बचपन काश िह कदन कभी न आता!-- याद बहुत आता है मझु ,े चाचं ल सा मरे ा अपना बचपन सोच कर ही आँखंे नम हो जाती है l जाने कहाँ, कब खो गया, नटखट सा मेरा प्यारा बचपन | जब िह कदन आएगा िो खेल तमाशे यारों संगा , मस्ती में है बीता ये बचपन, हाँ िही कदन जब छोड़ना होगा आगँ न घर का बहन को मरे ी l कदलचस्प कहानी नानी की, सनु वखल उठता था मरे ा मन, काश िह कदन कभी न आता! चाहँ भी तो िापस पा न सकँू , िो खोया हुआ मरे ा बचपन ककतना प्यार कदया तनू े मुझे बदले में मंनै े क्या कदया तझु े आज कहने को मेरे हाथों मं,े दौलत है और शोहरत ह,ै अर्सोस होता ह,ै इस भाग-दौड़ के जीिन मंे, दो पल के सुकूां की जरूरत है क्या करूँ गा खोकर तझु े ? याद है मुझे िह कदन भी कोई तो हो जो, लौटा दे मझु ,े िो रूठा हुआ मेरा बचपन जब तू हाथ वसर पर घमु ाती ताकक नींद मरे ी आखँ ों में आ जाती l डॉ श्वेता राठौर सोती ना तू तब तक प्राथवमक वशवक्षका (संागीत) नींद ना आती मुझे जब तक l मरे ी गलती पर ढाल बन बढ़े चलो माँ से बचाती तो कभी मेरे वलए परू े सांसार से लड़ जाती l फू ल वबछाए हो या कांटा े हो, कौन लड़गे ा संासार से मेरे वलए? राह न अपनी छोड़ो तमु | कौन देगा अनन्द्य प्यार मुझे? चाहे जो विपदा आए , कौन दगे ा? मखु को जरा ना मोड़ो तुम | कदन आज नहीं तो कल आएगा िह साथ रहे या रहे ना साथी , जब होंगंे हाथ तेरे पीलlे वहम्मत मगर ना छोड़ो तुम | डोली उठेगी नहीं कृ पा की वभक्षा माांगो, और आँगन छोड़कर कर ना कदन बन जोड़ो तुम | कर दोगी यह घर सूना l बस ईश्वर पर रखो भरोसा , काश िह कदन कभी न आता! पाठ प्रमे का पढ़े चलो | ईश्वर से छीन लूँ िो कदन जब तक जान बनी हो तन में , और वमटा दँू तब तक आगे बढ़े चलो | हमशे ा के वलए ताकक तू रुक जाये मरे े वलए l इंारजीत यादि --हनी दिे 12 द 12 द KENDRIYA VIDYALAYA NO. 1 SHAHIBAUG, AHMEDABAD 51
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