वप्न दखे ने के बराबर होगा| यही जस्थजत यजद अनवरत वततमान रही तो दो राय इसमंे भी नहीं है जक क्या पता आने वाले समय में हर गली अनाथालय और प्रत्येक िौराहा वदृ ्धाआश्रम के रूप में निर आय|े Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 c<q kik ¼,d lkekftd fparu½ MkW-m’kkflag] izk/;kid “kkl-dU;k egkfo|ky; Vhdex<+ ¼e-ç-½472001 thou dh vafre voLFkk gS o`)koLFkkA euq\"; ds tUe ls ikz jHa k gksus okyh ifz Ø;k vkSj thou dh egRoiw.kZ fdUrq vfa re voLFkk gAS c<q +kik&c<q +kik og voLFkk gS ftlesa vuHq ko gS] ftlesa [kyq s gkFk ls nus s okyk vk'khoknZ gS] ftlesa ifjokj vkSj lekt dks nus s okyk lgkjk g]S ftleas O;fDr dks iznku djus okyh etcrw h g]S ftlesa O;fDr dks nsus okys gklS ys gAS ftlesa cPpkas dks nus s okyh I;kj dh vuHq kwfr gS] ftlesa ifjokj ds fy;s [kqf'k;ka g]S ftlesa ân; dh fo'kkyrk gS ftlesa cM+s&cM+s lda Yi gS] ftlesa ifjokj dh ljq {kk gS ftlesa ifjokj dh dBksjrk vkSj n`Mr+ k gSA fdUrq Lo;a O;fDr ¼cq<+kis½ bl voLFkk esa vdsyk [kM+k jg tkrk gS D;ksfa d ifr vFkok iRuh fdlh ,d dh e`R;q vFkok nksukas ;fn lkFk&lkFk gS rc Hkh ifjokj dh O;oLFkkvksa e]as cPpkas dh O;oLFkkvkas eas og u rks vius fopkj j[k ldrk gS vkSj u gh fdlh O;oLFkk esa lg;kxs dj ldrk gS mlds fopkj dksbZ luq uk ilan gh ugha djrkA vr% cq<k+ ik nnZ dh voLFkk g]S /k;S Z dh voLFkk] vdys kiu dh voLFkk g]S lgu'khyrk dh voLFkk gS] lg;ksx dh voLFkk gS] tgka 'kkjhfjd {kerk rks detkjs gks gh tkrh g]S ekufld {kerk;as mudk fpra u ijEijkoknh gkrs k gS] vr% ubZ ih<+h] u;s fopkj ubZ O;oLFkkvksa ds lkFk mudk lkeUtL; ugha gks ikrk vkSj o`)koLFkk vkjS ;qok ih<h+ muds cPpkas ds chp opS kfjd erHksn iSnk gks tkrk gAS ftlds ifj.kke Lo:i ctq xq Z ekrk&firk vkSj cPpks ds chp >xM+s dh fLFkfr;ka rS;kj gks tkrh gS rc ctq xq Z ekrk firk dks o`) vkJe esa NkMs u+ s dh O;oLFkk izkjHa k gks tkrh gSA tks Hkkjrh; ijEijk ds foijhr O;ogkj gAS c<q +kik O;fDr dh euksoKS kfud fLFkfr g]S ftlesa O;fDr fny dk mi;kxs vf/kd djrk g]S ;gh dkj.k gS fd mUgsa cPpkas dh gj NkVs h ls NkVs h ckr ij n%q [k yxus yxrk gS ukrh&iksrks cPpks]a cgvq kas vkfn ds }kjk fdlh Hkh izdkj dk xyr O;ogkj] vi'kCn dk iz;ksx vkfn os lgu ugha dj ikrs vkSj gj ckr ij n%q [kh gks tkrs gSA Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 nq%[k blfy;s D;kafs d os lksprs gS fd tUe ls tks cPps mudh Åaxyh idMd+ j [kMs+ g;q s] pys g]S tks muds da/kks ij cBS dj cpiu ds fofHkUu [kys [kys rs jgs] ftudh lkjh vko';drk;sa cqtxq Z ekrk&firk iwjh djrs jgs] os cPps brus cnys g;q s D;kas gSA D;k muds }kjk fn;s x;s laLdkjksa dh vo/kkj.kk detksj gks xbZ g]S D;k muds vk'khoknZ vkjS mudh izjs .kk;sa detksj gks x;h] D;k mudh loa ns uk;as vkjS Hkkouk;sa [kRe gks xbZ vFkok fny eas n;k vkjS I;kj u\"V gks x;kA rHkh oks fry&fry dj l?a k\"kZ dj vius cPpksa dks [kqn vHkko lgdj ikyus okys ekrk&firk dks mUgha ds I;kjs cPps ¼fo'ks\"k dj yMd+ s½ mUgas o`)k vkJe esa NksM+ vkrs gAS vukFkkas dh rjg csxkuksa dh rjg] ,ls s tlS s mUgksaus dksbZ vijk/k fd;k gks ctq xq Z ih<h+ cq<k+ is dh ekj ls rks ij's kku gS gh fdUrq os T;knk ij's kku gks tkrs gS vius cPpkas ds }kjk fn;s x;s vieku ls mudh ons uk ls ,d rks 'kkjhfjd lja puk detksj] fQj fofHkUu idz kj dh chekfj;ka] lkFk gh vkfFkZd O;oLFkk dk detkjs gkus kA ml ij mUgsa vkjS T;knk detksj dj nrs h g]S cPPkkas ds }kjk nh tkus okyh ekufld vkjS T;knk detksj dj nsrh g]S cPPkkas ds }kjk nh tkus okyh ekufld ihMk+ ] vieku] mis{kk cPpks }kjk Hkw[kk j[kuk] muds lkFk ekjihV djuk] rjg&rjg xkyh&xkykSp] vi'kCnkas dk i;z kxs vkfnA Hkkjrh; lLa d`fr esa rks o`)k vkJe dh vo/kkj.kk igys ugha FkhA ;g rks if'peh lLa d`fr dh vo/kkj.kk jgh gSA ftls Q'S ku ds dkj.k vk/kqfudrk ds dkj.k geus Lohdkj dj fy;k gSA ;g dSlk QS'ku\\ dSlh vk/kfq udrk gS\\ ftlus gekjh ewy tM+ks ¼ekrk&firk½ dks gh m[kkM+ Qsda k gS] ftuds flpa u ls gh ge QyhHkwr gq;s gS vkSj geus vius ekyh ds lkFk gh cnlydw h izkjHa k dj nh] ftuls gekjk vfLrRo vkSj O;fDrRo cuk gS] ftuds etcwr gkaFkksa ls O;fDr lekt eas flj mBkdj thus yk;d cuk gS mUgas cq<k+ is ds le; ge vius ifjokj] cPpksa ds lkFk j[kus eas bUlYV eglwl djus yxs gS] ftuds vk'khokZn us gesa cMs&+ cM+s gklS ys inz ku fd;s] mUgas geus cq<k+ is esa [kkalr]s [k[kkjrs vdsys NksM+ fn;k] ,d can v/a ksjs dejs eas] vutku yksxksa ds chp o`)koLFkk ea]s ;g dSlk U;k;\\ ;g dSlh O;oLFkk gS\\ ftlus fny ds lca a/kks]a jDr lac/a kka]s vkReh; laca/kkas dks gh fgykdj j[k fn;k ;g lc gks jgk gS gekjs dqafBr fparu] dta lw ekufldrk] fookg lca a/kksa ij Hkjkls k vkSj ijEijkvkas izFkkvkas dks rkd ij j[kus ds dkj.kA vko';drk gS cq<+kis dks lgkjk nus s dh ijw h ftna xh tks gekjk lgkjk cus jg]s mUgsa ftanxh ds vafre iM+ko ij lgkjk nus s dh] rkfd muds Lusg] vk'khoknZ ] I;kj vkjS vuHq ko ls ge vkjS gekjh vkus okyh ihf<;+ k iYyfor gkxs h fodflr gkxs hA ;fn geus cq<kis dks lgkjk ugha fn;k rks ge vdsys [kM+s Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 fn[kkbZ nasxs D;kfas d rc u gekjs ikl gkxs k ctq xq Z ekrk&firk dk vk'kh\"k vkjS u gksxk I;kj vkjS ge nfq u;k esa dqN fxu pqus yksxkas ds lkFk [kMs+ fn[kkbZ nasxsA tks ifjokj vkSj lekt dh xfjek ds foijhr gSA cq<k+ ik vkt ekrk&firk dks gS dy gesa gksxk] rc gekjs cPps ;fn olS k gh O;ogkj ¼:[kk½ djus yxsxs] o)` k vkJe esa geas NksM+ vk;axs s rc ge D;k djaxs s& rc rks ge Hkh vdsys gh gksxa s uA blfy;s ge lgkjk cus mudh ykBh dk] ge lgkjk cus muds didikrs gkFkkas dk] cqtxq Z ekrk firk ,d ckj tkus ds ckn nksckjk dHkh ugha feyrs blfy;s mudk lEeku djs]a mudh lsok djas mUgsa ona u dj]as mUgsa ueu dja]s D;ksfa d c<q +kik thou dh ;FkkFkZrk dk uke gS tks thou ds vuqHko vkjS xaHkhjrk dks iznf'kZr djrs gq;s u;s thou dk]s ubZ ih<+h dks O;fDrRo iznku djrk gSA vr% cq<k+ is dk cqtxq Z ih<h+ dk ge lc lEeku dj]sa mudh eukso`fÙk;kas dks] mudh Hkkoukvkas dks mudh vko';drkvkas dks ge lc le>s vkjS mUgas lra \"q V djsa vius O;ogkjkas l]s vius I;kj ls vius laLdkjksa l]s viuh lsok ls rHkh Hkkjrh; lekt dh lkekftd] lLa d`frd ikjokfjd ijEijkvkas dh i.w kZrk gksxh vkjS ge muds vk'kh\"k vkSj Lusg ls fujarj QyhHkrw gkrs s jgxsa s D;kafs d rc gkxs k gekjs lkFk mudk fny ls fn;k gqvk vk'khokZn] vikj I;kj vkjS vk'kh\"k dk etcwr gkaFk] tks gekjs vfLrRo ds fy;s gekjh igpku ds fy;s vko';d g]S vfr vko';dA lanHkZ %&  o`) efgykvksa dh mi{s kk] “kk’s k.k ,oa leL;k,as & MkW-,l-xqIrk ,oa dpa u yrk “kekZ i`’B 20] 21  lkekftd leL;k,sa & jketh ;kno i`’B 39] 40  o`)kas dk lekt”kkL= i`’B 72] 74  Hkkjrh; lkekftd leL;k,sa & MkW-lq/khj jktkjke nos js i`’B 79] 80  fj”rkas dk lekt”kkL= vkjS orZeku ifjn`”; & MkW-m’kkflga i`’B 115] 116 Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 बजु रु ्गो पर लेख के कोने मंै एक छोटा सा कमरा फदया र्गया ह.ै साल मंे तीन महीने एक बटे े के घर से खाना उनके कमरे मंै सरोज उप्रेती पाहँ चु जाता है अर्गर वह अपने पररवार के साि बाहर [email protected] चला र्गया तो उन्हैं या तो भखू ा रहना पड़ता है या फकसी भडं ारे में जा कर खा आते ह.ै यह तो एक प्रत्यके मनषु्य बचपन जवानी फिर बढ़ु ापे का सफ़र पररवार की कहानी है ना जाने ऐसे फकतने फकस्से तय करता ह,ै बचपन प्यार खले में कट जाता दखे ने सनु ने को फमल जाते है है जवानी के फलए कहा र्गया है जवानी दीवानी शरीर मंे परू ी ताकत होती है कु छ भी कर र्गजु रने को तयै ार आज भारत सरकार द्वारा बदृ ्धाश्रम खलु े है जो होता है आदमी फकन्तु उम्र की तीसरी सीढ़ी पर पररवारों से दरू होते है एक बार घर के सदस्य उन्हैं कदम रखते ही के काम करने की और सोचने छोड़ आने के बाद खोज खबर नही लेते. कमरों बठै े समझने की शफि में फशफिलता आने लर्गती है और हएु ये लोर्ग अपने फप्रय सम्बफन्ियों का इतं ज़ार करते उसका आत्म फवश्वास डर्गमर्गाने लर्गता है ऐसे समय रहते ह.ै उम्र के आफखरी मोड़ पर असहाय जीवन मंे उसे पररवार से प्यार और सहानभु फू त की जीते ह.ै यह उन वदृ ्धो की कहानी है फजनके बचेचो आवश्यकता पड़ने लर्गती है पहले सयं िु पररवार की माली हालत अचेछी ह,ै हालाफँा क र्गोमटंे ने उनके होते िे बजु रु ्गों को फवशषे रूप से सम्मान प्राप्त होता फलए पेशं न फनयिु की है लफे कन जीवन व्यापन के िा , उनकी राय उनके अनभु व को नज़रंदाज़ नही फलए परू ी नही पड़ती. की बार सनु ने मंे आया है की फकया जाता िा. पररवार बजु रु ्गग मफु खया ने नाम से इनके मरने पर भी घर का कोई सदस्य लाश लेने नही जाना जाता िा. और उन्हंै आफखरी वि के फलए आया, वैसे हर िमग मंे बजु रु ्गों के सम्मान की फशक्षा पररवार का सहारा िा. लेफकन आज समय बदल रहा दी जाती है लफे कन बजु रु ्गों को यवु ा पीढ़ी से है ज्यादातर बचेचे अपना जीवन बहे तर बनाने के वो अफिकार सम्मान नही फमल पाता फजसके वो फलए सयं िु पररवार मंे रहना पसदं नही करते पफै िक हकदार है . बजु रु ्गों के फलए काम करनवे ाली स्वयं घर छोड़ कर अपना नया आफशयााँ बसा लते े है. सवे ी संस्िा के आकड़ो के अनसु ार अफिकाशं आज की पीढ़ी हम दो हमारे पर फवश्वास करती है जो बजु रु ्गों को शारीररक मानफसक प्रतारणा झेलनी पड़ती लोर्ग साि रहते भी है तो समय की व्यस्तता और ह.ै वो बहुत तनाव ग्रस्त दखु ी है बहू बटे ो के तानो से फवचार न फमलने के कारण वदृ ्धों से दरू रहना पसदं परेशान लफे कन साि रहने को मजबरू अपमान का करते है बडु ्ढ़े बफु ढ़या अलर्ग िलर्ग पड जाते ह.ै उन्हें घंटू पीते रहते है हैं जो उन्हंै मतृ्यु की ओर तो नही अपनी छोटी से छोटी आवश्यकता के फलए बचेचों पीड़ा की ओर अवश्य िके ल देती है आज के समय का महंु ताकना पड़ता ह.ै अर्गर चार बटे े है तो भफवष्य का भय बचेचो यवु कों की तलु ना में बजु रु ्गों समस्या और भी भयानक होती है हर बटे ा सोचता है को ज्यादा सताता ह.ै कई बार अके ले रहने वाले मंै ही अके ले फजम्मवे ारी क्यों लाँू ? और भाइयों का वदृ ्धों की नकद जवे र के लालच लटु ेरे मार कर चले िजग भी तो बनता ह.ै मरे ा ऐसे बजु रु ्गग दम्पती से जाते है कभी घर के सदस्य जवाई बेटों द्वारा भी सम्पकग हआु है फजन्होंने बताया की “ घर उनके नाम ह्तत्या कर दी जाती है िा बेटो ने हस्ताक्षर करवा कर घर अपने नाम करवा फलया,उनकी एक दकू ान िी वह भी बटे ो ने अपने आज फवकफसत देशो ने इस समस्या का समािान नाम कर ली, अब उहें कोई बटे ा पछू ता नही दो फनकला है इन दशे ो में विै ाफनक रूप से वदृ ्धों के बेफटयां भी है उनकी फशकायत है की उन्हंै जायदाद भफवष्य का उत्तरदाफयत्व सरकार ने अपने हाि मंे ले से कोई फहस्सा नही फमला वो भी नाराज़ है. उन्हंै घर फलया ह.ै अवकाश प्राप्त वदृ ्धों के फलए आवास र्गहृ है Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 जहााँ उन्हैं जीवन की हर सफु विा प्रदान की र्गई है , यहाँा खले , स्वास्ि मनोरंजन लाइब्रेरी की सफु विा है .एक काल करने पर होफस्पटल से र्गाड़ी लने े आ जाती है . बीमार को इिर उिर नही भटकना पड़ता सरकार द्वारा कम से कम इतनी पशंे न फनफित की र्गई है रोज का खान पान चलता रहे. बस फसनमे ाघर ट्रेन हवाई जहाज़ सब जर्गह कन्शसे न फमलता है लेफकन दफु नया की सबसे ज्यादा जनसखं ्या वाले देश भारत में यह असम्भव ह.ै फिर भी िोडा प्रयास जाय तो इनका जीवन कु छ हद तक सरल बन सकता है इसके फलए यवु ाओं को आर्गे आना होर्गा वो माता फपता को बोझ न समझ कर उन्हैं सम्माफनत जीवन प्रदान करंे. बजु रु ्गग उस वट बकृ ्ष सामान है फजसकी छाया से घर हरा भरा रहता है. माता फपता की दआु से बचेचो का भफवष्य िलता िू लता ह.ै फजन्होंने अपना सम्पणू ग जीवन अपणग कर फदया बचेचो के फलए, पालपोष योग्य बनाया, नफै तक तौर पर इतनी फजम्मवे ार तो बनती ही है की अपने माता फपता की दखे रेख करें. उनके अनभु वो का लाभ उठायंे. तभी बजु रु ्गग अपना अतं समय ठीक से व्यतीत कर सकंे र्गे. उनके भी बचेचे है जसै ा देखरंे ्गे वैसा ही सीखरंे ्गे. सरोज उप्रते ी Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 भूि औ भतििक शी िेिु हंै हशर् े बज़ु ुर्म प्रशत सजग करते हएु अपनी साँस्कृ शतक, एशतहाशसक शशश पाधा तथा धाशमकग आस्थाओं से समय- समय पर पररशित करवा कर उनके िररत्र शनमागण मंे अमलू ्य योगदान दे घनी शाखाओं वाले शवशाल बरगद की ठँडी छाँव हर सकते हंै । आज संयकु ्त पररवार में पलते हुए बच्िे जब थके हारे प्राणी की थकान तथा शिन्ताएँ हर लते ी है । अपने माता- शपता को उनके माता-शपता के साथ जो वकृ ्ष वसन्त की उन्मकु ्त , शीतल पवन तथा शशशशर आदर, भशक्त तथा सेवा का व्यवहार करते देखते हंै तो के ठँडे थपेड़े सहन कर ऐसी शवशालता को प्राप्त हआु इन पाररवाररक गणु ों को वे सहज ही आत्मसात कर हो शक उस के गाँव अथवा शहर के लोग उसकी लते े हंै जो बड़े होने तक उनके स्वभाव का एक शीतल छाया मंे बठै कर आलौशकक शाशन्त का बहमु लू ्य भाग बन जाता है । अनभु व करते हों, वहाँ के लोगों के शलए अशत आदरणीय एवं पजू नीय हो जाता है । ठीक वैसे ही हैं शवश्व के हर दशे मंे कामकाजी माता-शपता के बच्िों को हमारे पररवार के बज़ु गु ,ग शजनकी छत्र छाया में हर संभालने / पालने के शलये कई ससं ्थाएँ बनी हईु हैं पररवार शाशन्तमय और सखु द जीवन शबताता हआु जहाँ शदन भर के शलये बच्िों की दखे भाल की जाती फलता-फू लता है । ह।ै प्रश्न के वल यह है शक क्त्या वहां के कमिग ाररयों का उन नन्हंे मनु्नों के साथ भावनात्मक सम्बन्ध बन शकन्तु आज के भाग-दौड़ के यगु में सयं कु्त्त पररवार का सकता है ? या एक ही कमरे मंे २०/ ४० बच्िों के अभाव खलने लगा ह।ै कई पररवार आशथगक, साथ वसै े स्नेह और ममता का व्यवहार शकया जा व्यवसाशयक या एकाकी जीवन जीने की प्रबल इच्छा सकता है जो उनके अपने घर मंे बज़ु गु ग बड़े प्रेम से कर रखते हुए छोटी-छोटी इकाइयों मंे बँट गये हंै । साथ ही सकते हैं । कहते भी हंै शक असल से सदू अशधक प्यारा आशथगक व्यवस्था का ध्यान रखते हएु पशत-पत्नी दोनो होता ह।ै यानी शजस शनश्चल स्नेह से दोनों पक्ष एक ही घर से बाहर कामकाज के शलये जाते हैं । और दसू रे को आनन्द से सराबोर कर सकते हैं , वैसे शायद आज यही समय की माँग भी है । लशे कन ऐसी नैसशगकग सखु को कोई भी बाह्य व्यशक्त नहीं दे सकता शस्थशत मंे माता -शपता दोनों ही आजीशवका कमाने मंे । सब से मखु ्य बात तो यह हो सकती है शक ऐसी इतने व्यस्त रहते हैं शक बच्िों के साथ शबताने के शलए शस्थशत मंे कामकाजी माँ बाप शनशश्चन्त हो कर अपने उनके पास समय का सदा अभाव ही रहता है । इन व्यवसाय को सफल बनाने मंे सक्षम हो सकते हंै । व्यस्त अशभभावकों के पास अपने छोटे बच्िों के उत्सकु ता पणू ग प्रश्नों के समाधान के शलये समय और आज का यवु ा वगग बहतु ही भावकु हो गया है । कई धैयग दोनों की कमी भी रहती है । इस अभाव की पशू तग बार रोष मंे आकर शबना सोिे समझे वह ऐसे शनणगय ले संयकु ्त पररवार के वयोवदृ ्ध सदस्य बड़ी आसानी से लते ा है जो कभी -कभी उसके शलए शवनाशकारी भी कर सकते हैं । घर मंे रहते हुए बज़ु गु ग बड़े धैयग और शसद्ध हो सकते हंै । शजस भी पररवार में बड़ों से सलाह स्नेह से बच्िों की हर आवश्यकता को परू ा कर सकते लेकर शनणयग शलया जाता है वह पररवार कई हंै । हमारे बड़े बज़ु गु ों के पास उनके बज़ु गु ों से सनु ीं आपदाओं से बि जाता है क्त्योंशक हमारी परु ानी पीढ़ी महाभारत, रामायण तथा पिँ तन्त्र की कहाशनयाँ हैं अपने अनभु व के अनसु ार नई पीढ़ी को उनके शनणयग शजन्हंे घर पररवार के नन्हें मनु्हें बच्िों को सनु ा कर के हाशन -लाभ के बारे में समझा सकती है । आज के परोक्ष मंे वे उन्हंे अपने नशै तक मलू ्यों एवं ससं ्कारों के प्रशतस्पद्धाग के यगु मंे नौकरी करते हएु यवु ाओं को Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 अपने अशधकाररयों तथा सहकशमयग ों के साथ काम दौड़ में बाधा मानते हुए शबना शकसी कारण के करते हएु कई व्यवहाररक कशठनाइयों का सामना करना वदृ ्धाश्रमों में अपने शप्रय जनों से दरू एकाकी जीवन पड़ सकता है । ऐसे मंे जीने के शलये धके ला जाता है । यह शकसी भी समाज हमारे बज़ु गु ों का अनभु व उन्हंे पररशस्थशत के साथ सही के शलये अत्यन्त शनन्दनीय बात है । ऐसी सन्तान यह ढगँ से शनपटने की सलाह के साथ-साथ प्रशासन तथा भलू जाती है शक शजन माता शपता ने बड़ी महे नत, बड़े प्रबन्ध की शदशा मंे उनका मागग दशनग कराता है । लाड़ प्यार से पाल पोस कर अपने बच्िों को इस योग्य बनाया है शक वे स्वावलम्बी हो कर समाज में अपना पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव मंे आकर कई भारतीय सही स्थान बना सकें , वही सन्तान इन श्रद्धेय तथा स्नहे पररवार भी टूट रहे ह।ंै छोटी -मोटी कलह मंे पड़ कर के सागर माता शपता की भावनाओं का शनरादर करते पशत पत्नी शववाह के बन्धन से मकु ्त होने को तैयार बठै े हएु उन्हें ऐसी ससं ्थाओं मंे छोड़ कर मात-ृ शपतृ धमग से रहते हैं । कभी रोष, अहं तथा भावकु ता से अन्धे हो मकु ्त होना िाहते हंै । वे शायद यह भलू जाते हैं शक कर शलये गए शनणगय उनके बच्िों के भशवष्य को परोक्ष में अपने बच्िों को उनके प्रशत वसै े ही व्यवहार अधँ कारमय बना सकते हैं । ऐसी दभु ाग्यपणू ग शस्थशत से के शलये मागग शदखा रहे हैं । बिाने में पररवार के बड़े सदस्यों का बहुमलू ्य योगदान इस परू े सदं भग में एक बात उल्लखे नीय है शक हो सकता ह।ै एक तो शजस घर में बड़े लोग रहते हों पाररवाररक उन्नशत, शाशन्त एवं खशु हाल वातावरण उस घर में उनका मान रखते हुए पशत पशत्न आपसी बनाने के शलये यवु ा वगग के साथ साथ वररष्ठ सदस्यों झगड़ा करने से पहले सोिगें े अवशय । और अगर का उतरदाशयत्व अशधक है । शस्थशत सीमा से बाहर ओ जाए तो अनभु वी वदृ ्ध दोनों सयं कु ्त पररवार मंे रहते हएु हमारे बज़ु गु ों को भी अपनी पक्षों को समझा बझु ा कर बच्िों के पररवार को उजड़ने शदनिया,ग स्वभाव और आिरण मंे बदलाव लाना से बिा सकते हंै । अतयावश्यक है । आज के बदलते हुए सामाशजक, पाररवाररक पररशस्थशतयों में अगर वे अपनी रूशढ़वादी आज की परु ानी पाररवाररक आस्थाओं में पररवतनग मान्यताओं को नई पीढ़ी पर थोपंगे े तो कलह का आ रहा है । कई पररवारों मंे नई पीढ़ी अपने कारण बन सकते हंै । सब से पहले तो वे अपने स्वास्थ अशभभावकों के प्रशत अपने उतरदाशयत्व को भलू ती जा का परू ा ध्यान रखंे ताशक अपने कामकाजी बच्िों की रही है । कारण कु छ भी हो कई बज़ु गु ों को उनकी शिन्ताओं को और न बढ़ायें । घर के काम काज मंे परू ा सहमशत के शबना वदृ ्धाश्रमों मंे रहने के शलये बाध्य योगदान दें । बागवानी, योगाभ्यास, कम्प्यटू र, आशद शकया जा रह है । वदृ ्धाश्रमों का व्यवधान इस शलये कोई न कोई ऐसा शौक अपनायंे ताशक प्रसन्नतापवू गक हआु था शक कई शनसंतान या रोगी माता -शपता, अपना समय शबता सकंे । साथ ही वे इस बात से सदा शजनके बच्िे कु छ समय के शलये दसू रे शहर, दशे मंे सतकग रहें शक िंशू क वे बड़े हंै अत: उनकी इच्छा, राय जीशवकाजनग के शलये रह रहे हों , उनकी ऐसे आश्रमों में और पसन्द ही हर मौके पर मान्य हो । ऐसे में एक रह कर सही दखे भाल हो सके । साथ ही बज़ु गु ग भी सम फलते फू लते पररवार मंे बबे सी तथा दबाव का आयु के लोगों के साथ रह कर अपना जीवन सखु से वातावरण पदै ा हो सकता है । अगर उनके पास अथग शबता सकंे । शकन्तु आज ऐसा दखे ा जा रह है शक कई का अभाव नहीं है तो उन्हें पररवार मंे आशथकग सहयोग पररवारों में बड़ी आयु के लोगों को अपने जीवन की भी दने ा िाशहये । सब से मखु ्य बात तो यह है शक वे अपने साथकग सहयोग से पररवार के आदरणीय़ एवं Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015

जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 पालक बन सकते हंै लशे कन उन्हें बदलते समय के साथ बदलना पड़गे ा। आज की वदृ ्ध पीढ़ी के पास साशहत्य, संस्कृ शत तथा पौराशणक कथा कहाशनयों एवं नैशतक दृष्टान्तों का वहृ द कोष है । वे तो अनभु व की खान हंै । ये बज़ु गु ग अपने इस सशं ित कोष के अमलू ्य रत्नों को भावी पीढ़ी के कोषागहॄ में सहज ही स्थानान्तररत कर सकते है । यह पीढ़ी प्रत्यके पररवार के शलये भतू और भशवष्य को जोड़ने में एक दृढ़ सते ु के समान है जो कल-आज और कल में बहती हईु समय रूपी नदी के शकनारों को जोड़ने में सक्ष्म है । शशश पाधा Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015


Like this book? You can publish your book online for free in a few minutes!
Create your own flipbook