ISSN 2454-2725 Vol.1, issue.6, August 2015 वर्ष: 1, अंक 6, अगस्त 2015 जनकृ ति (तवमर्ष कें तिि अंिरराष्ट्रीय मातिक ई पतिका) “बुजर्गों पर कें तिि तवर्ेर्ांक” िंपादक कु मार र्गौरव तमश्रा
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 ितपर्दकीक बजु रु ्ग हमारे समाज के वह वकृ ्ष ह,ै जजसकी छावाँ मंे प्रत्यके व्यजि का बचपन र्जु रा है जजसके स्नहे और आत्मीयता ने जिन्दर्ी की कठोरता को कभी महससू नहीं होने जदया. घर की ढाल बनकर हमशे ा हमारी रक्षा की पर हमारे अजत स्वार्थी स्वभाव ने हमें अपने आधारों से काट जदया. हम धीरे-धीरे महरूम होते र्ए उस छावँा से. बजु रु ्ों का अपमान करते करते हम यह भलू र्ए जक वदृ ्धावस्र्था जिन्दर्ी का एक सच ह.ै आज हम अपनी ही जड़ों से कटते जा रहे हंै हमारे घर के बजु रु ्ग के वल एक कतरा स्नेह एक पल की मसु ्कराहट और शेष जिन्दर्ी अपनों का प्यार चाहते हंै यह भी हमसे नहीं जदया जा रहा और हम बदं कर रहे हंै अपने ही अतीत को कोठररयों म.ंे वतमग ान सामाजजक पररवेश मंे बजु रु ्ों की जस्र्थजत जचंता का जवषय ह.ै महानर्रीय सभ्यता मंे जहााँ वि का अभाव है वहां जस्र्थजत अत्यंत भयावह ह.ै र्र्नचमु ्बी इमारतों के बदं जपजं रे में हमारे बजु रु ्ग अपने जीवन को काट रहे ह.ंै ररश्तों की टूटन और जबखरते हएु समाज को इनसे अच्छा भला कौन समझेर्ा. आज वदृ ्धाश्रम की बढती सखं ्या इस बात का सबतू है जक हम मानवता के जकतने नीचले पायदान पर खड़े हंै जक की जजस व्यजि ने अपना सपं रू ्ग जीवन हमारे भजवष्य को सवं ारने मंे लर्ाया हो वही आज अके ले रहने पर जववश ह.ै कई बार हम आस-पास बजु रु ्ों को एकांत में समय बीताते दखे ते हैं उनकी जस्र्थजत को दखे कर लर्ता है जक आजखर हम जकस दौड़ मंे है जहाँा हम अपनों से इतने दरू होते जा रहे ह.ै जनकृ जत पजिका ने अपने प्रर्थम जवशषे ाकं को हमारे आधार हमारे अतीत हमारे जीवन के कवच अर्थातग बजु रु ्ों पर कें जित रखा ह.ै पजिका के इस अकं की घोषर्ा माि से पजिका को सकारात्मक रुझान जमले सपं रू ्ग जवश्व से बजु रु ्ों पर कंे जित कजवताये,ाँ कहाजनयां, लखे इत्याजद प्राप्त हुए. हमने प्रयास जकया जक बजु रु ्ों के सम्मान एवं उनको समजपतग सभी रचनाओं को स्र्थान दे सकंे परंतु पजिका की कु छ सीमाएं ह.ंै हम उन सभी सजृ नकजमयग ों का जदल से धन्यवाद जजन्होने इस भावनात्मक एवं र्भं ीर मदु्दे पर रचनात्मक सहयोर् जदया. पजिका में बजु रु ्ों पर कंे जित साजहत्य एवं बजु रु ्ों की वतमग ान समस्याओं पर के जन्ित रचनाओं एवं लेखों को प्रमखु ता से स्र्थान जदया र्या. यह अकं प्रयास है जक हम अपने बजु रु ्ों के जलए कर सकंे और हम अपील करते हंै जक अपने घर के वररष्ठ सदस्य का सम्मान करंेर्े कयकंु ी हमंे नहीं भलू ना चाजहए जो अपने अतीत का सम्मान नहीं करता उसका भजवष्य उसका सम्मान नहीं करेर्ा. कु शर् र्ौ ि तशश्रर् Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 तिषक- िूचें सन्नाटों का प्रकाशपिि : मधिु ीप (लघु कथा) बडु ्ढी: रोदिका शमाि (लघु कथा) आलेख कतििर् बिलना तो होगा: डॉ. िगु ापि ्रसाि अग्रिाल (लिे ) भतू और भदिष्य में सेतु हैं हमारे बज़ु गु ि: शदश पाधा दिदिक रमशे (कदिता), डॉ.अदिल बसं ल (लिे ) “आक्रोश” (कदिता), अनरु ाधा दिििे ी दसहं (कदिता), डॉ. मोहदसन िान (कदिता), डॉ. मो. बढु ापा- एक सामादजक दिंतन: डॉ. उषा दसहं (लिे ) मज़ीि दमया (कदिता), डॉ. राज सक्सेना (कदिता), हदषलि पाटीिार ‘नि’ (कदिता), जयन्ती प्रसाि बजु गु ों पर लेि: सरोज उत्प्प्रते ी (लिे ) शमाि (कदिता), कारुलाल जमड़ा (कदिता), मनीष शमाि (कदिता), मजं ु मदहमा (कदिता), नरेन्र कु मार भारतीय समाज मंे िदृ ्धािस्था: समय, समाज और (कदिता), राधशे ्याम भारतीय (कदिता), रेनू भारती दस्थदत: अदनल कु मार पाण्डये (लिे ) (कदिता), रेणकु ा श्री (कदिता), रोदिका शमाि (कदिता), के प्टन समे तं हरीश ‘ििे ’ (कदिता), दकस हाल में हंै हमारे बजु गु ि: डॉ. दिनोि बब्बर शैलेन्र शातं (कदिता), सधु ीर सक्सेना ‘सधु ी’ (लिे ) (कदिता), सरु दभ सप्रू (कदिता), श्री सयु ािबा जगन्नाथ शेजाल (कदिता), दिनोि गोरिपरु ी बच्िों की दजिं गी में बजु गु ों का महत्प्ि: अदनल ‘दनभयि ’ (कदिता), कु मार पाली (लेि) कहर्नें संस्मरण: गौरि श्रीिास्ति (लेि) भागिन्ती : डॉ. निीन नन्ििाना (कहानी) कराहता बढु ापा: रिना शकं र (लिे ) भव्य एकांत : डॉ. संगीता सक्सने ा (कहानी) जीिन का पतझर: शन्नो अग्रिाल (लेि) बड़ी अम्मा : मनीषा (कहानी) बजु गु ि सम्मान: तथाकदथत आधदु नकता के िौर मंे सघं षि करता दिषय: अदिलेश कु मार गौतम (लेि) यह सब दकस दलए : पदििा अग्रिाल (कहानी) उम्मीिों के पथ पर : रदश्म पाठक (कहानी) क्योंदक हर ईमारत घर नहीं होती: दशिानी कोहली (कहानी) लघु कथर् Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 िुश बूढ़े हो हे हो तमु ्हारे कचरायु होने की चाय भी नहीं पीते उन कबन तमु बढ़ू े हो रहे हो अपने बचे रहने की तमु इसे पररहास समझती होगी और मरे े अदं र स्कवाथी प्राथनज ा दोहराती हँा कक ढह रहे हंै सब मीनारें, गंबु द, हर रात भला कै से कर सकता हाँ मैं प्रेम शहतीरें तमु ्हारी बड़ी बड़ी चप्पलों में तमु ्हारी बढ़ु ायी दहे , और बरु ्ज छोटे छोटे पैर अटका कर पके बालों, झरु ी भरे चेहरे से ढह रहे हैं दकु नया- र्हान पर यही सच है , मर्बतू सावाँ ले हाथ, चौड़े कं ध,े और एक यगु घमू आती हाँ । आधी सदी बह चकु ी है मरे े उफनती आखँा ें उि पेंढ़ें कर् प्रेश तमु ्हारे बीच सारी सारी रात मैं ढूढँा ती हाँ और सतू ी छींटदार धोती में तमु ्हारी परु ानी फाइल,ंे मझु पर कबलकु ल र्ँाचता था कनश्चल सोयी तमु दीमक खाई र्मनज होम्योपैथी, तमु ्हें सावरज ्कनक रूप से अप्रकतम संदु र हो, चौबीस इचं ी साइककल कध्कारना आर् तो तमु मझु े प्राण कप्रय हो और सटे स्क्वायर की गड्डी तमु ्हें कसर झकु ा आर् तो तमु सबसे सदंु र हो अपने सदु रू महानगर के कनवातज पी लेना ही शोभा देता रहा कप्रय!े में टंगे साल भर ही करती थीं पुरुष तिशाम – तपिर् इस कोरे फ्लटॅ में । मरे े मगं ल हते ु कोई न कोई व्रत अपनों की मौत का गरल परू ्ा, सांस रोक घटँाू लने े वाले तमु सारी सारी रात मैं बड़ के नीचे मकं दर की देहरी सप्तपदी पर तमु ्हारी बाहों में झलू ती हँा तमु ्हारे कसदं रू से रंग गयी है मरे ी 'दान' होती और गाती हँा ्या प्रेम भी कर सकती हो अब सकु ु मार अरं ्रु ी में ्यों “कं तो मतं ो कौड़ी पतं ो …….” मझु से ? नील नदी से बहते रहे थे रात भर हर रात करबद्ध सब हसँा ते हैं पंकडत ने तो बस एक बार दद्दू दादी को बहतु चाहते हैं Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 प्रक्षालन करने को कहा था पापा तले कतलाई के बीच अनरु ाधा किवदे ी कसंह कपछवाड़े 9930096966 महाँु धोने ्यों र्ाते थे बार बार ्या मरे ा पराया हो र्ाना बी 1504 ओबेरॉय स्कप्लडें र, इतना गड़ रहा था र्ेवीएलआर अधं ेरी पवू ज , मबंु ई -60 आखाँ ों में कवदा की गाड़ी को हाथ लगाते ही झकु से गये थे मरे े बड़े होते ही बढ़ु ा ्यों गए थ?े Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 तिड़की-द िर्जों की द र् ों शी --दिदिक रमशे बढ़ु ायी आखं ों की खशु ी फं स कर रह गई थी दखड़की-िरिाजों की िरारों म।ंे एक उम्मीि तरसाई आखं ों मंे जॆसे फं सी रहती हॆ बढ़ु ायी िहे ऒर मटॆ ्रो की सीटों म।े भरी हों आरदित सीटें तो कहां रह पाते हॆं िररष्ठ नागररक, िररष्ठ। उन्हंे तो करनी होती हॆं अशक्त यात्राएं जगह तलाशतीं हर स्टेशन पर उम्मीि जगातीं आखं ों की रोशनी म,ें बस। आरिण शदक्त हॆ अगर आरदित सीटों की तो शषे सीटें लगता हॆ महंु दिढ़ाती हॆं िररष्ठों का। दकसे याि रहती हॆ बढ़ु ायी आखं ों की खशु ी फं स कर रह गई हॆ जो दखड़की-िरिाजों की िरारों म।ें Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 र्ेंि अधरों पर डॉ अकखल बसं ल \"आक्रोश\" माँा बाबजू ी तषृ ्णा बहती है साई पैथोलॉजी लबै ोरेिरी एक तरफ जल्दी साइन श्री राम कॉलोनी कमरे मंे पड़े हएु हैं करो बाबजू ी कशवपरी (म.प्र) बच्चे बड़े हुए हैं इस पर अड़े हुए हैं कपन 473551 बच्चे बड़े हएु हंै फोन 09575478888, रीती आखँा ें 08889408980 सनू ी बाहंे तरसंे अम्मा धीमी सासाँ ंे आज दवा को ठंडी आहंे बाबजू ी जी भी है पाबन्दी खली हवा को तालाबंदी भलू ा बचपन जेल सरीखा बिे ा अपना दुःख ये तीखा मात कपता का खद के घर में स्वकणिम सपना उन पर ककतने कहते थे मरे े पहरे कड़े हएु हैं मन्ना में बच्चे बड़े हुए हैं हीरे जड़े हएु हंै बच्चे बड़े हुए हंै नेह नहीं है मान नहीं है मात कपता को आखँा ों मंे जो दुःख देता सम्मान नहीं है ईश्वर सब शलू चभाती उसके सख लेता बहू ककिल है बड़ी दगकि त बिे े का ह्रदय उसकी होती जकिल है नारक कनयकत उनको लगता उसकी होती जसै े कोई उनको दंड सनाने बोझे चढ़े हुए हैं खद परमशे ्वर बच्चे बड़े हएु हंै खड़े हएु हैं बच्चे बड़े हुए हंै दे दते े दो जनू का खाना उस पर भी तो खनू जलाना नजर वसीयत पर रहती है Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 तिधिर् शर्कक तिट्ठें िेटर्क िरै ज बन्हलह,ाँ आश के लह,ँा हुकं ाचड़-हुकं ाचड़ क जीवन नर्श पलटता भाग्य हमरो भगवान। कटलहन। सीता मईया बड़ दिु सहली, चिरंजीवी बौआ के , तैत लव-कु श सान बटे ा पौली। जीवन आव पहाड़ बनल दचु िया मायक आशीष। हमहँा अपना के हनु के सब आचि, रहु कु शल सचदिन अहा,ँा रक्षा करहु हरदम ईश। बझु लह,ाँ ढेहन आचं ि सब वाईस गले सदा सन्मिु रहयु अहााँ के , लब-कु श नाम ताचहत रिलहन। अचछ। शारदा, शषे , गणशे । मन मे आश आव आवए जननी नचह जननी वचन, रहचि सहाय अहााँ पर हरदम, लागल, आचं िक नद सिु ाय गले अचि। ब्रह्मा, चवष्ण,ु महशे । हुनकर चविवा छोचड़ लब-कु श प्रायः एचह के अचं तम चिट्ठी बटं ी बौआ के दैत छी आशीष, माय सब कह लागल। बझु व, यगु -यगु जीवयु लाि बररस। लेचकन चविवा हाय, पढ़य-ु चलियु वड़का बनय,ू सब उल्टा भए गले । अहांक बवकु सपना दिे ल। दशे -चवदेश मे नाम िवु करय।ु लस्सा से जोडल कािाँ , कहतै छ्लाह घर अचछ बौआ आव आगा चलिै छी, क्षण भरर मे टूटी गले । वानीगेल, चिट्ठी चलिवाक कारज कहतै दहजे क िका िौंि मे पाचडक, काचतकग इजोररया मे आवक छी। महा अनिग हम क लेलह।ँा लले । फोन पर सब नचह कचह सकत अगं ्रेजीय दलु ररए कलौती के , कु ल विू बना घर लेलह।ँा बौआ अतं मे प्रािनग ा हमर, ह,ाँ आचं ि पर पट्टी दय िचढ़ गेल, बस एक मात्र इच्छा परू ा करब। तै ई बड़का ढढर पठवतै छी। भतू -भचवष्य चकहु नचह मइु लों पर गाम चनश्चय आयव, चवचि के चलिल चविान कह,ु बचु झसकलह।ँा अचं तम संस्कार अहीं करव। कु लक मान सम्मान छोचड़, या भाग्यक छल िले । अपना कोईि के लाज के Dr. Md Mazid Mia तरुणी बयस चविबा भले ह,ाँ बिे लह।ँा (Asst. Teacher) दिु क पहाड़ तिने पचड़ गेल। एलीह बहरु रया जिने घर म,े सगं -सगं कलह लेलीह। SMSN High School दीन-हीन बनाक हमरा, ‘हम दो हमारे एक’ के रहना, Vill+Po-Bagdogra वा अपने स्वगग िचल गेला। रटना गवए लगचलह। Dist-Darjeeling एक दु नचह तीन-तीन टाके , चदन राचतक िड़ पड़ म,े Pin-734014(W.B) एचह अभाचगन पर छोचड़ गले ा। दचे ि पड़ल अहााँ के बीि Mobile-9733153487 आिा पेट अिग नग्न रचह, मजिार। बिे लहाँ कहनु ा अहााँ समके कहलु हाँ हम लड़ जाहन संग,े छाती पर रिलहाँ बज्र पहाड़। प्राण। बारह वरस बीतल कहनु , रचतक राचत भिु ले रचहतों, रिलहाँ कहनु ा कु लक मान। लेस ले वीना गाय हकु ड़े जेना। जल चबनु नदी, पाईिं चबनु तयै ो हम चकछू नचह कहलहन, पक्षी, परु ुष चबना नारी होइछ एक समान। Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 उपेक्षर् की क्षशर् हम उन्हंे कं गाल और सवकलांग िमझते रह।े बड़े ग़लत और बौने थे हम, ---डॉ.मोहसिन ख़ान इरािों की परत भी थी बड़ी कच्ची, हम अपनी जवानी के सिनों म,ंे जो उखड़ गयी, अपनी सनजता और स्व के घरे े मंे सघरे रह।े इतराते रहे खिु पर, करते रहे आवारागिी। िो-चार सवपसियों के मौिम की मार िे। अब अक़्ल आई सक, थे सकि चीज़ में ख़ाि या हनु रमिं , खिु को नहीं था पता। िोष िेना सकतना आिान ह,ै और चपु चाप िारी उपके ्षा िहना, बि बिगमु ानी मंे ही जीते रह।े चाहा ही नहीं सकिी अधेड़ या बढ़ू े िे समलना। सकतना कसठन ह।ै कभी मन ही नहीं हआु उनके पाि बठै ने का। अब या तो कु छ अधेड़ बढ़ू े हो गए, या कु छ बढ़ू े रहे नहीं हमारे बीच, बि िरू ही िे उनकी आखँ ों और सनगाहों को सनरंकु श हम पहले भी र्रक्त थ,े आज भी र्रक्त ह।ैं होने की िंज्ञा िेते रह।े कहते रहे इनको क्या आता ह,ै परु ानी फ़िल ह,ै िड़ी हुई। खिु तो कु छ करते नहीं, हमें भी कु छ करने िे रोकते ह।ैं बड़े िपने थ,े हमारी िफ़े ि आखँ ों म।ें कई ख़्वासहशंे पाल रखीं थीं झठू ी। हौिला था लसे कन अधँ ा, खनू मंे तरावट थी, लसे कन पाइप लाइन कभी फटी नहीं। कु छ कर गज़ु रने के जब आते िपन,े खलु ी आखँ ों म,ें तो मसु ियाँ बाधँ कर, िौड़ जाने को मन करता। लसे कन सिशा का नहीं था ज्ञान। क्योंसक सिशाएँ तो सिमट गयीं थी, उन अधेड़ और बढ़ू े लोगों की उँगसलयों म,ंे रास्ते िारे उनकी झरु्रियों के सनशान बन चकु े थ।े मलू ्यों के िारे ख़ज़ाने थे उनके पाि। Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 अभिशाप बढु ापा किी न था, यह तो गरिमा का पोषक है | आनन्द इसी में जीने का, यह भशखि रूप का द्योतक है | क्यों िखंे अपके ्षा औिों स,े अब तक िी तो हम जीते थे , हम कु आँ खोदते थे अपना, तब उसका पानी पीते थे | व्यय कि के अपने अल्प सिी, जीवन जीना सम्मोहक है | आनन्द इसी में जीने का, यह भशखि रूप का द्योतक है | अब तक देते थे हम सब को, क्यों हाथ पसािें अब अपना | क्यों हम सोचें सब ध्यान िख,ें है समय आज भकस पि इतना | सोचो समाज को क्या दें हम, बस यह भवचाि उन्मोदक् है | आनन्द इसी मंे जीने का, यह भशखि रूप का द्योतक है | ये सब स्ति में छोटे ह,ैं हम क्यों मांगा े अब इन से कु छ | हम ने पाला औि बड़ा भकया, इनको दे डाला है सब कु छ | हम दाता ये अब िी याचक, यह िाव िखो मनमोहक है | आनन्द इसी मंे जीने का, यह भशखि रूप का द्योतक है | वट वकृ ्ष िहे हम जीवन िि, अब कै से उजड़े नीड़ बनंे | बन कर्ण सिी कु छ दान भदया, अब अतंा समय क्यों दीन बनें | हम दानवीि िह जग त्यागंे, यह सोच सदा उदबोधक है | आनन्द इसी मंे जीने का, यह भशखि रूप का द्योतक है | डॉ. र्ज िक्िेनर्, हनमु ान मभन्दि खटीमा-262308 (उत्तिाखण्ड) मो- 09410718777 Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 1. तपिर् औ बैल 2. तपिर् -हतषमल पर्टेंदर् 'नि' मो.न. - 9660869991 घर में वे कसर्फ एि छत ही नहीं, ईमले - तीन किसान थे. पेपरवटे भी थ.े [email protected] एि मर गया जसै े ही हट,े m तो दसू रा बुकिया हम गया. िागज िे पन्नों-से और तीसरा कबखरते चले गए. यह दखे -दखे िर क दंि ा मर रहा ह.ै Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 एक बजु मुर्िर् और बगलंे झाँकने। - जयन्ती प्रसाद शर्ाा खाता हूँ कसर् अब कभी, बफकरा न कसँगू ा। एक बजु गाु वार, गजु रंेगी बजधर से हूर, उम्र थी सत्तर के पार। उधर र्खु ड़ा न करँ गा। तबबयत के रंगीन थे, खाता हूँ तरे ी हा हा कर र्रे ा नहीं उम्र से सगं ीन थे। एतवार, जने रेशन गपै की सर्झ से दरू थे, बाहों से उसने कर बदया र्कु ्त बिर्बिर्ी आखँ ों से तकते हूर थे। देकर लानतें हजार। आती-जाती देखकर हसीं, कर दते े थे छींटा कशी। - जयन्ती प्रसाद शर्ाा आदत से उनकी एक हूर तंग आ गई, छोड़ कर लाजो शर्ा बशे र्ी पर आ गई। ले गई तन्हाई र्ंे खींिकर, बोली बाहं ों र्ंे भींिकर। रोज रास्ते र्ें हटू करते हो, अब क्यों नहीं शटू करते हो। बांहों र्ंे उसकी कसा, बडु ्ढा लगा हाँफन,े लगा उपर नीिे दखे न-े Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 eS c<w k+ gks jgk gAaWw dk#yky teMk+ cpiu Fkk] I;kj esa caV x;k tokuh dk tks'k] tfq r;kW f?kl dj ?kV x;k viuh QVh deht+ fly jgk gawWA eS cw<k+ gks jgk gWAwa firk us dHkh fglkc ugh iwNk [kuw eas mcky Fkk] dqN ugh l>w k eS ckSjk x;k Fkk] vc lq/kj jgk gWAwa eS cw<+k gks jgk gwAaW ^^ek*W * j[krh Fkh jkVs h] ,d dRq rs dh ,d xk; dh ?kj esa curh Fkh pk;] egjh vkjS nk; dh fxuh tkrh jkfs V;ks dks n[s k & lqu jgk gwWaA eS c<w k+ gks jgk gwWAa cVs k cuk bfa tuh;j] cVs h MkDVj dksbZ rks lqus eq>s] pkgs MkVa & MiVdj tks /kks;k Fkk] fupksM jgk gWAwa eS cw<+k gks jgk gwWaA jxkas eas tuq uw Fkk] [kwc dek;k mEehnas Fkha] vkSdk+ r ls T;k+ nk yxk;k D;k xaok;k \\ D;k cpk;k \\ lkps jgk gAWw eS c<w k+ gks jgk gAaWw Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 र्ौ ेकर् रब नहीं आिें बजता है मोबाइल, गजंू ती है वाट्स अप की बीप लके कन यह जीवतूं चहाचहाहट अब नहीं आती गौरेया अब नहीं आती घर मंे अब कोई पाती नहीं आती अतूं र्दशे ी में मड़ु ी हुई अपनों की बात नहीं आती गौरेया अब नहीं आती सायककल चलाकर र्दर से आते रहे जो उन र्दोस्तों को अब यार्द तक नहीं आती गौरेया अब नहीं आती बरसता तो है पानी अब भी लेककन सौंधी कमट्टी की सवु ास अब नहीं आती गौरेया अब नहीं आती खलु ी कखड़की कर्दखते थे र्दरख्त –साख –पररूंर्दे एसी रूम मंे अब कोई आवाज़ नहीं आती गौरेया अब नहीं आती छोटे से घर मगर घौंसलों की जगह थी घर के र्दालान मंे अब बुजगु ों की पर्दचाप नहीं आती गौरेया अब नहीं आती मनीष शमाा इकंू ललश ट्युटोररयल्स, चामडंुू ा काम्प्लके ्स Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 दरख़्त शीतल अिसास. जो अपनी जड़ों स,े फल डालते ि,ंै धरती को जकड़े रिता ि.ै --मंजु महिमा दरख़्त मुझे झोली में, िरा-भरा रिता ि,ै अच्छे लगते ि.ैं अपने आशीवाादों के , सभी पहियों का, बचपन से िी मैं, कच्चे-पक्के , खट्ट-े मीठे, रैनबसेरा बनता ि.ै दरख़्तों के बीच, बिुत फल हमले िंै मुझ.े सबके घोंसलों के , बैठी ि,ँू खले ी ि,ूँ बिुत बहतयाई िँू इनस,े अडं ों को सभं ालता ि.ै सोई ि.ूँ ... बिुत किाहनयां सुनी ि,ंै द................र............ख़्त िा,ँू दरख़्त, और दाथताूँ भी. दरख़्त को लोग, घने , छायादार बिुत कु छ जाना ि,ै अपने आगँू न मंे, जो किीं आत-े जाते निीं, मनंै े इनस.े उगा तो लते े ि,ैं बस एक िी जगि, (2) अपने थवािा के हलए, खड़े रिते ि,ंै मंनै े जाना हक लेहकन बढ़ती शाखाओं को, हथिर... दरख़्त बनना एक हनयहत ि,ै बदाशा ्त भी निीं कर पाते, फै लाकर अपनी बािँू ,ंे एक न एक हदन कटवा दते े ि.ंै ... साया दते े िैं अपना, सभी को दरख़्त घर आगँू न का पेड़, दसू रों को, बनना िोता ि.ै न तो फ़ै ल सकता ि,ै वायु के वगे को सिकर भी. अपने पररवार के आगँू न का, न िी उंचा उठ सकता ि.ै प्रचंड ताप को पीकर भी, दरख़्त...... क्योंहक शायद उसको वे ठंडी पवन दते े ि,ंै क्योंहक एक विी तो ि.ै . सबसे जड़ु ा रिना िोता ि.ै और दते े िैं प्यार का Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 सबकी सुहवधानसु ार, बैठती रिी, कै सा िै वि? उसे कटना िी पड़ता ि.ै उड़ती रिी, तुमने दखे ा या निीं?” रोते भी दखे ा िंै इन्ि,ंे जब निीं जाती तो, सोचती मैं, हववशताओं के आंसओु ंस,े इनकी प्रतीिारत आूखँ ,ंे क्यों इन्िंे सबकी खबर भीगते, चाहिए? हफर पररहथिहतयों स,े प्रश्न पछू ती, लड़त-े जझू ते, अपने आप में मथत क्यों और कभी, ‘क्यों निीं आई ंइतने हदनों निीं रित?े मुरझाते भी दखे ा िै इन्ि.ें स?े ’ गिन िररयाली से, पर धरती से हचपके िंै तो ठूंठ बन जाने का सफ़र, ‘क्यों, कोई काम िा क्या? मझु स?े ’ शायद ये किते, “तमु कै सी िो? हचतं ा िी िमें.’ जड़ु े रिना चािते िैं सबसे. खबर लेकर सबकी, ‘कोई काम?’ कै सा िोता ि?ै ‘िा,ूँ उस नकु ्कड़ वाले, दरख़्त... दरख़्त.. ये दरख़्त... कै सी िोती िै यि पीड़ा? पेड़ की कोई खबर निीं, (4) यि दखे ी िै मनंै े. पता निीं कै सा िोगा? दरख़्त बनना एक हनयहत िै (3) और वि माली जो ले गया एक न एक हदन सभी को दरख्त... िा, दरख्त बनना िोता िै . हजन पर मरे ी कलम काटकर, मुझे भी अब लगने लगा मंै अब तक वि पनपी या निीं? ि.ै ...... एक पंछी की तरि, जानना िा. कु छ..कु छ.. जब जी में आया, वि पौधा हजस पर. मरे े भी परै धरती से हखलने वाला िा फू ल, हचपकने लगे ि.ंै .. Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 आसपास की हचहड़याूँ यहद मंै दरख़्त शोर मचाने लगी ि.ंै .. बन गई तो... हक तुम्िंे अब दरख़्त कौन सनु ाएगा मझु े जग की? बन जाना चाहिए. कौन बहतयायगे ा मुझसे ? मैं भी चािती तो ि,ूँ कौन सिलाएगा मझु ?े एक दरख़्त बनना, कौन...कौन..कौन? अपने घर-आगँू न का, पर डरती ि.ूँ ... मले – अब निीं रिे वे आगँू न... manjumahimab8@gm न िी उसे सिलाने वाले ail.com लोग.. अब तो दरख़्त मोबा. 09925220177 सड़क के हकनारे खड़े िोते ि,ंै पता- 8, अजं न अपाटमा ेन्ट आत-े जाते लोगों को, भाई काका नगर, िलतजे , अिमदाबाद (गुज.)- ३८००५९ टाटा- बाय बाय करते ि.ैं हकसे फु सता िै जो, दो घड़ी इनकी छाँूव में बठै े, सभी एक कतार मंे खड़े ि.ैं इसीहलए डरती ि,ूँ दरख़्त बनने से. Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 बुढ़र्पर् न ेन्द्ष्ट् कु शर् हमंे बुढा न कहो मोबाईल संा० - 8584000923 बुढ़ापे से लगता है डर, narendraku1984@gmail. आखँ दखे ता नहीं com कान सुनता नहीं हाथ पाव कापंा े थर-थर, हमें बढु ा न कहो बुढ़ापे से लगता है डर, बाल सफे द हो जाते दात ढरे हो जाते बदन में रहता है दद,द हमें बढु ा न कहो बुढ़ापे से लगता है डर, कोई हमारा सनु ता नहीं हमारी कृ तत को गणु ता नहीं सभी अपने में हंै अस्त-व्यस्त , हमें बुढा न कहो बुढ़ापे से लगता है डर, त्वचा तसकु ड़ है जाती चहरे का रौनक उड़ है जाती बच्चे कहते क्यों करते हैं टरद-टरद, हमें बुढा न कहो बढ़ु ापे से लगता है डर, छोटे कहते आपने क्या तकया अपने तलए हंै तसफद जीया साडी समस्याओां का हंै जड़ छु टकारा कब दगे ा आपसे हमें ईश्वर , हमंे बढु ा न कहो बुढ़ापे से लगता है डर। Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 vkReeaFku lka> dk vkSj >wBh vks<+dj Hkh] & eu vkSj vkRek ds isV dk ekSu&ewd lnk&lnk gh ,d dksuk Hkh ugha Hkjk! vuojr] vuFkd gh] thou&?kV rks jhrk dk jhrk nksuksa gkFkksa ls yqVkrk jgk gh jgk !! ljek;k yksxksa dks vHkh Hkh oDr gS vius ru eu vkSj /ku dkA Hkys yksxksa ls lquk Hkh Fkk thuk lh[kks ^nsos lks nsork*! u flQZ vius fy,] vkSj ml ij Hkh lud lokj cfYd lef\"V ds fy,] Fkh olq/kSo dqVqEcde ds fy,] Hkyk vkSj Hkskyk dgykus dhA &&t:jreanksa dh t:jrksa m/kj ysus okys Hkh & dh iwfrZ ds fy,] vsk<s jgs Hkksykiu psgjs ij] vkSj lka> dks lqugyh dj Vkaxs fcYyk ;kpuk dk! yks] vupkgs Hkh dHkh gkFk ugha [khaps ihNsA ij [khaprs gh jgs tks Hkh vk;k muds isVsA cl& dHkh lwjr cny xbZ] dHkh lhjr cny xbZ] ksa@lacks/kuksa@mn ~cks/kuksa dhA ij nqvkvksa ds [katj ogh jgsA jgsA va/ksjksa dk [kkyh lUukVk ijkslrk gqvk le; ljdrk jgk! cl ljdrk gh jgk!! vpkud idh lkalksa us thou dh lka> us ,d lh[k nh vkReeaFku djks] [kksy ls ckgj fudyksA ;g lkjs jax&fcjaxs HkaMkjs fupksM+dj Hkh] Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 वदृ ्धा की कहानी बठै ी थी एक नदन गनलयारे सोनचत जसै े नकस्मत की करुण वदे ना ह्रदय की छलकाती आँखों से पानी ठु करानी ह्रदय को छू लेने वाली याद आ रही थी सब बातंे अपने जीवन की परु ानी एक वदृ ्धा की गाथा सनु लो मरे ी जबानी तभी लगा एक प्रेम पिजंु आ बठै ा नसरहाने सींच सींच कर खनू से अपने हाथों में ले हाथँ मेरा लायी जग में ननशानी सोचा था रोशन कर दगे ा सनु ी दखु ड़े की कहानी होगी सफल नजदंि गानी ले आया वो मझु े वहाँ पाला था उस बटे े को जहाँ नमलता था वो करने लगा मनमानी बरु े व्यसन आये उस बेटे में वदृ ्धों को खाना पानी माँ में ननकालने लगा खामी क्या खोया क्या पाया है इतनी मरे ी कहानी. नसलती थी कपडे औरों के माँ ने की अमीरों की गलु ामी ....रेनू भारती चाहत थी की हो जाये बटे े की सफल कहानी रोशन हो आगँ न मेरा दे बढ़ु ापे में मझु को पानी छोड़ गया मुख मोड़ गया ना कदर मेरी कु छ जानी अब मैं करँ क्या बतलाऊँ वो ले गया सिंग जवानी कै से काटूँ वदृ ्ध हुई मंै छलकाती आखँ ों मंे पानी Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 है सार बहुत ज दिं गी का, सनु ाऊँ कहाँ, जकसे! बेवक्त की ज दंि गी म,ंे है समय कहाँ, जकसे! कोई है व्यस्त परवररश मंे, तो कोई बेगम के पल्लू से बिधं ,े है सार बहुत ज दिं गी का, सुनाऊँ कहाँ, जकसे! कोई है फँ सा कामयाबी म,ंे तो कोई काजबलयत के गर्भ में फँ से, कोई है नादान, तो कोई ानबझू के अंि ान बन,े है सार बहुत ज दिं गी का, सनु ाऊँ कहा,ँ जकसे! कोई है फँ सा ज दंि गी की द्दो हद म,े तो कोई जवलाजसता में फँ स,े कोई है ज़मीन पर, तो कोई पिखं जबन उड़ चल,े है सार बहुत ज दंि गी का, सनु ाऊँ कहाँ, जकसे! कोई है रांझि ा मझन,ू तो कोई फ़कीर बने जफरे, कोई है राम, तो कोई श्याम की सरू त म,ें सलाखो की जगरफ्त मंे सड़े, हे जवधाता! ीवन की अवस्था अपनी गजत से चल,े इस पर न कर्ी ज़ोर जकसी का चल,े जफर क्यों इस बुढापे म,ें न कोई समझ,े न कोई सुने! . ......... ेणुकर् श्रें Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 आप ठेंक िो हंै नर् बर्बर् ! आदतन, स्वतः ही वनकल जाता अगली सबु ह होती है है मरे े महँूु से बड़ी खशु नमु ा, शांित, सकु ू न भरी बचपन से ही कु छ करने की \"सॉरी, आई एम वबजी, कॉल यू चाहता हूँ भलू जाऊिं कहना चाह, लेटर\" \"सॉरी, आई एम वबजी\" एक वदन दखे ता ह,ूँ सड़क पर लग जाऊँू गले बाबा के और हर क्षेत्र में प्रथम आया पड़ा है बढू ़ा ,घायल, ले लँू आशीवादा ! नज़रअदंि ाज करते हंै सब ,और अब यह बन गयी थी आदत वनकल जाते हैं आगे ोतिकर् ाशर्म ,िेन्नई मरे ी मंै रुकता ह,ँू उसे अस्पताल ले डाइरेक्टर , सपू र गनॅ ट्रेडर जाता हूँ अकॅ डमी हर सफलता पर बाबा मरे ी पीठ इलाज करवाता हँू और घर www.tradingsecret.com ठोकते पहचँू ाता हँू उसके बटे े देते हंै मझु े धन्यवाद बचपन बीता,जवानी बीती उस रात मंै सोता हूँ चैन की नींद और देखता हँू स्वप्न मंै बढ़ता गया आगे घबरा कर उठ जाता हँू करता हूँ एक फोन बाबा को भाग रहा था मंै वक़्त से आगे और पछू ता हूँ नहीं देखना चाहता था मङु कर \"आप ठीक तो हंै न बाबा?\" पीछे दसू री तरफ से सनु ाई दते ी है भरााई हई आवाज़ अब रहता हूँ ववदेश में , “हाँू बेटा , तमु कै से हो? \" करता हँू परू े एक घिंटा बात वमलता हूँ छु ट्टी के वदन अपने और वमलता है अपार सखु पररवार से पैसा, एशो-आराम सब है मरे े पास नहीं है अब रातों की नींद खरीदना चाहता हूँ वह भी अपनी दौलत से वमलती है कु छ क्षणों के वलए वकिं तु दवाओंिसे कभी-कभी बाबा का फोन आता है मरे े पास Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 ब र्द यँाू तसर्फ तकसी एक तदन के तलए इसे कच्चे सतू से नहीं बाधं ते हम, के प्टन सेमतं हरीश ‘दवे ’ हर रोज़ पजू ते हैं इसे बस याँू ही हर रोज़ बहतु बदरंग है ! नहीं ! बदरंग नहीं/ ये बरगद की डाल है ! बरगद ही है मझु े मालमू है मझु े भी एक तदन बदरंग बरगद होना ह,ै ! ये जो आड़ी ततरछी तदखती हंै लकीरों सी / मैं भी एक तदन तगर जाऊाँ गा / जला तदया जाऊाँ गा बस एक उम्र भर की गज़ु री कहातनयां हैं जो तलखी हैं उसके कु छ हरे भरे छावँा दने े वाले बरगद छोड़ जाऊं गा चेहरे पर... और कु छ नहीं है उसके पास बस छाँाव है तसर्फ छाँवा ! पर कु छ लोग नहीं जानत,े तक, सनु ्दर तो कौन रह पाता है बड़ा होकर/ जो सच मंे इतना बोझ उठाकर छााँव देता ह,ै ये ही वो बदरंग बरगद है जो पीछे कई और हरे भरे बस गहरा और ऊँा चा ज़रूर हो जाता है इस तलए समझ बरगद छोड़कर तगरता ह/ै नहीं आता ह/ै जसै ा चाहते हैं वसै ा सच मंे तदखाई नहीं दते ा/ तसर्फ जल जाने के तलए/ जला तदए जाने के तलए तमु 'डाल' देख रहे हो / कोई 'तमु ्हारे काम का तहस्सा' उम्रभर छावाँ देता रहता है इसम,ंे कहीं सजानी है या तर्र कु छ सहारा चातहए तमु ्ह,ें है ना! पर इसके पास तसर्फ छााँव ह,ै बरगद और दते ा ही क्या ह/ै दे सकता भी क्या ह,ै छाँाव के तसवा, और छाावँ तो तमु ने खदु बना ली है अपनी, या बना रहे हो शायद/ तभी इसकी याद आयी है / ये बरगद उम्र भर यही करता है छावाँ देता है सहारा दते ा है तर्र, तर्र बस थककर तगर जाता ह/ै तर्र तकसी काम नहीं आता/ बस जला तदया जाता ह.ै .. हमारे यहाँा गावाँ मंे इसे बहुत पजू नीय मानते हंै हमशे ा पजू नीय, Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 ाैलीष्ट् ार्ति जिस्म से लाचार, जिर भी हैं जिक्रमदं उनके इस िज्बे को सम्मान दीजिए िीवनदीप अपाटमट ंेट 36, सबिु पल्ली, दशे जप्रय लुटाते रहे ताउम्र िो प्रमे और नहे उनको भी महु ब्बत का पगै ाम दीजिए नगर, बले घररया, कोलकाता- नागवार गिु रे न उनको कोई बात हो सके तो इस पर भी ध्यान दीजिए 700056 मो-09903146990 इिरात खिाना है तिबु े का उनके पास बैजिए थोडा पास, थोडा मान दीजिए जनभाता रहा ररश्तों को बगैर उि जकए उस बरगद को अब िरा आराम दीजिए। Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 तपिर् क्या मंै समझ सका ह?ूँ समचू े घर की पजम्मदे ारी को - िधु ें िक्िेनर् 'ितु ध' उसी कौशल से पिभा लेिा पक िरू ा घर सधा रह,े बिा रह।े लो, आज मरे े पिता भी आज मझु े अििे गहृ स्थ पिता के चहे रे िर सेवा-पिवतृ ्त होकर घर लौट आए ह।ंै दीख रहा ह,ै एक तिस्वी का चहे रा छोडिे आए हंै उिके बरसों-बरस घर-गहृ स्थी भी एक तिस्या ही तो ह,ै साथ काम करिे वाले साथी। पजसे मरे े पिता िे माँू के सहयोग से पिता को आज पमली हैं सेवा-काल के दौराि की बहतु ही सदंु र तरीके से पिभाया ह।ै भरू र-भरू र प्रशसं ाएं और शभु कामिाए।ं लो, आज मंै उिका ितु ्र ही िहीं, कु छ धापमकि िसु ्तकें , िषु ्िमालाएं और गलु दस्ते पशष्य भी हो गया ह।ूँ इि सबके साथ पिता घर लौटे हंै जो अििे गरु ु की माि-मयािदा हसं त-े मसु कराते। उिकी आि-बाि-शाि को सेवा-पिवपृ त्त के अवसर िर उिके पदए ज्ञाि को हमिे घर िर रखा है रखता है बरकरार एक छोटा-सा जलिाि का आयोजि। हर सहज और ..... पवकट मोचे िर, लो, यह आयोजि भी िरू ा हुआ। हर बार। सब साथी उिके लौट गए हंै अििे-अििे घर। हे प्रभु रह गए हैं अब हम घरवाले। मझु मंे इतिी शपि दिे ा पिता कु सी िर बठै े हैं पवशेष तौर िर मािपसक शपि पक ध्याि-मग्ि की मदु्रा म।ंे मंै पकसी मोचे िर पवफल ि होऊँू कल तक वे मपु खया थे अििे पशष्यत्व को रख सकूँ बदे ाग इस घर के । लेपकि अब? उज्जज्जवल और पिभा सकँू वे दखे रहे ह,ैं अििे ही िैरों को ितु ्र का दापयत्व िरू े हष-ि उल्लास और उमगं स।े जो वदृ ्धावस्था की ओर कदम बढािे वाले ह.ैं .... ओ माँू तमु भी पिता के साथ बठै ो। मंै उिका ितु ्र, सोच रहा हूँ आज मैं भी अििी ित्िी के साथ बरसों िरु ािी एक कहावत जो आि दोिों के चरण-स्िशि करके आज अिायास ही याद आ गई है आशीवादि लिे ा चाहता ह।ँू और सच कह,ूँ याद ही िहीं आ गई, तापक हमें बल पमल,े शभु सोच पमले उसके मायिे भी आज मंै भलू ा िहीं हँू आज भी याद ह.ै .... समझ मंे आ गए हंै पक- अििे बचिि मंे आिके उस प्रेम के बाि का जतू ा जब बटे े के िरै मंे पिस्सवाथि संस्कार के अ्य-िात्र की..... आिे लगे तो समझो वही प्रमे का पिस्सवाथि संस्कार पक बटे ा बडा हो गया ह।ै हमारे भीतर सदवै प्रवापहत होता रह।े सच, आज मैं खदु को मंै प्रण लते ा हूँ पक बडा महससू कर रहा ह।ं वही ससं ्कार मैं लौटाता रहूँ िर बडा हो जािे के असली अथि Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 आिको बार-बार। हर बार। -िधु ें िक्िेनर् 'िुतध' अ्य-िात्र कभी रीतेगा िहीं। पिता मरे े! आिका जीवि तो सिं कि : 75/ 44, प्प्रा िथ, मािसरोवर, जयिरु - पवपवध रंगों के अिभु वों से भरा िडा ह।ै 302020 समय-समय िर वे रंग मझु े भी पमलेगं े मो. 09413418701 मरे े जीवि की बपगया मंे e-mail: [email protected] भी सदंु र-सदंु र फू ल पखलगें े हे पिता! आि अििे ही घर की इस बपगया के मापलक थे हंै और सदैव रहगें ।े अब आि माली बि कर मां के साथ-साथ इसे अििे स्िहे आशीवादि से सींचते रहंे मैं खाद, िािी की व्यवस्था का िरू ा पजम्मा लेता ह।ँू बस, आि यंू ही रहंे सदा हसं त-े मसु करात।े Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 हर् िे घर्ि फतथर हाथों को झलय ा बनाए तझु े झलु ाता फिसलते अश्रु के मार्ग मंे बाधा डालती पथरीली झरु्रगयांा फजस रेशमी ऊूँ र्ली से सीखा चलना टयट र्ई दरार भरा हर कोना रुदन की फमट्टी में कंा फपत तवर प्रतीक्षा करते बोझ ये कफिनाईयाां बसे हारे पजंा ों को कब प्राप्त होर्ा सहारा ये भारी झरु्रगयों की रेखाएंा थक कर शव बन र्या हँू कयूँ?य फदशाएां नही देती झकु े मफततष्क के आर्े अब हार र्या ह.ूँ . कया? बैिा है िु ति िप्रू अहकंा ारी चट्टान कयँू?य फनर्ललगज बच्चे को मरे ी याद नही आती.. पतझड़ के पत्तों सा झड रहा शरीर कयूँ?य फिर खशु हाल वसांत की बले ा नही आती? सासँू े दबी दबी सी चलती है कयूँ?य घटु ती हवा मंे उसकी पकु ार नही आती मैं बाहर हँू घर मंे रहकर भी अपने जाता शरीर कु छ है मीिे सपने बह रहा हूँ ददग से राख जसै ा बहा आओ बन र्या हँू शहर मंे र्ाूँव जैसा अनभु वों के नकु ीले फशखर से उतरा हूँ चढ़ा हँू र्ीले राततों पर कई ंाबार फर्रकर उिा हँू बावले झमय ते कन्धों को बनाये फखलौना तझु े लेकर लोरी सी दौड़ लर्ाता Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 शुझे ‘कल’ की कर्द आिें है - श्रें.िुकर्बम र् जर्न्नर्थ ाेजर्ळ कल सब मरे े साथ थे कल सब मरे े सहयोगी थे कल मरे े पास सौंदयय था कल मरे े पास समय नहीं था कल मै सबको हसँ ा रहा था कल मै भी हसँ रहा था कल मझु े सब पहचानते थे कल सब मझु े जरूरत समझते थे कल मझु े पछू े बगैर ककसी का काम नहीं होता था कल मंै भी सबको मदद करता था कल तो मझु े बहुत सम्मान था उस सम्मान के साथ प्यार भी था कल रोता हआु बच्चा मरे े पास आता था कल तक मै उसके दखु ों का कनवारण करता था कल मैं प्रमे -मकं दर का भगवान था कल मंै सम्पणू य घर में प्रेम देखता था कल तक तो सयू य मझु े दर्नय था लेककन आज वह भी कसर्य अपने ककरनों को ही कदखा रहा है मझु े कल की याद आती है मझु े ‘कल’ की बहुत याद आती ह.ै .... Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 चल पड़ा है ये कै सा अजब ससलससला सवनोद र्गोरखपरु ी 'सनियभ ' चल पड़ा अब सकधर दखे ों संसार है ग्रा.-जड़य ापरु ,पो.-कु समौल सिर रहे दर-ब-दर होके बे'आबरु, मौसम-ए-दौर में 'बदृ ्ध' लाचार हंै जनपद- र्गोरखपुर(य.य पी.),िारत जो बुज़रु ्गों की खाते ह,ैं करते नहीं, तो ये ररश्ता नहीं एक व्यसिचार है सपन न.ं - 273401 सजसनंे सींचा लहू से हर इक ईटं को, मो.नं.- 09415410271 मात्र घर वो नहीं उनका ससं ार है कयँूय सिड़क यँूय रहे हो,अरे बावँू ले! वो सिखारी नहीं तरे े हकदार हैं हे सवधाता ! ये कै सी घड़ी आ र्गयी, बन र्गये 'बदृ ्ध' पेशं न के औज़ार हंै Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 HkkxoUrh [kkus&ihus vkSj iguus dk 'kkdS Hkh & MkW- uohu uUnokuk HkkxoUrh dks ijw k FkkA dgha ls vkbZ gbq Z feBkbZ dks Hkh cLrh ds cPpksa pqUu]w eUq uw vkjS fcjtw xk¡o ls tMq h+ gqbZ yxHkx chl ?kjkas dh vkfn eas cMs+ isez ls ck¡Vrh FkhA 'kke gkrs &s gksrs ,d cLrh FkhA cLrh ds lHkh yksx cMs+ izes ls lHkh cPps iMs + ds uhps te tkrs rFkk vius viuk thou xtq kj jgs Fks vkjS vkil esa lHkh NksV&s NksVs gkFkkas ls ogk¡ dh lkQ lQkbZ djds dks viuk ifjokj ekurs FksA ,d nwljs ds egq Yys dh cM+h nknh vFkkrZ ~ HkkxoUrh dks l[q k&nq[k eas gj le; rS;kj [kMs+ jguk mudh vke=a .k nsrAs og Hkh cMs+ BkB ls isM+ ds uhps viuh fo”k’s krk FkhA cLrh ds chpk&as chp ,d cM+k viuk vklu yxk ljdkjh [kaHks ds cYc dh lk pkdS Fkk vkSj pkdS ds e/; ,d ?kuk gYdh jk's kuh eas cPpksa dk eu j[kus ds fy, dqN Nk;knkj gjk&Hkjk uhe dk iMs + Fkk ftl ij dgkfu;k¡ luq krhA n[s kr&s ns[krs oDr dc xqtj lcq g&”kke if{k;ksa dk e/kqj dyjo luq kbZ iM+rk tkrk dqN irk gh ugha pyrk vkSj dqN T;knk FkkA og uhe dk iMs + Hkh mruk gh ?kuk ,oa nsj gkus s ij tc cPpksa dh ekrk,¡ vkokt yxkus Nk;knkj Fkk ftruk fd ogk¡ ds yksxksa dk isze A yxrh rks dgha tkdj og egfQy iwjh gksrhA ;g ogk¡ dk jkstejkZ dk Øe FkkA gksyh&nhokyh vkjS HkkxoUrh ml bykds dh lcls cqtxq Z lnhZ&xehZ dh Nfq V~V;ksa dk rks cPps cMh+ cslczh ls efgyk Fkh vkjS mldh ctq xq h;Z r dk lHkh ykxs bUrtkj djrs FksA fnu Hkj lrksfy;k] daps vkSj vknj djrs FksA HkkxoUrh Hkh lHkh ?kjksa eas fØdsV dh /kwe rks xyh esa gj le; eph jgrhA lkf/kdkj izo”s k djrh FkhA lHkh ?kjkas dh cg,q ¡ jk?kkjs ke dh iRuh vkjS t;jke vkfn dks cPpksa mls viuh lkl ls Hkh vf/kd vknj nrs h FkhA dk [ksyuk cgqr v[kjrk FkkA dbaZ ckj ?kj dh cLrh ds lHkh cMs+ ,oa NkVs s yksxkas dk Hkh Lusg Nrksa ls os ykxs mu cPpksa ij BMa +k vkSj xeZ ,oa vknj mlds ifz r de u FkkA fdlh ds ;gk¡ ikuh Mky pdq s Fks fQj Hkh cPps rks cPps Bgj]s “kknh&C;kg] gkjh&chekjh lHkh eas mldh lykg mu ij bu ckrkas dk dkbs Z vlj gh ugha iM+rkA yh tkrh FkhA lcq g&”kke eafnj tkuk ,oa fnu ds dqN ukjktxh trkus ds ckn viuk fQj ogh oDr ?kj rFkk egq Yys dh [kcj ysuk mldh ektS Hkjk thou thrAs fnup;kZ FkhA Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 HkkxoUrh dks mu cPpkas ls dHkh dksbZ eas iSlksa dh bQjkr FkhA le; ds cnyrs nkSj us rdyhQ ugha FkhA dbZa ckj mu cPpksa dh xsna ls HkkxoUrh ds ?kj dks Hkh ugha NksM+kA /khjs&/khjs ml HkkxoUrh dks yx pdq h Fkh fdUrq cMs+ I;kj ls og ?kj dh pkjksa cgvq kas esa Hkh nwfj;k¡ c<+us yxhA cPpksa dks xsan ykVS k nrs hA mldh ;gh lgtrk NkVs h&NksVh ckrksa eas muds chp r&w rM+kd gkus k mu cPpksa dks cgrq I;kjh yxrhA vkjS rks vkSj HkkxoUrh dks T;knk vPNk ugha yxrk Fkk fQj mu cPpksa ds [kkfrj HkkxoUrh dbZa ckj jk?kkjs ke] Hkh og muds chp T;knk u iMd+ j viuk thou mldh iRuh vkjS t;jke ls >xM+ pdq h FkhA cMs+ ets ls th jgh FkhA lcq g&lqcg efa nj tkuk] mldk er Fkk fd cPps ;fn ugha [ksyxas s rks dkSu fnu Hkj iwjs egq Yys dh [kcj ysuk vkjS 'kke dks [kys xs k fdUrq jk?kksjke dh cgw dk ekuuk Fkk fd cPpkas ds lkFk egfQy tksM+us dk Øe fu;fer mUgsa [kys uk gS rks xk¡o ds ckgj [kyq s eSnku esa jgrk FkkA ?kj ds >xM+kas ,oa vU; NksVh&eksVh tk,a ;gk¡ mudk thuk gjke u djaAs ckrksa ls og yxHkx c[s kcj jgrh FkhA ?kj eas lkFk&lkFk j[ks cjru Hkh vkil ,d fnu le; us iyVk ekjk vkjS esa vkokt djrs gSa Bhd oSls gh vPNk thou th egq Yys ds cMs+ nknk vFkkrZ ~ HkkxoUrh ds ifr mls jgs cLrh ds ykxs kas esa dHkh&dHkh dgkluq h gks gh NksMd+ j nsoyksd pys x,A bl ?kVuk ls HkkxoUrh tkrh Fkh ij og lc dNq bruk vke Fkk fd ij nq[kkas dk igkM+ VVw iM+k fdUrq mlus cgqr dHkh Hkh dksbZ mls fny ij ugha yrs k FkkA tYnh vius dks laHkky fy;k vkSj iqu% mlds thou dh xkMh+ ijq kuh iVjh ij nkSM+us yxhA HkkxoUrh ds Hkkx cM+s vPNs FkAs fdlh vc ,d ckr t:j cny pqdh Fkh fd vc cVs ksa tekus eas ?kj eas dqN ukSdj&pkdj dke fd;k vkSj cgvq kas ds vkxs mldh mruh ugha pyrh Fkh djrs FkAs /khj&s /khjs ?kj eas cgqvkas dk vkuk 'k#q A mlds gkFk ls /khj&s /khjs lkjs vf/kdkj tk jgs gqvkA lHkh cgq,¡ cgqr fey&tqy dj dke dj Fks fdUrq ikl&iM+kSl okyksa ds fny esa mldh fy;k djrh FkhaA HkkxoUrh ds fgLls esa yxHkx vkt Hkh ogh txg cuh gbq Z FkhA ljy&lgt dke vkrk gh ugha Fkk vkjS ;fn dHkh vk Hkh ân;k HkkxoUrh csVk&sa cgqvkas dh vkjs T;knk /;ku tkrk rks og fdlh nwljs dks laHkykus esa nsj ugha u nsdj viuk thou th jgh FkhA /khjs&/khjs ?kj djrh FkhA vPNk [kkuk&ihuk vkSj esa cVa okjs rd dh fLFkfr vk xbAZ caVokjs esa iguuk&vks<+uk muds ?kj eas vke Fkk D;kfas d ?kj Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
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जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 pDdj [kkdj fxj iMh+ A flj nsgjh ds iRFkj ls cgw vc cuBu dj egq Yys dh vU; Vdjk;k vkjS [kwu dh /kkjk cg pyhA ;g lc cgqvksa ds lkFk esyk n[s kus tk pdq h Fkh fdUrq ns[k cgw dks cM+k nq[k gvq kA ij ;g nq[k HkkxoUrh ds dejs eas vc Hkh ogh 'kCn xwat jgs HkkxoUrh ds fxjus dk u gksdj esys esa tk ik;sxh FkAs mlh xwta esa og u tkus dc mBh vkjS ;k ugha] bl ckr dk FkkA dqN QVk&iqjkuk diMk+ mBdj ckgj fudy iMh+ ;g Lo;a mls Hkh irk yds j cgw us ?kko ij ck¡/k fn;k vkjS MkDW Vj dks ugha jgkA esys ds dkj.k vkt eqgYys esa lUukVk fn[kkus dh rks t#jr gh ugha le>hA iljk gqvk FkkA og yM+[kM+krs dneksa ls fdlh vutku fn'kk eas c<r+ h tk jgh FkhA /khjs&/khjs u [kuw #dus dk uke ys jgk Fkk vkjS og dqN nwj fudy xbZ Fkh vkjS dqN&dqN va/ksjk u cgw dk cM+cMk+ ukA eys s eas u tk ikus dh <yus yxk FkkA yM[+ kM+krs dneksa ls pyr&s pyrs fQdj esa mldk xLq lk lkroas vkleku ij igq¡p og dc jys dh iVjh ij p<+ xbZ 'kk;n bldk pqdk Fkk vkjS mlh xLq ls eas cksy iMh+ & ^^;g Hkku mls Hkh ugha jgk dkj.k fd vkt mlds cqf<+;k u tkus dc rd gekjs izk.kksa ds ihNs iM+h ân; eas rks ogh 'kCn xawt jgs FkAs liq jQkLV Vsuª jgsxhA u [kqn ejrh gS vkjS u nlw jksa dks l[q k ls dh lhVh vkjS /kMk+ /kM+ dh vkoktsa c<u+ s yxh Fkh thus nsrh gAS eu gksrk gS fd vkt 'kke ds [kkus fdUrq vkt HkkxoUrh dks dNq Hkh lqukbZ ugha iM+ esa gh bls tgj ns n¡w ftlls fd ejs h vkRek dks jgk FkkA Vªus cgqr rsth ls xtq j pdq h Fkh vkSj 'kkafr feysA** vkt rd ds NksV&s ekVs s rkus rks HkkxoUrh ds ek¡l ds ykFs kM+s ;=&r= fc[kjs iMs+ HkkxoUrh fny ij iRFkj j[kdj lqu jgh Fkh FkAs eys s ls ykVS rs gq, ykxs ksa us yk'k ns[kh vkSj fdUrq vkt dh ckras lqu mls cM+h ihMk+ gbq AZ mls dqN igpku fpg~uksa ls irk pyk fd yk'k yxk fd ftu csV&s cgqvkas dks vkt rd mlus HkkxoUrh dh gh gAS fn[kkos ds fy, cgq,a [kwc dqN ugha dgkA gj ihM+k dks piq pki dM+ok ?k¡wV jksbZ vkSj cVs kas us Hkh dkbs Z dlj ugha NkMs h+ A dNq le>dj ih xbZ oks gh ifjokj ds ykxs vkt fnuksa ckn tc mlds ijq kus diM+ksa ,oa vU; mlds ejus dh nqvk,a ek¡x jgs gAaS vkt og NksV&s eksVs lkeku dks nku&i.q ; ds fy, fudkyk Lo;a vius thou dks f/kDdkj le> jgh Fkh rks blh chp ,d dkxt dk VqdMk+ Hkh feyk vkSj vc lpepq ej tkuk pkgrh FkhA ftleas fy[kk Fkk& ^^gs Hkxoku] eauS s viuk thou Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 vPNk ft;kA eq>s fdlh ls dksbZ f'kdk;r ugha] vius cgw&csVkas ls Hkh ughAa rw mUgas lnk [k'q k j[kuk vkSj muds csVkas dks ,slh cqn~f/k nsuk fd os muds lkFk olS k u djs tlS k fd esjs cgw&csVksa us esjs LkkFk fd;kA os lnk [kq'k jgsa vkSj mudh gj vkjtw iwjh gksA gk¡ cVs k!as ?kj ds chp eas yxs ihiy ds ck;ha vksj tehu eas ,d NksVh lh eVdh nch gS ftleas dqN iSls vkSj xgus j[ks gaAS oks /ku euaS s vius cqjs fnukas ds fy, j[kk Fkk fdUrq euSa s rks mldk miHkksx fd;k ugha vkSj rqe Hkh mUgsa er fudkyukA Hkxoku u djs rEq gkjs csVs Hkh ;fn ejs s cVs kas tlS s fudys rks req ejs h rjg nq[k u mBkukA ml le; ml /ku dk mi;ksx dj viuk thou l[q k ls thuk** vkt cg&w cVs ksa dh vk¡[ksa ue vkSj fny xe ls Hkj x, FkAs mu lHkh dks vkt vius fd, ij cgqr iNrkok gks jgk FkkA vc mudh vk¡[kas lwus dejs eas viuh ek¡ dks [kkst jgh FkhA Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 HkO; ,dkar dk;Zjr ekgu yky th us dksbZ dlj ugha NksM+h uezrk &MkW0 laxhrk lDlsuk dh eka dk bykt djkus esa fQj Hkh---------------A 'kksd trkus vkSj lkaRouk nsus ek= pkj N% fnu ds fy, tSls ^^fnYyh esa rks xjeh us bl lky fjdkMZ rksM+ fn, gSaA** uezrk us ?kqlrs gh gSaMcSx iVd ,lh vkWu djrs gq, ig¡pk;h Fkh mUgsa fQj ls fookg dj ysus dh lykg dgkA nsdj j fgLls esa ;gh gky gS lksp dj gh pys Fks ?kj lsA ftlds lkFk thou fcrkuk csVkA Hkksiky gks ;k gSnjkcknA** eksguyky us ikuh dh cksry fQzt ls fudky uezrk dks Fkekrs gq, dgkA Fkk mldh jk[k BaMh gqbZ ugha fd u;k eaMi xkM+us dh ^^U;wt ns[k yh gksxh vkius rHkh ekSle ds gky lquk, ckrA rc ugha le>s Fks eksguykyth vc lksprs gSa rks tk jgs gSa vktA** csVh us pqVdh yhA ^^Okks rks ns[krk gh jgrk gw¡ ] vkt Hkksxk tk jgk gky lkQ yxrk gS fd rc Hkh mudh vkenuh ds vadksa dk lquk jgk gw¡ rq>sA** vkdyu vkSj vius i{k dh lq[k lqfo/kk dh dYiuk dh ^^Qksu vk;k gksxk ;k fd;k gksxk dghaA** csVh vPNh rjg tkurh Fkh firk dksA xbZ gksxhA viuk lq[k&LokFkZ lHkh pkgrs gSa blesa cqjkbZ ^^gka] vkt nksuksa txg ls Qksu vk, FksA** D;k gS\\ ij cqjkbZ rc gksrh gS tc ;g nwljs ds fgr dks ^^vks gks ] rks Hkksiky okyh ekSlh vkSj gSnjkckn okys pkpk pkph nksuksa i/kkjs Fks Qksu ijA fQj ogh ,d gh mlds fglkc ls u rksy dj vius utfj, ls ns[k ckr jkx gksxk nksuksa dkA** fi, x, ikuh dk Lokn dlSyk gks euokus dh ;kstuk cukbZ tk,A vkSj fØ;kfUor djus ds x;kA ^^rks csVk xyr D;k gS blesa \\ gekjs gh fgr dh rks ckr ;su dsu rjhds [kksts tk,aA ncko cuk;k tk,A ^^gekjs fgr dh\\ ;k vius\\ pfy, crkb, D;k dgk nksuksa eksguykyth us viuh dks gh us\\** uezrk vius firk dks nq[kh ugha djuk pkgrh FkhA ^^ogh] uezrk dk D;k dj jgs gSa\\ gekjs crk, gq, yM+ds viuk y{; cuk;kA ?kj esa lkFk jgus okyk dksbZ vU; dsoy ukSdjh ds lgkjs yM+fd;ksa dh ftanxh ugha pyrhA lnL; Fkk ughaA ?kj] Ldwy vkSj dk;kZy; ds chp dh vkidh Hkh mez gks jgh gSA fjVk;jesV utnhd gSA dc rd pysxk ,slk----** mnklh viuk izHkqRo tek pqdh Fkh h c<k+ nsrk FkkA eksgu yky dh vkokt ijA ^^D;ksa lqurs gSa bu lcdh\\ lc vPNk gksxk MSMwA lHkh dk;kZy; vkSj Ldwy ds le; esa rkyesy fcBkuk mudh dks rks vPNk dekrh [kkrh vkidh csVh fn[k jgh gS tks viuh& viuh rjQ [khapuk pkg jgs gSaA bUgsa ;g ugha igyh leL;k cu x;kA bls gy djus ds fy, mUgksaus irk fd vkidh csVh ;gka rd igqaph dSlsA rc dgka Fks lc tc vki ,M+h pksVh dk tksj yxk jgs Fks viuh csVh vR;ar yxko ds ckotwn Hkh cspdj ubZ fnYyh esa uezrk dks ikyus esaA** ^^ij csVk---** ds Ldwy okys {ks= esa gh xSj ljdkjh vkoklh; ;kstuk ^^dksbZ ij oj ughaA dksbZ fpark ughaA pfy, pfy, tkb, esa rhu csM :e okyk ;g ¶ySV fy;kA ;g muds vc vkiA ?kwe ds cukrh gw¡A** csVh ds blh viuRo dh t:jr Fkh vkfQl ls Hkh ek= nl feuV dh nwjh ij FkkA cgqr eksguyky th dksA os Hkh rks e ugh eu ngy tkrs Fks fnuksa rd csVh ds Ldwy ls okil vkus ds fglkc ls gh csVh dh fonkbZ ds ckn vius ,dkdh thou dh dYiuk djdsA vius dk;kZy; esa viuk yap Vkbe ,MtLV fd;kA vf/kdkjh gksus ds ukrs ogka Hkh ftEesnkfj;ka de ugha Ukezrk vkSj eksguyky chl o\"kZ ls blh ¶ySV esa ,slh gh gYdh & Hkkjh ckrksa ds lkFk jg jgs gSaA fny FkhaA dHkh dHkh c dh chekjh ds pyrs mudh iRuh us ftl oDr mudk dks laHkkyus ?kj vkus dk gksrk vkSj vkSj b/kj pyrh lkFk NksM+ ml le; uezrk ek= vkB lky dh FkhA gqbZ ehfVax yzch f[kap tkrhA ¶ySV ds njokts ij cSBh Ldwy ls vk;h Fkdh ekanha muhanh uezrk dh lwjr mUgsa ehfVax esa eu ls cSBs u jgus nsrh A ckdh rks etcwjh FkhA ,slk mlds nl X;kjg lky dh gksus rd gh pykA ekr`foghuk eklwe csVh viuh mez ls igys gh cM+h gks xbZA mlus tYnh gh vius dks ifjfLFkfr;ksa ds vuq:Ik <ky fy;kA vc Mªkbax ckDl ds t:jh lkeku & jcj isafly dh rjg ?kj dh ,d pkch Hkh mlh esa jgrhA og vkrh ¶ySV dk njoktk [kksyrh Hkhrj ls can dj Hkh ugha ikrh fd firk dk Qksu vk tkrkA firk dh ftEesnkfj;ksa vkSj csVh dh laj{kk ds chp Qksu etcwr uezrk [kqn viuh eka¡ cu tkrhA eka okys [kqn ds lkjs dke & cSx txg ij j[kuk] diM+s cnyuk] [kkuk [kkuk vkfn vkfn& firk dh fgnk;r vuqlkj djrhA lks tkrhA rHkh mBrh tc eksgu yky th vkdj ?kaVh ctkrsA 'kke dks dqN gYdk [kk ihdj nksuksa ikdZ esa Vgyus tkrsA ogka Ldwy dh viuh mez dh lgsfy;ka [ksyrh feyrha rks Hkh og vkSj cPpksa dh rjg >wyksa ij Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 yVdus ;k fQj cl ijEijkxr [ksy [ksyus dh ctk; vkSj mlls feyok;k gqvk yM+dk firk dh lkFkh cu cl jSEi ij Vgyuk gh pqurhA firk dk yk[k ckj fd;k vkxzg Hkh mls viuh ftEesnkfj;ksa fcjknjh dk Hkh Fkk vkSj mlh dh tSlh lksp tSlk HkhA ls fMxk ugha ikrkA eksgu yky lc le>rs FksA dHkh ij og fpafrr Fkh vius fookg ds ckn vius firk ds yxrk mUgha dh otg ls csVh dk cpiu gkse gks jgk gSA ij muds 'kknh djus ij Hkh rks fLFkfr;ka blls fy,A l=g o\"kksZa ls dsoy csVh ds lq[k nq[k] i<+kbZ T;knk fcxM+ ldrh FkhaA rc uezrk dks laHkkyuk vkSj fy[kkbZ ds fy, thus okyk O;fDr fuiV vdsyk dSls Hkqxr dj Hkh 'kknh u djus ds QSlys ij gh vfMx th ik,xk\\ dkSu j[ksxk mudh gkjh chekjh dk [;ky\\ jgsA vkSj lc ,slk gh pyrk jgkA ?kj vkdj firk gh mlds fookgksijkar mlds lkFk jguk mlds fl)karoknh csVh dks i<+krsA ijh{kk,a gksrh rks T;knk rS;kjh djokrsA fQj Vh-oh- ns[krs vkSj lks tkrsA gka [kkuk cukus okyh firkth dks eatwj ugha gksxkA ;g og vPNh rjg tkurh mUgsa 'kq: ls gh vPNh fey xbZ FkhA lks bldh dHkh FkhA bUgh [;kyksa esa Mwcrh mrjkrh blh leL;k dk gy uezrk dks ;kn ugha fd ml fudkyus esa yxh Fkh ogA ,sls rks mlus vius firk ds yacs isafVx ds ml iqjkus 'kkSd dks iquZthfor dj fn;k Fkk vius LokFkZ ds dHkh mUgsa laHkkyus ;k gkypky ysus gh fnYyh vk;k gks ;k Qksu ij gh fu;fer ckr dh gksA ftls mUgksaus viuh iRuh ds nsgkar ds ckn frykatfy ns gka dbZ ckj vk, Hkh ij rc tc fdlh ds csVs csVh dk nh FkhA ,d fnu vkfQl ls vkrs le; lkjk lkeku baVjO;w est ijA gDds cDds eksguykyth ?kwjrs jgs ml lkeku Lkky nj lky Dykl c<+us ls uezrk dh i<+kbZ c<+rh xbZA mldk Vgyus tkuk can gks x;kA vkBoha dks] ^^D;k gS ;g lc\\ vc rw isafVx djsxh\\ le; gS rd vkrs vkrs og [kqn gh laHkkyus yxh viuh xfrfof/k;ka viuh i<+kbZA vc eksguyky vdsys gh tkrs rsjs ikl\\** fQj ?kj vkdj ogh :VhuA mudh lQyrk blh esa Fkh ^^eSa ugha vki djsaxsA** fd uezrk i<+kbZ dk gj Lrj vPNs uacjksa ls ikl dj dEI;wVj bathfu;fjax dj vkt fnYyh esa gh ,d ukeh ^^Ekq>s dgka vkrk gS ;g lc \\** eksguyky lkQ eqdjsA yk[k dk vPNk [kklk iSdst FkkA eksguyky dh ^^jgus nhft, lc irk gS eq>sA lc vkrk gS vkidks eSaus lsokfuo`fRr esa cl Ms<+ nks lky cps FksA pkgrs Fks muds fjVk;jesaV ls igys gh uezrk dk fookg gks tk, cq[kkjh esa iM+h vkidh lkjh fp=dkjh ns[k yh gSA nks ij fQj------A mlds fookg dh fpark mUgsa vf/kd gksus yxh Fkh blhfy, uezrk ds euk djus ds ckotwn Hkh rks eSa Qzse djkus Hkh ns vk;h gw¡A** mUgksus tkfr fcjknjh esa vPNs yM+ds crkus ds fy, ^^ij csVk vc eq>ls ugha gksxkA fdrus lky gks x, lHkh bl cgrh /kuxaxk dk #[k vius [kkunku dh rjQ djus esa yxs NksM+sA vknr gh ugha jghA fQj rsjh eka ds tkus ds ckn FksA ij uezrk Fkh fd u u djrh u gkaA vkSj eksgu yky bl ekeys esa rks D;k fdlh vkSj ekeys esa Hkh ,slk vc eu Hkh ugha djrkA** ;g #fp mudh Hkkoqdrk ls dqN Hkh dgrs djrs ftlesa csVh dh iwjh lgefr ;k tqM+h gqbZ FkhA eksgu yky dks vc fQj deh [kyus yxh mldh eka dhA gj rjg dh ckr og csVh ls dj ysrs ^^tkurh gw¡ firkth] ij ns[kuk vkidks vPNk yxsxkA FksA mldh 'kknh dh ckr Hkh djrs gh Fks ij 'kk;n uezrk vius eu dh ckr mUgsa crkus ls f>>drh FkhA bl vDVwcj esa ek¡ dh cjlh ij ** dqN Fkk tks og dguk pkgrh Fkh ij og lkekU; okrkZyki esa gh fleV dj jg tkrk FkkA ,slk mUgsa uezrk vkSj Hkh ue gks vkbZA bl ueh esa mlds firk dk vDlj yxrk FkkA Hkwyk fcljk [okc fNik Fkk & viuh isafVXl dh izn Zuh dh Fkh og ,d u, fopkjksa dh lqy>h gqbZ ;qorh FkhA laLdkjksa ls tqM+ko ij u,iu ls yxko us mls feys yxokus dk ftls mlus mudh iasfVXl ds chp feys ,d tqys O;fDRro dh Lokfeuh cuk;k FkkA mls ilan Fkk vius thou lkFkh ds :Ik esa firk }kjk gh pquk gqvk dkxt esa i<+ fy;k FkkA ^^Å gw¡-------** 'kCnksa dks Hkkoqdrk us lgst fy;k FkkA ^^Iyht firkth] esjs fy,A** uezrk mUgha ds Hkys ds fy, FkhA u uk vkSj u gka dhA vkSj og ckgj ?kweus pys x,A blds fy, rks og mUgsa euk gh ysxh ij mldh nwljh fpark xgu FkhA okftc FkhA mlh ds lek/kku esa tqVh FkhA uezrk ?kj ls vkfQl ds fy, Hkh dqN tYnh fudy tkrh FkhA firk ds iwNus ij ;gh dgrh fd ^^dke T;knk gSA mlds fy, 'kke dks #d dj nsj rd djus ls csgrj gS fd tYnh tkdj fuiVk nsA** dqN fnuksa ls firk esa vkrk ,d ifjorZu cM+k lq[kn yx jgk Fkk mls A vc uezrk dks mUgsa ikdZ esa Hkstus ds fy, ,d ckj Hkh dguk ugha iM+rk cfYd mlds vkfQl ls vkrs gh og mls rS;kj feyrs tkus dksA og mlls dkQh igys vk tkrs Fks vkfQl lsA mlus uksV fd;k fd Vgydj okfil vkus dk le; Hkh c<+rk tk jgk FkkA mlds fy, lq[kn lwpuk gh Fkh tc firk us dk;kZy; le; ds ckn dk;kZy; ls gh vius dgha ckgj tkus dh mlls vuqefr lh ekaxh D;ksafd og dHkh Hkh mlds fcuk dgha ugha x, FksA tkuk Hkh gksrk Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 rks Vky tkrsA ^^ og D;ksa\\ c<+k;kA muds bl rjg ds Qksu fQj rhljs pkSFks fnu ^^oDr vkus ij irk py tk,xk MSMwA D;ksa lksprs gSa tYnh ugha vk ikÅ¡xk ij vkuk t:jh gS vkSj 'kknh rd #duk t:jh gSA** ehfVax gS dgks rks pyk tkÅ¡A dylZ [kRe gks x, ysrk tkurs Fks eksguyky fd csVh tc ykM+ esa gksrh gS rks MSMh dks MSMw dgrh gSA ij bl le; D;ksa ugha le> vkÅ¡ D;k \\ vkfn vkfnA uezrk dks vPNk yxrkA ik,A Hkh pVd gksrs x,A iz'kkar ds ekrk firk ds lkFk feydj lc r; vkSj eka dh cjlh ij gh mudh isafVXl dh cM+h gks x;k FkkA 'kknh ds rqjar ckn gh ,d o\"kZ dh lh ,X yxhA dkQh uksfVl dh xbZ 'kgj esaA uezrk firk dk .g liuk iwjk djus esa vius vkfQl ls NqV~Vh ysdj fnu jkr bartke esa yxh gqbZ FkhA ogha LohV~tjySaM tkuk FkkA r; ;g gqvk fd uezrk Hkh viuh mUgksaus uezrk dh eqykdkr d`\".kkth ls djokbZA uezrk us ueLdkj dh rks mUgksaus mls xys ls yxk fy;k fQj dkQh nsj rd isafVXl vkfn ds ckjs esa ckr djrh jgha blh ds vuqlkj ohtk Hkh rS;kj gks x;k lky Hkj dkA ds viuh Hkh crkrh jghaA mudk bl rjg vkil esa vuqlkj gh ianzg fnu ckn dh rkjh[ksa r; gks xbZa FkhaA cfr;kuk eksguykyth ds psgjs ij vkRelarqf\"V ds Hkko lxkbZ vkSj 'kknh dhA nks fnu dk varj Hkh j[kk x;k tks eksguyky th ds fy, ,d igsyh FkkA ikl nwj ds ns jgk FkkA mlh gksVy esa dh Fkh tgka lxkbZ gksuh FkhA fu/kkZfjr Ekghuk nks eghuk chrrs chrrs uezrk dks yxk kkar dh lxkbZ gks xbZA kke dks mlus x.k mifLFkr FksA mudh vaxwBh dh jLe ds ckn lc fdafpr ladksp ds lkFk firkth ls dgk] ^^vki pkgsa rks O;Lr FksA rHkh ekbd ij uezrk dh eghu vkokt xwath & ^^lHkh ls fuosnu gS fd eap ds ikl vk tk,aA vkidh dh dj nsa esjh ckrA** lkSE; lk ^^ kknh ds ckjs esa FkkesA ckr djrs le; eksguyky ds Loj esa og fpark ugha Fkh QqlQqlkgVsa c<+ xbZa & ,d vkSj lxkbZ\\ fdldh\\ crk;k rks ugha igys ls\\ D;k dguk pkgrh gS tks gj ckj gksrh Fkh ?kksj ,dkarrk okys cksueSjks dh uezrk\\ csVh dh le>nkjh dks tkurs Fks HkyhHkkafr eksguykyth rjgA ij os Hkh lUu FksA eap ij mlds ikl vk,] ^^D;k dg jgh gks csVk\\ ^^gka MSMh] eSa feyrh jgh gw¡ iwjs o\"kZA cgqr gh fLer eqLdjkgV us mldk iwjk lkFk fn;kA uezrk us vPNs fopkjksa dk yM+dk gSA lfoZl esa o vkSj Hkh dbZ A HkhM+ dks phjrk og ckgj fudy x;kA fdlh dh le> esa dqN ugha vk jgk ekeyksa esa esjh dkQh gsYi dh gSA** laLdkjksa us uezrk FkkA dksbZ vuqeku yxk,] vkil esa ckr djs blls igys gh llEeku d`\".kk th dk gkFk Fkkes eap ij p<+ dh LoHkkfod /kheh vkokt dks Hkh ykt ls /khek dj x;kA d`\".kkth ipkl ls ipiu ds o; dh vkd\"kZd O;fDrRo dh /kuh lkSE; o xaHkhj efgyk FkhaA uezrk us fn;k FkkA vkxs c<+ dh iwjs vknj ds lkFk d`\".kkth dks Fkke fy;k vkSj dgk] ^^ pkSafd, er & lxkbZ gksuh gS vHkh esjs firk csVkA** xys ls yxk fy;k csVh dks eksgu yky usA dqN Jh eksguykyth vkSj d`\".kkth dhA** dgrs gh lc rjQ fiuMªki lkbysalA varjky ds ckn Qksu ds ikl okys lksQs ij cSBrs gq, pqIih eksguyky th us gh QqlQqlkdj rksM+h] ^^----D;k dgk] ^^lp dgwa rks rsjs fy, ns[ks gq, lkjs yM+dksa esa ls dg jgh gks csVh\\ lc D;k dgsaxs\\ dqN rks lksp bl mez esa----\\** rwus esjs eu dh ckr Nhu yh csVkA eSa vkt gh lcls ckr djrk gw¡aA** vfrfjDr mYykl fNik, ugha fNi jgk FkkA mudh vkok eglwl ugha gqbZA og tkurh Fkh mldh vlyh ijh{kk vHkh ckdh gS ftlesa mlds mRrh.kZ gksus ij gh mlds Hkkoh thou dh uhao fVdh gSA izdV esa mlus dgk] ^^ckr rks dj yhft, vki Hkys lclsA ij gksxk lc oSls gh tSls ge vkSj vki fMlkbM djsaxsA** eqLdqjkrh uezrk us furk dks le>kk;kA ^^eryc\\** ^^Ekryc ;g fd 'kknh lxkbZ dh rkjh[k vkSj rjhdk ge gh fMlkbM djsaxsA** ^^D;k dqN vyx rjhds ls djus dh lksp jgh gS crk rks lghA** ^^fcYdqy ughaA cl lxkbZ vkSj 'kknh ds chp esa nks fnu dk varj j[kuk gSA** Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 ^^vkidks d`\".kkth ilan gSa u\\ mudh vknrsa] vfHk#fp;ka okrkoj.k dh Hkkoqd pqIih dks rksM+k esgekuksa dh rkfy;ksa muls ckrphr djuk] lkFk le; fcrkuk vkSj Hkh lc---A us tks eap ds fcYdqy ikl f[kld vk, FksA eap ij gSa fd ughaA** ^^-------------------------------------------** Fkkeh vaxwBh dh fMCch [kksydj eqLdqjkrs gq, eksguyky ^^pfy, eku ysrs gSa ilan gSaA ekSua Lohd`fra y{k.kaA rks ds lkeus c<+k nhA ^^ij csVk d`\".kkth ls iwNk rks gksrkA og jkth gksa u &&&&&&&&&&&&&&&&&&& gksaA** vHkh fgpfdpkgV de ugha gqbZ FkhA ^^MSMw! Okg jkth gSa blds fy,A bruk cM+k fu.kZ; D;k eSa eks0&9413395928 ;wa gh ys ysrhA eSaus rks mUgsa rHkh eka eku fy;k Fkk tc MkW0 laxhrk lDlsuk vLirky esa lky Hkj igys muls igyh ckj feyh FkhA og vius ?kqVuksa ds nnZ dks fn[kkus vkbZ Fkha vkSj eSa irk&72@123] uhM+ vkidh dksbZ nok ysus xbZ FkhA mUgsa muds ?kj viuh dkj ls NksM+us dh ftn djds mUgsa fcBk rks fy;kA ij iVsy ekxZ] ekuljksoj dkyksuh] cgqr ihM+k gqbZ tc muds ?kj dk irk o`)kJe fudykA NksM+rs le; mudh vka[kksa dh ueh vkSj ;g dguk fd t;iqj&302020 d csVh gksrh] eq>s Hkh ue dj xbZA** lHkh dh vka[ksa uezrk Ikj fVdh Fkha vkxs dh ckr og fQj cksyh] ^^eq>ls ugha jgk x;k muls fcuk feysA vxys fnu gh tk igqaph oghaA ikap o\"kZ igys ifr ds nsgkolku ds ckn vius gh ?kj esa nks csVksa vkSj cgqvksa ls feyus okys vieku dks ?kawV ?kwaV ih thus dh vis{kk o`)kJe esa lEeku ls thuk Lohdkj fd;k Fkk mUgksausA ftruh ckj muls feyrh vPNk yxrkA fQj vkids vkSj muds vdsysiu dk lksprs gq, gh eSaus mUgsa vkils feyok;k ikdZ esaA-----A** feyok;k \\\\ rqEgsa irk Fkk uezrk ;g lc\\ ^^gka eq>s lc irk FkkA jkst vkfQl tYnh tkus ds uke ls eSa muls gh feyus tkrh FkhA rc ls d`\".kkth us Hkh eq>s csVh eku iwjk ykM+ fn;k gSA cl mUgsa ;g ugha irk Fkk fd eSa vkt ds fnu gh ,slk dqN d#axhA vkSj vki tc eSaus mlus Hkh bl ckr dks u dsoy lg\"kZ Lohdkjk cfYd viuh lxkbZ okys fnu gh vkidh vkSj d`\".kkth dh lxkbZ djokus dk lq>ko fn;kA tc ;g lc r; gks x;k rc gh eSaus viuh 'kknh dh gka dh gSA vc lc vki ij gS----;s tks nks fnu eaSus chp esa j[kok, gSa muesa esjh 'kknh gksus ls igys vkidh 'kknh gksxhA** gS& lksp lksp dj eksguyky gh ugha d`\".kkth lfgr lHkh esgeku vokd~ FksA ;g iy ,sls Fks ekuks 'kCn pqd x, gksaA cl Hkko gh Hkko Fks lkou ds cknyksa tSls meM+rs ?kqeM+rsA ^rw rks esjh eka fudyh csVk* dgrs gq, yxk fy;kA d`\".kkth dh ekSu Lohd`fr mUgsa fey gh xbZ FkhA csVh nkekn dh ubZ lw>] le>nkjh vkSj lkgl us u;k bUnz /kuq\"k cuk fn;k Fkk eksguykyth vkSj d`\".kkth ds thou esaA muds vyx vyx ,dkar dks feyk ,d HkO; ,dkar dk etcwr egy [kM+k dj fn;k FkkA Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 cMh+ vEEkk rdjhcu lRrj lky gkxs h exj n[s kus eas og uCcs ds vkl iklyxrh FkhaA cMh+ vEEkk us ekes cRkh tykbZ vkjS viuh yky lQ+ns /kCcsnkj njh ij cSB xbAZ dejs esa dksbZ tgk¡ dgha Hkh cM+h vEek mBrh-cSBrh rLohj ;k fdlh rjg dk ltkoVh lkeku u FkkA ,d njokt+s ds vykok rkth+ gok dh dkbs Z Fkh ogk¡ ,d vthc-lh cncw NkMs + tkrh FkhA O;oLFkk ugha FkhA nks f[kM+fd;k¡ Fkha exj dhyas mUgsa ikuh ls csgn <j yxrk Fkk vkjS mruk gh vkjS QVV~ s Bksda dj mUgsa ge”s kk ds fy, can dj gok lAs vthc ckr Fkh gok vkjS ikuhA ekuo fn;k x;k FkkA nl QqV Åp¡ k ,d jk”s kunku Hkh thou ds vR;ra egRoiw.kZ rRoA yfs du cMh+ Fkk ysfdu nkuns kj “kh”ks ls ogk¡ ls dsoy jk”s kuh vEek ds fy, csgn Mjkous vkjS nnZukdA cMh+ ds fy, gh jkLrk cuk;k x;k FkkA dejs esa dbZ vEek dgrh Fkh dHkh og cgrq lqUnj gqvk lky ijq kuk ,d txa yxk ghVj Hkh j[kk FkkA Nr ij ia[kk yVd jgk Fkk ysfdu fiNys iUnzg djrh FkhA vius ukrh-ikrs ksa dks og tc viuh lky ls og can gh iM+k FkkA olS s rks cMh+ vEek lUq njrk ds fdLls luq krh rks os cgqr gjS ku gksrAs gkus k Hkh ykte+ h Fkk D;kafs d os dgkfu;k¡ mUgsa olS s dgha vkrh-tkrh ugha Fkh vkSj vxj tkrh Hkh gh vthcksxjhc vkSj fnypLi yxrh tlS s Fkh rks [knq dks ,d dacy esa yiVs dj tkrh FkhA frfyLe vkSj ifj;kas dh tknbq Z dgkfu;kA¡ dgkuh tgk¡ Hkh og tkrh Fkha ogk¡ ds ia[ks t:j cna lqurs oDr cPpkas dks yxrk fd lkeus cSBh og djok nrs h FkhA flj ij xje LdkQ]+Z cnu ij c<w h+ vkSjr mudk eu cgykus ds fy, viuh xje diMs+] iSjksa eas ekts s vkSj trw ]s gkFkksa esa lqUnjrk dh cukoVh dgkfu;k¡ luq k jgh gSaA ;k nLrkus xfe;Z kas dh rirh nksigj vkjS yw eas Hkh fdlh ijh dh dgkuh esa ijh dh txg viuk “kjhj dks xehZ nus sokys ;s diM+s dHkh cM+h vEEkk uke j[k nsrh gAS ftu ij os ;dhu rks ugha dh nsg ls vyx ugha gksrs FksA ,ls k yxrk Fkk djrs exj gk¡ mUgsa etk+ cgrq vkrkA vkSj gj ekuks os lc ges”kk ds fy, mudh Ropk ls “kke os cM+h vEek dks ?kjs dj cSB tkrAs fpid x, gkAsa lkekU; fnuksa esa Hkh cMh+ vEek & cMh+ vEekA dgkuh lqukvks uA ogh okyh mUgsa ,ls s igu dj jgrh tSls vkleku ls /kiw ftlesa ?kksM+s ij lokj pkj Q+fj”rs vkleku ls ugha cQZ+ fxj jgh gkAs ns[kus esa csgn iryh mrjs vkSj vkidks vius lkFk ys x,---& vkB bruh dh gfM~M;k¡ lkQ+ utj+ vk,] dej >dq h lky ds ijost+ us viuh nknh ls dgkA gqbZ tlS s fdlh jh<+ dh gM~Mh dh chekjh ls xzLr jksxh dh gks] >jq hnZ kj psgjk] lk¡oys ls dqN T+;knk & fdruh ckj lquk pqdh g¡w--- ckj-ckj ,d iDdk jxa ] xkyksa ij mHkjh gqbZ gM~Mh] Å¡ps uhps dgkuh luq -lqu dj rEq gkjk eu ugha HkjrkA & nk¡r] dkukas eas cMs+-cM+s Nsn vkjS nqfu;k dks dk¡irh gbq Z vkokt+ eas cM+h vEEkk us cPpkas ls dgkA lkQ+-lkQ+ n[s kus ds fy, lw{en”khZ dk dke & gk¡] gk¡ luq kvks uA geas cgrq vPNh yxrh gS djrk ukd ij j[kk p”ekA vkSj p”es ds dksuksa ;s okyh dgkuhA& ogk¡ cBS s lHkh cPpkas us ,drku ij tek eSyA oSls rls cM+h vEek dh mez esa dgkA & Bhd gS A ,d fnu eaS fnu Hkj dk dke [kRe dj---- Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
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जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 vxys fnu lcq g pk; dh I;kyh dks pkjikbZ ds xeZ djus ds fy, dgkA cM+h cgw us xeZ ikuh uhps j[kdj “kdhy us vEek dks txk;k& vEeh vkSj diMs+ xqly[kkus eas j[k fn,A olS s rks cMh+ mBks] pk; ih yksA cMh+ vEek us vk¡[ks [kkys dj vEek jkts k+ uk+ ugha ugkrh Fkha D;ksfa d xeZ ikuh ls “kdhy dks n[s kk vkSj fQj ls e¡wn yhA ugkus ds ckotnw muds “kjhj esa vdM+u vkjS & vEeh D;k ckr g]S vkidh rch;r rks Bhd gS fBbqju jgrh FkhA yfs du tc mUgsa fdlh ds nnZ u\\ & ?kcjk, Loj esa “kdhy cksykA xnZu dk bykt djuk gkrs k rks ugkuk muds fy, cgs n fgykdj cMh+ vEEkk us tokc fn;kA& rks fQj t:+ jh gks tkrkA Xklq y[kkus ls ugkdj fudyus vki vHkh rd mBh D;kas ughaA irk gS vkidks ds ckn cM+h vEek fQj vius dSnuqek dejs eas vkB cts gSAa pyh xbZA vkjS njokts+ dks vUnj ls cna dj & vkt “kjhj FkksM+k nnZ dj jgk gAS fy;kA cMh+ cgw us Hkh vEEkk dks fnuHkj ij”s kku & D;k dkbs Z vk;k Fkk viuk bykt djokus ugha fd;k vkSj u gh cPpkas dks ml rjQ+ tkus vkids ikl \\ fn;kA “kke dks djhc ik¡p cts fnuHkj dh Hk[w kh & ughAa dkbs Z ugha vk;kA ;g rks ;w¡ gh--- cM+h vEEkk dejs ls ckgj fudyhA & EkaS ikl dh & e>q ls >wB er ckfs y,A vki nlw jkas ds nnkZsa dks cLrh esa tk jgh g¡wA eq>s FkkMs h+ njs gks tk, rks vius cnu ij yrs h gksA fdrus lky gks x, fpra k er djuk vkjS “kdhy iwNs rks ckys nus k fd ikdZ esa Vgyus xbZ gAS & cM+h cgw us gkeh eas vkidh gkyr fnu-c-fnu fcxM+rh pyh xbZA flj fgyk;kA vkjS vki gaS fd le>us dks gh rS;kj ughaA ?kj ls cLrh dNq chl feuV dh nwjh ij Fkh & rw cos tg ij”s kku gks jgk gSA ,ls k dqN ugha exj cM+h vEEkk dh pky csgn /kheh Fkh ftl ls gAS & eaS dkbs Z ijost+ ugha ftls vki viuh ckrksa ls dgha vkus-tkus eas mUgas nkxs quk oDr yx tkrk cgyk yxs hAa dHkh vkbus ds lkeus [kMh+ gksdj FkkA cLrh ds ckgj ig¡qpdj cM+h vEek ikl eas viuk gky nfs [k,A D;k ls D;k gks xbZ gSa vkiA iM+s cM+s iRFkj ij cBS dj gk¡Qus yxhA fnuHkj vkt ds ckn vki fdlh dk bykt ugha djxs hAa dqN u [kkus dh otg ls “kjhj esa bruh rkdr “kdhy dh ckras luq dj cMh+ vEek dk xyk Hkj ugha cPkh Fkh fd bruh nwj py lds yfs du ,ls k vk;kA& “kdhy] nlw jksa ds n[q kksa dk bykt djus fd, fcuk og viuk dke ijw k Hkh ugha dj ds fy, gh rks vYYkkg us eq>s nlw jk tUe fn;k ldrh FkhA FkksMh+ njs eas jos rh ig¡qp xbZ vkSj g-S --&:¡/ks xys ls vEek us “kdhy dk gkFk idM+ cM+h vEek dks ysdj vius ?kj dh vkjs py nhA dj dgkA vEek dk gkFk >Vdrs gq, “kdhy ?kj igq ¡pdj cM+h vEek piq pki ,ls s cSB xbZ tlS s dkbs Z egs eku igyh ckj fdlh ds ?kj cSBrk cksyk& eaS ugha ekurk vYykg-oYYkkg dkAs cl vkils esjh ,d xqtk+ fj”k gS fd vc vki vkjS gSA lkeus dh nhokj ij dqN fgUnw nsoh-nos rkvkas viuh nsg dks ,ls s nq[k ugha ig¡qpk,xhaA dh rLokjas yxha FkhAa vEek mUgas /;ku ls fugkjus & Bhd gS vc rw vius dke ij tk eSa pk; ih yxhA rc rd jsorh feV~Vh ds dqYgM+ esa vEEkk y¡wxhA ds fy, ikuh ys vkbAZ vEEkk us ikuh ihus ls bUdkj dj fn;k vkjS yMd+ h ds ikl ys tkus dk “kdhy ckgj pyk x;kA cM+h vEek us b”kkjk fd;kA tc cMh+ vEek yM+dh ds ikl xbZ mBdj pk; ih vkSj I;kyh dks jlkbs ?Z kj esa j[kdj viuh cM+h cgw dks ugkus ds fy, ikuh Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 rks vpkud ls yMd+ h tk+ js -tk+ sj ls jksus yxhA vk;kA vkSj MkWDVj ds dgs erq kfcd cMh+ cgw fcuk dNq dgs cMh+ vEek ckgj vk xbAZ jos rh vEEkk nokbZ ejge djrh jghA lqcg ls gh us cMh+ vEEkk ls iwNk& vEek] n[s kk vkiuAs u vEEkk us vk¡[ksa ugha [kksyh Fkha vkjS nok Hkh tkus D;k gks x;k esjh cPph dksA viuk vlj ugha fn[kk jgh FkhA jkr esa vEEkk & dqN ughaA ?kcjkus tlS h dksbZ ckr ughAa ijlkas dh gkyr n[s kdj “kdhy dh vk¡[ksa Hkj vkbAZ rd Bhd gks tk,xhA bl ifq M+;k dks esjs tkus ds cM+h cgw ls jgk ugha x;k vkSj mlus vius Bhd ckn mlds dejs esa fc[ksj nus kA & bruk “kkgs j dks crk fn;k fd vEek ikdZ esa ugha ikl dgdj og ckgj dh vksj py nhA ml vkSjr us dh cLrh esa xbZ FkhAa olS k gh fd;k tlS k fd cMh+ vEek us dgk FkkA & vkSj blhfy, vEek dh ;g gkyr gks xbAZ req us mUgas tkus D;kas fn;k \\ rqEgsa irk gS u fd ?kj rd vkrs-vkrs cM+h vEek dk ,d ijS bl lc dk vEEkk ij fdruk cjq k vlj gkrs k y¡xMk+ us yxkA y¡xM+krs gq, vEek dks n[s kdj gAS “kdhy us Hkkxdj vEek dk gkFk idM+rs gq, “kdhy dk pgs jk rerek jgk FkkA cMh+ cgw fcuk iwNk& D;k gvq k vEeh \\ dqN dgs ogk¡ ls pyh xbAZ vxyh lcq g cMh+ & dqN ughaA eksp vk xbAZ jkLrs esa iSj eMq + vEEkk us vk¡[ksa ugha [kkys hAa cPpksa us mUgsa fQj ls dgkuh lqukus ds fy, dgk exj mudh vkokt+ x;kA ,d-nks fnu esa Bhd gks tk,xkA vEEkk ds dkuksa rd ugha ig¡qphaA mUgas D;k irk vEek dejs eas tkdj pkjikbZ ij ysV xbAZ Fkk fd bl ckj lpepq ?kksM+ksa ij lokj pkj “kdhy xeZ ikuh esa ued Mkydj vEEkk ds ijS Qfj”rs mls lpepq vius lkFk fcBkdj ys x, dh flda kbZ djus ds fy, ys vk;kA vEek dh nsg gaSA ls vkuos kyh cncw lHkh ds uFkuw s flda ksM+ nrs h FkhaA ;gk¡ rd fd muls bykt djokus ds fy, euh’kk vkuos kyh vkSjrksa ds HkhA exj “kdhy dks dHkh viuh vEEkh ds ftLe ls cncw ;k f?kUUk ugha edku u- 52 vkbZA tc “kdhy dejs eas ig¡pq k vEEkk lks pqdh xk¡o HkyLok FkhA exj “kdhy ds ijS ksa dh vkgV us mudh uhan rksM+ nhA& vEeh ykvk]s viuk ik¡o vkxs fnYYkh 110033 djks eSa flda kbZ dj nsrk g¡wA ek0s 9711500365 & ugha e>q s fladkbZ ugh djokuhA rw tk vkjS eq>s lksus nsA [email protected] “kdhy us vEEkk dh ckr dks vuluq k dj fn;k vkjS vEEkk dks fcBk flda kbZ djus yxkA & vEeh [email protected] ijS esa dkbZ ltw u ;k [kjkpsa rd ugha gAS & van:uh pkVas gkxs hA tk vc rw tkA fladkbZ ls dqN nsj rd rks vEEkk dks jkgr feyh exj jkrHkj nnZ vkSj rirs “kjhj us mUgas lksus ugha fn;kA vxys fnu “kdhy MkWDVj dks ys Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 कह िब तकि तिए बाद में भी बात कर सकते ह।ंै ' ये कह कर मंै स्नानघर पवित्रा अग्रिाल में घसु गया था। इस तरह मीता से तो पीछा छू ट गया वकद तु माूँ से जड़ु ी स्मवृ तयों की झील में हलचल मच मैं कोई विल्मी धनु गनु गनु ाता हुआ ऑविस जाने गई थी। माूँ बहतु शातद स्िभाि की थीं। मनंै े उन्हंे को तैयार हो रहा था तभी मरे ी पत्नी मीता कमरे में कभी वकसी से लड़ते-झगड़ते, ताने दते े नहीं देखा आई और मझु से बोली, \"सनु ो मझु े तो वपछले िर्ष याद ही नहीं रहा लेवकन इस िर्ष मंै मम्मी जी का और न मनैं े उन्हंे कभी वकसी की बरु ाई करते सनु ा श्राद्ध अिश्य करूँ गी।' था। पापा से भी कभी उन्हंे झगड़ते नहीं देखा। कभी \"अभी तो श्राद्धों के वदन बहतु दरू ह.ैं ....तमु ्हंे अचानक मम्मी जी की याद कै से आ गई ?' पापा कु छ कह भी देते थे तो एकाएक उदास होकर \"अगले महीने माचष में मम्मी की पणु ्यवतवथ है न । उनके सामने से हट जाती थीं। बात बढ़ने की नौबत यह ध्यान आते ही मरे े मन मंे उनका श्राद्ध करने की इच्छा पदै ा हुई।...असल में वपछले िर्ष वकटी पाटी ही नहीं आने देती थीं। में सबने मझु े टोका था वक तमु अपनी सास का पहला श्राद्ध करना कै से भलू गई ?...यह भी कोई दादी बनने की आस वलए अचानक िह दवु नया से भलू ने की बात है ? मझु े बहतु शवमदिं ा होना पड़ा था, चली गई। होली जलने की रात को अचानक पड़ोसी लेवकन इस िर्ष मंै खबू जोर-शोर से उनका श्राद्ध करँू गी। श्राद्ध मंे सब पकिान मम्मी जी की पसदद के शमाष जी ने हमंे जगाया था। उनकी पत्नी के प्रथम बनिाऊूँ गी।....उन्हें गलु ाब जामनु और काजू की बिी बहतु पसदद थीं, िही बनिाऊूँ गी । वकसी िदृ ्ध सतद ान होने िाली थी। िह प्रसि पीड़ा से बहे ाल थी ब्राााहृणी को मम्मी जी के नाम से पाचूँ कपड़े, और घर में कोई अन्य मवहला नहीं थी। उनकी माद दो साड़ी, ब्लाउज, पटे ीकोट, ओढ़ने-वबछाने की चादर वदन बाद गािद से आने िाली थीं। उनके आग्रह से भी दान करने होंग।े ....कु छ बतषन भी दने े होंगे।' पिू ष ही माद उनके साथ अस्पताल जाने को तैयार हो मीता अपनी धनु मंे बोले जा रही थी । मैं मन-ही-मन गई थीं। बड़बड़ाया वक जीवित रहते तो कभी माूँ की पसदद - मंै सबु ह जल्दी तैयार होकर चाय-नाश्ते के साथ नापसदद का ध्यान नहीं रखा, कभी उनकी वमठाई अस्पताल पहचुूँ गया था तावक यवद मम्मी घर आना खाने की इच्छा होती थी तो अपने कमरे मंे आकर चाहें तो रदग वखलना शरु होने से पहले ही उन्हंे घर बड़बड़ाती थी वक िे बढ़ु ापे में ज्यादा चटोरी हो गई ला सकूँ । शमाष जी के बटे ा हुआ था। उन्होंने कहा था, ह,ैं रोटी तो उन्हें अच्छी ही नहीं लगती और अब \"माँू रात भर नहीं सोई ह।ंै उन्हंे घर ले जाओ, नहा- उनके मरने के बाद अपनी सहवे लयों को वदखाने के वलए उनका श्राद्ध कराना चाहती ह।ै धोकर, आराम करने के बाद उन्हंे शाम यहाँू छोड़ \"हलै ो, पवत दिे आप कहाूँ खोए हुए हंै ? इतनी दरे से मंै से कु छ कह रही ह।ँू ...लगता है आपने कु छ सनु ा जाना। तब तक होली का हड़ु ददग भी समाप्त हो ही नहीं।' चकु े गा।' \"देिी जी, तमु ने जो कु छ कहा मनंै े सब सनु वलया ह।ै मंै माँू को स्कू टर पर बठै ा कर लौट रहा था तभी मझु े ऑविस के वलए तयै ार होना ह।ै अभी तो न मनंै े कहीं से एक रदग भरा गबु ्बारा मरे े महूँु पर आकर शिे बनाई है और न नहाया ह।ँू ...इस विर्य में हम लगा। स्कू टर का सतद लु न वबगड़ गया। मैं ि माँू दोनों ही नीचे वगर गए थ।े मझु े तो खास चोट नहीं आई वकद तु माँू बहे ोश हो गई थीं। होली के दो वदन बाद बेहोशी की अिस्था में ही िह हमंे छोड़ कर इस दवु नया से चली गई थीं।...िह पास-पड़ोस मंे वकसी के भी गभिष ती होने की बात सनु ती थीं तो इतनी खशु हो जाती थीं, जैसे िह स्ियद दादी बनने िाली ह।ैं उन्हंे मालमू था वक मीता मंे कु छ कमी है इस िजह Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 से िह माूँ नहीं बन पा रही...विर भी िह मीता को भी कोई िायदा नहीं हुआ। एक बेटी भी हो जाती तो उदास दखे कर यही कहती थीं, \"अरे तू परेशान क्यों कोई अिसोस नहीं होता।...तमु मरे ी पत्नी हो तो िह होती ह।ै इलाज तो चल ही रहा ह।ै ...इसमंे कद जसू ी भी मरे ी माूँ ह।ैं तमु क्या चाहती हो ?...मैं माँू-बाप के नहीं करना।...वकस्मत में होगा तो िल जरर प्रवत अपनी वजम्मदे ाररयों से महँूु मोड़ लूँ ?...तमु वमलेगा।...िरना अनाथालय से एक बच्चा गोद ले भाग्यशाली हो जो तमु ्हंे इतनी अच्छी सास वमली ह।ैं लने ा।' िरना वनस्सदतान बहुओद को ससरु ाल मंे वकतने ताने मीता कहती- \"मम्मी हम दोनों की जन्मपत्री में सनु ने पड़ते ह,ैं क्या तमु नहीं जानती ?...वकद तु यहाँू सतद ान का योग ह,ै आप दादी जरर बनगंे ी, ऐसा मरे ा वकसी ने तमु ्हारा वदल नहीं दखु ाया। मरे े दोस्त की माँू विश्वास ह।ै ' ये बातंे याद करके माूँ के प्रवत श्रद्धा से तो उसके पीछे पड़ी हंै वक दसू री शादी कर ले।' वसर झकु जाता ह।ै अन्य सासों से िह वकतनी अलग थीं। \"मम्मी जी ने भले ही कभी ताना न वदया हो वकद तु उस कमी को तमु परू ा कर दते े हो।...अभी तमु ने जो \"बाथरम मंे सो गए क्या ? इतनी दरे में तमु ्हारा कु छ कहा क्या िह ताना नहीं है ?...छोड़ दो मझु ।े नहाना नहीं हुआ ?...अब ऑविस मंे दरे नहीं हो रही तमु भी दसू री शादी कर लो।' कहकर उसकी आखूँ ें ?' सािन- भादो की तरह बरसने लगी थीं। मीता की आिाज़ से मरे ा ध्यान भदग हुआ। जल्दी से तैयार होकर नाश्ता वकया और स्कू टर लके र घर से मझु े भी अपनी गलती का अहसास हुआ था। यवद वनकल पड़ा। मीता माँू नहीं बन पाई तो इसमंे उसका दोर् कहाँू है ? माँू स्मवृ त पर कु छ इस तरह छा गई थीं वक चाह कर भी उनकी स्मवृ त को झटक नहीं पा रहा था। एक बार मनैं े उसे समझाते हएु कहा था - \"मीता मरे ा मतलब माँू की छाती मंे बादयी तरि बहुत तेज ददष उठा था। मंै तमु ्हारा वदल दखु ाना नहीं था।...दसू री शादी का तो तो इतना घबरा गया था वक उन्हंे लेकर सीधे अपोलो सिाल ही नहीं उठता। अभी हम विर इलाज प्रारदभ अस्पताल पहचुँू गया। िह मरे े घर के वनकट था। कराएूँग।े विर भी सिलता नहीं वमली तो एक बच्चा डॉक्टर ने हाटष के वलए ई.सी.जी, टूडी ईको, एक्सरे और कई तरह के ब्लड टेस्ट आवद कराने को गोद ले लेंग।े बस तमु मझु े माूँ के वखलाि भड़काया कहा।चार-पाचूँ हजार का वबल बन गया था, लवे कन मत करो।' यह जानकर सतद ोर् हआु था वक उन्हंे कोई गदभीर बीमारी नहीं ह।ै \"मनैं े तो एक साधारण-सी बात कही थी वक अपनी वबल दखे कर मीता ने कहा था, \"आप भी जरा वडस्पंसे री में वदखाने से ये सारे टैस्ट मफु ्त हो जात।े से ददष से घबरा कर सीधे अपोलो पहचुूँ गए। डाक्टसष आजकल तो तमु मरे ी हर बात का उल्टा अथष की जबे से क्या जाता है ? व्यथष ही इतने सारे टेस्ट वनकालने लगे हो।' करा वलए। अपने ऑविस की वडस्पसंे री भी तो ले जा सकते थ।े िहाूँ भी योग्य डाक्टसष की कमी नहीं अब माूँ नहीं हैं तो वपता जी के वलए कु छ-न- ह।ै ' कु छ कहती रहती ह।ै पहले वपताजी ड्राइगद रम मंे िसै े मीता ने कु छ गलत नहीं कहा था वकद तु मैं भड़क टी.िी. देखते थे तो उसे वशकायत थी वक िह अपनी गया था- \"मीता, माूँ पर चार -पाचँू हजार रुपये खचष हो गए तो तमु ्हें बरु ा लग रहा ह।ै तमु ्हारे इलाज में भी पसदद के प्रोग्राम नहीं दखे पाती। विर मनैं े वपताजी को मंै पचास - साठ हजार रुपये खचष कर चकु ा हँू विर एक पोटेबल टी.िी. उनके कमरे के वलए अलग ला वदया तब भी चैन नहीं ह।ै कहती हंै तीन लोगों में दो टी.िी. की क्या जररत है ? लाइट का वबल ज्यादा आता ह।ै आवखर उसे कहीं तो समझौता करना पड़ेगा। पहले जब वपताजी कहीं नहीं जाते थे तो कहती थी- \"िो परू े वदन घर मंे ही पड़े रहते ह।ंै \" जैस-े तसै े Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 उन्हें समझा कर सबु ह सैर पर जाने की आदत डाली रह कर बहुत से काम वदखािे के वलए भी करने पड़ते है तो अब कहती हैं वक रोज सबु ह इतनी दरे के वलए ह।ंै मरे े क्लब की सभी मवहलाएूँ अपने बजु गु ों का सरै पर चले जाते ह,ंै क्या सबु ह अपने सामने कढ़िा श्राद्ध बहुत जोर-शोर से करती ह।ै तमु कु छ भी कहो कर भंसै का दधू नहीं ला सकते ? रोज पकै े ट के दधू मैं तो उनका श्राद्ध करूँ गी िरना सब मरे े बारे मंे क्या की बसे ्िाद चाय पीनी पड़ती ह।ै ' सोचेंगी।' मझु े भी गसु ्सा आ गया था, \"तमु अके ली नहीं हो, हजारों लोग पकै े ट का दधू पी रहे ह।ंै भैंस के दधू का मैं कटु हो आया था --\"तो देिी जी माँू का श्राद्ध ज्यादा ही शौक है तो जाकर स्ियद ले आया करो, श्रद्धािश नहीं, अपनी सहवे लयों को वदखाने के वलए पड़ोस मंे ही तो वमलता ह।ै ' तभी सैर से वपताजी आ गए थ।े करना चाहती ह।ंै जीवित रहते तो िे तमु ्हारे तनाि का कारण ही बनी रहीं। कभी तमु से सम्मान और श्रद्धा \"क्यों सबु ह-सबु ह मीता पर बरस रहा है ? हम नहीं पा सकी और अब..... दो आदवमयों के घर में रहते दधू लने े िह जाएगी ?.. .मीता दधू के वलए वडब्बा वनकाल कर रख दो। कल \"अब बस करो । परु ानी बातों को ररपीट करने से सरै से लौटते समय मंै ले आया करूँ गा। िसै े भी की जररत नहीं ह।ै मम्मी जी का श्राद्ध करने की एक कोई छोटा-मोटा काम हो तो तमु मझु से कह वदया करो। चाह तमु ्हें क्या बता दी, तमु ्हंे तो मझु े बातें सनु ाने का खाली ही तो बठै ा रहता ह,ूँ मरे ा भी टाईमपास हो मौका वमल गया। िाकई मैं बहुत बरु ी ह,ँू तमु ्हारी माँू जाएगा।' तब से दधू वपताजी लाते ह।ैं यही सब को एक पल चनै से नहीं जीने वदया। अब तमु ्हारे सोचते-सोचते ऑविस पहचुँू गया। चौकीदार के वपताजी को भी तदग करती ह।ँू न तमु ्हंे वपता बना सलाम से मरे ा ध्यान भगद हो गया। पाई,न उन्हे दादा -दादी ... ...तमु ्हारे तानों से तगद आ ऑविस में काम की अवधकता से कु छ सोचने का गई ह।ँू माँू बनने को मैं भी वकतना तडपती हँू यह तमु ्हें समय नहीं वमला। घर लौट कर चाय पी। टी.िी. देखा नहीं मालमू । अपना दखु वकससे कहद ? यहाँू मरे ा है और खाना खाकर अपने वबस्तर पर चला गया। ही कौन...?' उसका चहे रा आसँू ओु द से भीग गया था। अपना काम समाप्त करके आते ही पत्नी ने विर िही मैं स्तदवभत रह गया। मैं उसे इस तरह रुलाना नहीं प्रसगद छेड़ वदया। चाहता था। सच कहँू तो मीता बरु ी है भी नहीं। मम्मी \"हाँू तो तमु ने क्या सोचा ?' ि वपताजी दोनों ही उससे खशु रहे हैं । मझु े ही जाने \"वकस विर्य म?ंे ' क्या हो गया है वक उसके दोर् ढूँढ़ता रहता ह।ँू िह \"अरे िही, माँू के श्राद्ध के विर्य में ।' सही कहती हैं वक \"ये हमारे असतद ोर् ह,ैं जो खीज के कहना तो बहतु कु छ चाहता था वकद तु व्यथष की रप में प्रगट होते ह।ैं '. कलह ि तनाि से बचने के वलए बस इतना ही कहा, \"िालतू आडदबरों के वलए मरे े पास पसै ा नहीं ह।ै ' ..लेवकन ऐसे तो जीना मवु श्कल हो जाएगा। हमारी \"अरे मंै तमु ्हारी माँू का श्राद्ध करने के वलए कह रही वजददगी मंे एक ही अभाि ह,ै सतद ान का। िही चाह ह,ँू अपनी माँू का नहीं।...' शायद असदतोर् का कारण बन रही ह।ै मनंै े मन-ही- \"हाूँ मैं अपनी माूँ के श्राद्ध के वलए ही मना कर रहा मन वनश्चय कर वलया वक अब इलाज में और समय ह।ँू ...इन वदखािों मंे मरे ी तवनक भी आस्था नहीं ह।ै ' िह बच्चों की तरह ठुनकी थी - \"क्या हो तमु बरबाद नहीं करंेगे। कल ही अनाथाश्रम जाएगँू े और भी।...तमु ्हंे तो वकसी में भी आस्था नहीं ह।ै समाज में लड़का या लड़की जो आसानी से ि जल्दी वमल जाएगा, उसे अपने बच्चे के रप मंे अपना लेंग।े मंै मीता को मनाने के मडू में आ गया था। कान पकड़ने की एÏक्टग करते हएु बोला, \"दिे ी जी मझु े माि कर दो । देखो मनंै े कान भी पकड़ वलए ह,ंै तमु कहो तो उठक-बैठक भी लगाने को तयै ार ह।ँू ' Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 एक नजर मझु पर डाल कर िह रोत-े रोते हसद पड़ी। \"अब मझु े माि कर वदया हो तो एक बात कहूँ ? देखो हमारे घर में श्राद्ध की परदपरा नहीं रही ह,ै तमु यह सब वकस वलए करना चाहती हो ? लोगों को वदखाने के वलए नई परदपरा मत डालो। तमु ्हें कु छ करना ही है तो बस एक काम करो वपताजी माूँ के वबना बहतु अके ले और उदास रहने लगे ह,ंै हम उन्हंे इतनी श्रद्धा ि सम्मान दंे वक िह अपनी बची हईु वजददगी हसँू ी-खशु ी से गजु ार सकंे ।यवद सचमचु कोई दसू रा लोक है तो िहाूँ से वपताजी को खशु दखे कर माँू भी बहुत खशु होंगी और यही माँू का असली श्राद्ध होगा।' मीता की आखँू ों से बाढ़ का पानी बह चकु ा था। उसे सहजता की ओर लौटते देख मझु े अच्छा लगा। मनंै े कहा, \"मीता यवद अब मझु से नाराज नहीं हो तो अपने हाथ की एक कप कािी वपला दो।' \"कािी तो वपताजी को भी बहुत पसदद ह,ै तमु चल कर उनके कमरे मंे बठै कर टी.िी. देखो, मंै कािी लके र िहीं आती ह।ूँ ' --------- अग्रिाल पवित्रा इसवमयाद बाजार 4- 7-126 द - 500027 हदै राबा मोबाइल - 09393385447 ईमले - [email protected] Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 mEehnksa ds iFk ij deyk th jk/ks”;ke th dh ckr ij piq gks cSB x;haA mUgsa Hkh vius chrs fnukas dh ckras ;kn gks vk;h FkhA jf”e ikBd vDlj ,ls k gh gksrk gS fd dejs esa nkus kas piq pki ?k.Vkas cSBs iqjkuh ;knkas esa [kks;s jgrs gSaA Ckkcw dks vkt Ldyw ls vkus eas nsj gks jgh gS ftl dkj.k jk/k”s ;ke th dk /;ku ckj&ckj vius dejs dh f[kMd+ h ls ^^thou ds bl vafre iM+ko eas fdlh lgkjs dh xyh dh vksj tk jgk gSA ^^vkrk gh gksxk] Ldwy eas t:jr gksrh gS rkfd vkneh ftUnk jg ldsA “kk;n iM+ksl ds okf’kdZ kRs lo dh r;S kfj;ka py jgh gSa u rks mlus Hkh xkus esa flUgk lkgc ds thus dk lgkjk muds cxhps ds ikS/ks gh gSa Hkkx fy;k gS]** jk/ks”;ke th dh ifRu deyk th us dgkA ftls os jkst lhpa rs gSaA** ;g lksprs gq, jk/ks”;ke th tkus dgka [kks x;s FksA ckcw dh vkokt ls os vpkud gh tlS s uhan ^^vkgs ! eSa ukgd gh ij”s kku gks jgk Fkk]** ls tkxs gkAas vius lkeus [kMs+ ckcw dks n[s k os iyHkj ds fy, jk/k”s ;ke th bruk dg piq gks x;s vkSj jlksbZ dh rjQ “kke eqLdjk mBAs viuh ykBh mBk dj mUgkaus s ckcw dk lgkjk fy;k dh pk; ds bra tkj eas ns[kus yxAs FkkMs +h gh njs esa cgw nks di vkjS cjkens dh vksj py iMAs+ deyk th dk ;g le; l/a ;k pk; fy, dejs esa nkf[ky gqbZ vkjS cksyh] ^^dqN pkfg, ckctw h iwtk dk gkrs k gS vr% os viuh r;S kjh esa yx x;haA “kke ds \\ eaS tjk cktkj gks vkrh g]aw ckcw vc vkrk gh gksxk A** le; xhrk ds “ykds ksa dks i<u+ s dk ;g fu;e mUgksua s dc izkjaHk fd;k Fkk] ;g mUgas Hkh ;kn ughaA ^^ugh]a req tkvksA** bruk dg jk/k”s ;keth us pk; dh I;kyh mBk yh vkSj iqu% f[kM+dh dh rjQ eMq + x;As cjkens esa cSB jk/k”s ;ke th us flUgk lkgc ds cxhps dh vkjs n[s kkA vkt flUgk lkgc dks ik/S kksa esa ges”kk dh jk/k”s ;ke th dh mez vLlh ds djhc gkxs hA >fq j;Z ksa rjg ikuh u nsrk n[s k mUgkuas s ckcw ls iwNk] ^^vkt flUgk ls Hkjk “kjhj yca h dn&dkBh oky]s xfB;k ds nnZ ls ij”s kku lkgc fn[kkbZ ugha ns jgs] D;k dksbZ ckr gS \\** jk/k”s ;ke th dk le; T;knkrj dejs esa gh xtq +jrk gSA ?kj ds lnL; mudk eu yxkus dh viuh dksf”k”k eas jgrs gS]a ^^nn~nw ] eaSus lcq g Ldwy tkr le; muds ?kj yfs du mudk eu tkus dgka [kks;k jgrk gSA Vfs yfotu Hkh os MkDW Vj vady dks tkrs n[s kk FkkA “kk;n rfc;r [kjkc gksxh]** ;nk&dnk gh ns[krs gSaA “kke dk ;gh ,d oDr gksrk gS tc os ckcw us jk/ks”;ke th dks dgkA dejs ls ckgj fudy dj ?kj ds cjkens esa cSB dj ckgj dk voykds u djrs gSAa cjkens esa cSBuk jk/ks”;ke th ds jkts dk jk/ks”;ke th ckcw dh ckr luq fpfUrr gks x;]s fu;e gS tc os viuh ykBh vkSj ckcw ds lgkjs cjkens esa mueas flUgk lkgc dks ns[kus dh bPZ Nk tkx`r gks mBhA iSjkas ls yxh dqlhZ ij vk cSBrs gSaA bl le; ?kj ds Bhd lkeus ykpkj jk/ks”;ke th dks vkt “kgj ds bl edku eas jgrs gq, flUgk lkgc vius ?kj dh NkVs h&lh cfx;k eas ikS/kksa dks ikuh ns igyh ckj viuh ykpkjh ij vQlksl gqvk FkkA xkoa eas tc jgs gkrs s gSaA flUgk lkgc QkSt esa Fks vkjS vodk”k izkfIr ds muds csVs vkjS cgw vius lkFk “kgj ys tkus ds fy, vk;s Fks ckn ls ?kj esa gh vius ,d los d ds lgkjs jg jgs gAaS o’kksZ rc ykxs kas us dgk Fkk fd os HkkX;”kkyh ekrk&firk gSa ftudh igys viuh ifRu dh e`R;q ds i”pkr~ os dgha ugha x;As muds ijokg muds cPps djrs gSaA ml le; “kk;n gh jk/k”s ;ke th cVs s dh fons”k eas ukdS jh gS tgka ls og flUgk lkgc dk gky us bl ckr dks xHa khjrk ls fy;k gksxk] ijarq ;gka vkus ds ckn ekyew djrk jgrk gSA mUgas vius cVs s vkSj cgw dks feys lLa dkjkas vkjS ckcw ds isze us bruk cka/k fn;k fd os vc bl ckr ij lkspus yxs gSaA ckcw dks xyh esa vkrk ns[k jk/k”s ;ke th [kq”k gkrs s gq, ikl j[kh viuh ykBh dks bl mEehn ls ysdj cBS x;s xyh eas fjD”ks ij cgw dks vkrk ns[k jk/ks”;ke th fd vc os cjkens eas tk ik;sxa As mudh bl gjdr dks ns[k us ckcw dks iqdkjkA ckcw tks vc rd viuh nknh ls xhrk eas ikl cSBha deyk th cksy iM+h] ^^cspkjk Fkdk gqvk vk jgk gS fy[ks “ykds dk eryc le> jgk Fkk] Hkkxrk gvq k vk;k] vkSj vkidks flQZ viuh l>w jgh gS \\ vkidks nlw jksa dh Hkh ^^D;k gS nn~nw \\** ijokg djuh pkfg,A** ^^ns[kks] rqEgkjh eka vk jgh gSA tkvks mudk >ksyk deyk th dh ckr ij jk/ks”;ke th ukjktx+ h Hkjs vna j j[k nsuk] cspkjh vdsyh ?kj dk lkjk dke fucVkrs gq, ygts eas cksys] ^^D;k eaS nwljkas dh ijokg ugha djrk \\ iwjh fdruk Fkd tkrh gSA** jk/k”s ;ke th cksyAs ftUnxh nlw jksa dh [kkfrj gh thrk jgk gwaA** ^^vkvks ckck] FkksM+k ikuh ih yks] lLq rk yks]** bruk dgrh gqbZ cgw vanj pyh x;h vkSj vna j ls ikuh ds lkFk IyVs eas dqN fcLdqV yk dj mlus ml cw<s+ fjD”kos kys dks fn;kA Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्तक” ISSN 2454-2725 ^^thrh jgks fcfV;k]** fjD”ksokys us cM+s vkReh; Hkko ls ikuh dk Xykl yrs s gq, dgk vkjS jk/k”s ;ke th dh dlq hZ ds ikl uhps tk cBS kA jk/ks”;ke th vkSj fjD”ksokyk cw<+k vkil esa ckrsa djus yx x;s ftUgsa n[s k cgw eqLdjkrh gqbZ vkiuh lkl deyk th ls ckys h] ^^vkt fQj ls fjD”ksokys cw<s+ ckck fey x;s Fks rks muds gh fjD”ks ij cBS x;hA vPNk gh gS ckctw h dks Hkh dqN njs ds fy, dkbs Z ckr djus okyk fey x;kA cgw dh ckr luq deyk th Hkh eqLdjk iM+h vkjS mlls iwNk] ^^luq k gS lkeus okys flUgk lkgc dh rfc;r T;knk [k+jkc gSA** ^^gka] muds csVs dks bldh lpw uk nh x;h gSA bl voLFkk esa mudk vdys s jguk Hkh rks Bhd ugha uA** bruk dg cgw vius dke esa O;Lr gks pyhA dqN gh nsj esa jk/ks”;ke th dk cVs k vius dke ls ?kj ykVS k gAS cgw dNq iyksa ds fy, :dh vkSj cjkens esa jk/ks”;ke th dh vkjs n[s kk tks ml cw<+s fjD”kos kys ls ckr dj jgs FksA vkjS og c<w +k vius dke vkSj vius ?kj dks pykus dh fQdz eas fnuHkj ?kew rk dqN nsj tlS s bu lkjs n[q kksa ls njw cBS k FkkA cgw us vius ifr dks flUgk lkgc dh rfc;r dh ckr crkbAZ dNq iykas ds fy, cVs s us :d dj viuh ifRu dh vksj ns[kk vkSj mlus jk/k”s ;ke th ls dgk] ^^vkrs gSa ckcwth] “kk;n flUgk lkgc dks gekjh dqN t:jr gkAs ** nkus kas dks tkrk ns[k jk/ks”;ke th lkspus yxs fd dk”k ! gj fdlh dh o`)koLFkk bUgha Lugs vkSj lEeku dh gkrs h vkf[kj iwjs thou l?a k’kZ djrs vkSj t:jrkas dks iwjk djrs jgus ds ckn vkneh dks bl voLFkk esa vkSj pkfg, Hkh D;kA jf”e ikBd jkaph] >kj[k.M Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बुजुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 “क्कोंतक ह इशर् ि घ नहें होिें” गया जहााँ दस बा ह ठबस्त जमीन प ठबछे हएु थ.े ठजसमंे से एक ठबस्त श्रीवास्तव जी को भी महु यै ा -तािर्नें कोहलें क ाया गया. मनै जे के चले जाने के बाद चौबे जी, ामस ण औ चक ी वहाँा पधा े. ‘सनु ा ह,ै कोई नया पर िंदा आया ह.ै चलो, चल क देखते ह.ंै ’ ‘क्या नाम है तमु ्हा ा. ?’ चौबे जी हसी ठििोला क ते हएु अपनी बैसाखी के चौबे जी ने एक कडक आवाज मंे पछू ा. सहा े धी े-धी े द वाजे की ओ चल ठदए. साथ में ामस ण औ चक ी भी थी. ‘ओम श्रीवास्तव.’ ‘देठखए, यह मे ी ठवन्नठत है आपस.े कृ पया इन्हंे यहाँा धीमी सी आवाज में दो शब्द आए. ख लीठजए. ोज- ोज की ठकच-ठकच से तो छु टका ा ठमलगे ा. ये बढू े हो चकु े हंै औ इनके का ण हमा ा ‘देखो, यहाँा मे ा ाज चलता ह.ै तमु ्हंे जैसे बोला जाए स ददद बढ जाता ह.ै ’ वसै े ही क ना होगा. औ हाँा ज़्यादा च.ंिू . चपत… की तो घ से बेघ क ठदए जाओगे. समझे.’ एक नौजवान बटे ा अपने ठपता को ‘ओल्ड ऐज होम’ नामक ससंि ्था को डोनेट क ने आता है औ मनै ज को चौबे जी ने अपने हकु ु म का डंिका पीटते हएु कहा. उन्हंे वहााँ से कभी भी बाह ना ठनकालने के ठलए मजे ामस ण औ चक ी बीच-बीच में खी... खी... क हे के नीचे से कु छ ठमिाई दे जाता ह.ै थे.. ‘आओ श्रीवास्तव साठहब. आपको आपके साठथयों ‘घ से बघे …’ श्रीवास्तव जी ने इन शब्दों को से ठमला द.ंे ’ मनै ेज ने श्रीवास्तव जी से कहा. दौह ाते हुए अपने कपडों का बगै ठकना े ठखसकाया. पसैं ि वर्द के श्रीवास्तव साठहब छडी का सहा ा लेते ‘ज़्यादा बोलना माना है यहााँ. समझे.’ हएु धीमी चाल से चलने लगे. कोई बच्चा जब चलना सीखता है तो कै से चलता ह.ै िीक वैसे ही वो भी चक ी भी बोली.. चलना सीख हे थे. मनै जे उन्हें एक बडे से हॉल मंे ले भ ी हुई आखाँ ों के साथ श्रीवास्तव जी ने हािं में ठस ठहलाया. Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
जनकृ ति तिशाम की तष्ट्ि रति र्िद्रेंक शर्तिक ई पतिकर् “बजु ुर्म तिाेषर्कत ” ISSN 2454-2725 सब वहााँ से चले गये औ श्रीवास्तव जी अके ले में चक ी दवाई वाला ठडब्बा लाई औ चौबे जी ने एक दीवा प ठस मा ने लगे. गोली श्रीवास्तव जी को दे दी. प उन्हें लग हा था ठक ये उनके हाथ से बाह का काम ह.ै तो डॉक्ट को औ उध तीनों की गफु ्तगू शरु ू.. बलु ाना ही चाठहए. डॉक्ट को बलु ाया गया. एक सप्ताह के बाद श्रीवास्तव जी उिने की हालत में हुए. ‘ये नया पर ंिदा कु छ ज़्यादा ही सीधा लगता ह.ै क्यँाू इसी दौ ान चौबे जी ने मनै ेज को श्रीवास्तव जी के घ चक ी.’ ामस ण बोले प फोन क ने को कहा. तो मनै जे ने जवाब में कहा ‘नही नही.. माज ा कु छ औ ह…ै . मझु े तो लगता ठक उनके बटे े ने कहलवाया है ठक उसके ठपता घ ह…ै ठक ये सीधे होने का ढोंग क हा ह.ै ..’ चक ी ने वाठपस आने के ठलए कोई नया ढोंग क हे ह.ंै चौबे अपना जाससू ी ठदमाग़ दौडाया. जी कु छ ना कह सके इसके आगे.. श्रीवास्तव जी के ‘नही चक ी. लगता तो नही. चलो चल क देखते ह.ंै ’ पास जाते हएु …. चौबे जी का मन नही माना औ ामस ण औ चक ी को ले क वह श्रीवास्तव जी के पास गय.े ‘अब कै सी तबीयत है श्रीवास्तव.’ चौबजे जी ने पछू ा ‘सनु भाई श्रीवास्तव, हमने तमु ्हें पहले ही कह ठदया है ठक यहाँा हमा ा हकु ु म चलता ह.ै . तू तो..’ चौबे जी ने ‘िीक हाँ भाई’ श्रीवास्तव जी की बाजू पकडी तो अपनी बात पू ी नही क पाए. ‘तमु ने तो ड ा ही ठदया था या . दखे ो हम तमु ्हा े साथ ‘अ े, इसे तो बहतु तजे बखु ा ह.ै चक ी, जा जल्दी मजाक क हे थे. हम यहााँ के कोई दादा-वादा नही ह.ंै दवाई वाला ठडब्बा ले क आ. औ ामस ण तू जल्दी औ हमा ा कोई भी हकु ु म डडंि ा नही चलता यहााँ प . से मनै जे को खब क .’ तमु अपनी मज़ी के माठलक हो. ये तमु ्हा ा अपना घ ह.ै मे ी ठकसी बात का बु ा लगा हो तो माफ़ क दने ा श्रीवास्तव.’ चौबे जी हाथ जोडते हएु श्रीवास्तव जी के आगे खडे हो गय.े उनका हाथ पकडते हएु श्रीवास्तव जी बोले. Vol.1, issue.6, August 2015. िषम 1, रतक 6, रर्स्ि 2015
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