अनूपा—मैं सगाई न करूंि गी। सास—कै सी बात करती ै बेटी? सारी तयै ारी ो गयी। लोग सुनेंगे तो क्या क ेगें? अनूपा—जो चा े क ें, ज्जनके नाम पर १४ वषग बैठी र ी उसी के नाम पर अब भी बठै ी र ूंिगी। मनैं े समझा था मरद के बबना औरत से र ा न जाता ोगा। मेरी तो भगवान ने इजजत आबरू ननबा दी। जब नयी उम्र के हदन कट गये तो अब कौन धचन्ता ै ! वासदु ेव की सगाई कोई लडकी खोजकर कर दो। जसै े अब तक उसे पाला, उसी तर अब उसके बाल-बच्चों को पालंगिू ी। ***
एक आंच की कसर सारे नगर मंे म ाशय यशोदानन्द का बखान ो र ा था। नगर ी में न ी, समस्त प्रान्त मंे उनकी कीनतग की जाती थी, समाचार पत्रों में हटप्पखणयािं ो र ी थी, ममत्रो से प्रशिंसापूणग पत्रों का तािंता लगा ुआ था। समाज-सेवा इसको क ते ै! उन्नत ववचार के लोग कसा ी करते ै। म ाशय जी ने मशक्षक्षत समदु ाय का मुख उजजवल कर हदया। अब कौन य क ने का सा स कर सकता ै कक मारे नते ा के वल बात के िनी ै, काम के िनी न ी ै! म ाशय जी चा ते तो अपने पतु ्र के मलए उन् ें कम से कम बीज तार रूपये द ेज मंे ममलत,े उस पर खुशामद घाते मंे ! मगर लाला सा ब ने मसद्वातंि के सामने िन की रत्ती बराबर परवा न की और अपने पतु ्र का वववा बबना एक पाई द ेज मलए स्वीकार ककया। वा ! वा ! ह म्मत ो तो कसी ो, मसद्वांति प्रेम ो तो कसा ो, आदशग- पालन ो तो कसा ो । वा रे सच्चे वीर, अपनी माता के सच्चे सपतू , तनू े व कर हदखाया जो कभी ककसी ने ककया था। म बडे गवग से तरे े सामने मस्तक नवाते ै। म ाशय यशोदानन्द के दो पतु ्र थे। बडा लडका पढ मलख कर फाज्जल ो चकु ा था। उसी का वववा तय ो र ा था और म देख चकु े ै, बबना कु छ द ेज मलये। आज का नतलक था। शा ज ांिपुर स्वामीदयाल नतलक ले कर आने वाले थे। श र के गणमान्य सजजनों को ननमन्त्रण दे हदये गये थे। वे लोग जमा ो गये थ।े म कफल सजी7 ुई थी। एक प्रवीण मसताररया अपना कौशल हदखाकर लोगो को मगु ्ि कर र ा था। दावत को सामान भी तयै ार था ? ममत्रगण यशोदानन्द को बिाईयांि दे र े थे। एक म ाशय बोले-तुमने तो कमाल कर हदया !
दसू रे-कमाल ! य कह ए कक झण्डे गाड हदये। अब तक ज्जसे देखा मंिच पर व्याख्यान झाडते ी देखा। जब काम करने का अवसर आता था तो लोग दमु लगा लेते थ।े तीसरे-कै से-कै से ब ाने गढे जाते ै-सा ब मंे तो द ेज से सख्त नफरत ै य मेरे मसद्वािंत के ववरुद्व ै, पर क्या करुंि क्या, बच्चे की अम्मीजान न ीिं मानती। कोई अपने बाप पर फें कता ै, कोई और ककसी खराटग पर। चौथे-अजी, ककतने तो कसे बे या ै जो साफ-साफ क देते ै कक मने लडके को मशक्षा - दीक्षा में ज्जतना खचग ककया ै, व में ममलना चाह ए। मानो उन् ोने य रूपये उन् ोन ककसी बकंै मंे जमा ककये थ।े पािंचवें-खूब समझ र ा ूंि, आप लोग मझु पर छीटंि े उडा र े ै। इसमंे लडके वालों का ी सारा दोष ै या लडकी वालों का भी कु छ ै। प ले-लडकी वालों का क्या दोष ै मसवा इसके कक व लडकी का बाप ै। दसू रे-सारा दोष ईश्वर का ज्जसने लडककयांि पैदा कीिं । क्यों? पािंचवे-मंै य न ी क ता। न सारा दोष लडकी वालों का ंै, न सारा दोष लडके वालों का। दोनों की दोषी ै। अगर लडकी वाला कु छ न दे तो उसे य मशकायत करने का कोई अधिकार न ी ै कक डाल क्यों न ी लायें, संिुदर जोडे क्यों न ी लाये, बाजे-गाजे पर िमू िाम के साथ क्यों न ी आये? बताइए ! चौथे- ांि, आपका य प्रश्न गौर करने लायक ै। मेरी समझ में तो कसी दशा में लडकंे के वपता से य मशकायत न ोनी चाह ए। पािंचवंे---तो यों कह ए कक द ेज की प्रथा के साथ ी डाल, ग नें और जोडो की प्रथा भी त्याजय ै। के वल द ेज को ममटाने का प्रयत्न करना व्यथग ै।
यशोदानन्द----य भी Lame excuse1 ै। मनैं े द ेज न ी मलया ै।, लेककन क्या डाल-ग ने ने ले जाऊिं गा। प ले---म ाशय आपकी बात ननराली ै। आप अपनी धगनती म दनु नयांि वालों के साथ क्यों करते ंै ? आपका स्थान तो देवताओंि के साथ ै। दसू रा----20 जार की रकम छोड दी? क्या बात ै। यशोदानन्द---मेरा तो य ननश्चय ै कक में सदैव principles 2 पर ज्स्थर र ना चाह ए। principle2 के सामने money3 की कोई value4 न ी ै। द ेज की कु प्रथा पर मनंै े खुद कोई व्याख्यान न ी हदया, शायद कोई नोट तक न ी मलखा। ांि, conference5 में इस प्रस्ताव को second6 कर चकु ा ूंि। मैं उसे तोडना भी चा ूंि तो आत्मा न तोडने देगी। मंै सत्य क ता ूिं, य रूपये लंिू तो मुझे इतनी मानमसक वदे ना ोगी कक शायद मैं इस आघात स बच ी न सकंिू । पािंचवें---- अब की conference5 आपको सभापनत न बनाये तो उसका घोर अन्याय ै। यशोदानन्द-मनैं े अपनी duty7 कर दीउसका recognition8 ो या न ो, मुझे इसकी परवा न ी। 1 थोथी दलील 2 मसद्धांितों 3 िन 4 मूल्य 5 सभा 6 अनुमोदन 7 कतवग ्य 8 कदर
इतने में खबर ुई कक म ाशय स्वामीदयाल आ पंि ुचे । लोग उनका अमभवादन करने को तैयार ुए, उन् ंे मसनद पर ला बबठाया और नतलक का सिंस्कार आरंिम्भ ो गया। स्वामीदयाल ने एक ढाक के पत्तल पर नाररयल, सपु ारी, चावल पान आहद वस्तुएंि वर के सामने रखीि।ं ब्राहृम्णों ने मतिं ्र पढंे वन ुआ और वर के माथे पर नतलक लगा हदया गया। तरु न्त घर की ज्स्त्रयो ने मंगि लाचरण गाना शुरू ककया। य ांि प कफल में म ाशय यशोदानन्द ने एक चौकी पर खडे ोकर द ेज की कु प्रथा पर व्याख्यान देना शुरू ककया। व्याख्यान प ले से मलखकर तैयार कर मलया गया था। उन् ोनंे द ेज की कनत ामसक व्याख्या की थी। पूवकग ाल में द ेज का नाम भी न थ। म ाशयों ! कोई जानता ी न था कक द ेज या ठ रोनी ककस धचडडया का नाम ै। सत्य माननए, कोई जानता ी न था कक ठ रौनी ै क्या चीज, पशु या पक्षी, आसमान में या जमीन मंे, खाने में या पीने मंे । बादशा ी जमाने मंे इस प्रथा की बनंिु नयाद पडी। मारे युवक सेनाओंि मंे सज्म्ममलत ोने लगे । य वीर लोग थें, सेनाओंि में जाना गवग समझते थे। माताएिं अपने दलु ारों को अपने ाथ से शस्त्रों से सजा कर रणक्षते ्र भेजती थी।ंि इस भ नँॉ त यवु कों की संखि ्या कम ोने लगी और लडकों का मोल-तोल शुरू ुआ। आज य नौवत आ गयी ै कक मेरी इस तचु ्छ -म ातुच्छ सेवा पर पत्रों में हटप्पखणयािं ो र ी ै मानों मनैं े कोई असािारण काम ककया ै। मै क ता ूिं ; अगर आप संिसार में जीववत र ना चा ते ो तो इस प्रथा क तुरन्त अन्त कीज्जए। एक म ाशय ने शिंका की----क्या इसका अतंि ककये बबना म सब मर जायेगें ? यशोदानन्द-अगर कसा ोता ै तो क्या पूछना था, लोगो को दिंड ममल जाता और वास्तव मंे कसा ोना चाह ए। य ईश्वर का अत्याचार ै कक कसे लोभी, िन पर धगरने वाले, बदु ा-ग फरोश, अपनी सिंतान का ववक्रय करने वाले नरािम जीववत ै। और समाज उनका नतरस्कार न ी करता । मगर व सब बदु ग-फरोश ै------ इत्याहद।
व्याख्यान ब ुंितद लम्बा ओर ास्य भरा ुआ था। लोगों ने खूब वा -वा की । अपना वक्तव्य समाप्त करने के बाद उन् ोने अपने छोटे लडके परमानन्द को, ज्जसकी अवस्था ७ वषग की थी, मंिच पर खडा ककया। उसे उन् ोनें एक छोटा-सा व्याख्यान मलखकर दे रखा था। हदखाना चा ते थे कक इस कु ल के छोटे बालक भी ककतने कु शाग्र बदु ्वव ै। सभा समाजों मंे बालकों से व्याख्यान हदलाने की प्रथा ै ी, ककसी को कु तू ल न ुआ।बालक बडा सुन्दर, ोन ार, िंसमखु था। मुस्कराता ुआ मंचि पर आया और एक जबे से कागज ननकाल कर बडे गवग के साथ उच्च स्वर में पढने लगा--- वप्रय बंिि ुवर, नमस्कार ! आपके पत्र से ववहदत ोता ै कक आपको मझु पर ववश्वास न ी ै। मंै ईश्वर को साक्षी करके िन आपकी सेवा में इतनी गुप्त रीनत से प ुंिचेगा कक ककसी को लेशमात्र भी सन्दे न ोगा । ांि के वल एक ज्जज्ञासा करने की िषृ ्टता करता ूिं। इस व्यापार को गुप्त रखने से आपको जो सम्मान और प्रनतष्ठा - लाभ ोगा और मेरे ननकटवती में मेरी जो ननदिं ा की जाएगी, उसके उपलक्ष्य मंे मेरे साथ क्या ररआयत ोगी ? मेरा ववनीत अनरु ोि ै कक २५ मंे से ५ ननकालकर मेरे साथ न्याय ककया जाय...........। म ाशय श्योदानन्द घर मंे मे मानों के मलए भोजन परसने का आदेश करने गये थ।े ननकले तो य बाक्य उनके कानों मंे पडा-२५ मंे से ५ मेरे साथ न्याय ककया कीज्जए ।‘ चे रा फक ो गया, झपट कर लडके के पास गये, कागज उसके ाथ से छीन मलया और बौले--- नालायक, य क्या पढ र ा ै, य तो ककसी मवु ज्क्कल का खत ै जो उसने अपने मुकदमें के बारंे मंे मलखा था। य तू क ािं से उठा लाया, शैतान जा व कागज ला, जो तुझे मलखकर हदया गया था।
एक म ाशय-----पढने दीज्जए, इस त रीर मंे जो लतु ्फ ै, व ककसी दसू री तकरीर मंे न ोगा। दसू रे---जादू व जो मसर चढ के बोलें ! तीसरे-अब जलसा बरखास्त कीज्जए । मंै तो चला। चौथै-य ांि भी चलतु ुए। यशोदानन्द-बैहठए-बहै ठए, पत्तल लगाये जा र े ै। प ले-बेटा परमानन्द, जरा य ािं तो आना, तमु ने य कागज क ांि पाया ? परमानन्द---बाबू जी ी तो मलखकर अपने मेज के अन्दर रख हदया था। मझु से क ा था कक इसे पढना। अब ना क मझु से खफा र े ै। यशोदानन्द---- व य कागज था कक सुअर ! मनैं े तो मेज के ऊपर ी रख हदया था। तूने ड्राअर में से क्यों य कागज ननकाला ? परमानन्द---मुझे मेज पर न ी ममला । यशोदान्नद---तो मुझसे क्यों न ी क ा, ड्राअर क्यों खोला ? देखो, आज कसी खबर लेता ूिं कक तमु भी याद करोगे। प ले य आकाशवाणी ै। दसू रे----इस को लीडरी क ते ै कक अपना उल्लू सीिा करो और नके नाम भी बनो। तीसरे----शरम आनी चाह ए। य त्याग से ममलता ै, िोखिे डी से न ी।
चौथे---ममल तो गया था पर एक आंचि की कसर र गयी। पांिचवे---ईश्वर पािंखंिडडयों को यों ी दण्ड देता ै य क ते ुए लोग उठ खडे ुए। यशोदानन्द समझ गये कक भंडि ा फू ट गया, अब रंिग न जमेगा। बार-बार परमानन्द को कु वपत नेत्रों से देखते थे और डडंि ा तौलकर र जाते थ।े इस शैतान ने आज जीती-ज्जताई बाजी खो दी, मिंु मंे कामलख लग गयी, मसर नीचा ो गया। गोली मार देने का काम ककया ै। उिर रास्ते मंे ममत्र-वगग यों हटप्पखणयािं करते जा र े थे------- एक ईश्वर ने मिुं में कै सी कामलमा लगायी कक यादार ोगा तो अब सूरत न हदखाएगा। दसू रा--कसे-कसे िनी, मानी, ववद्वान लोग कसे पनतत ो सकते ै। मुझे य ी आश्चयग ै। लेना ै तो खुले खजाने लो, कौन तमु ् ारा ाथ पकडता ै; य क्या कक माल चपु के -चुपके उडाओिं और यश भी कमाओिं ! तीसरा--मक्कार का मिुं काला ! चौथा-यशोदानन्द पर दया आ र ी ै। बेचारी ने इतनी ितू तग ा की, उस पर भी कलई खुल ी गयी। बस एक आंचि की कसर र गई। ***
माता का ह्रदय मािवी की आिखं ों में सारा संिसार अंिि रे ा ो र ा था । काई अपना मददगार हदखाई न देता था। क ीिं आशा की झलक न थी। उस ननिगन घर मंे व अके ली पडी रोती थी और कोई आसंि ू पोंछने वाला न था। उसके पनत को मरे ुए २२ वषग ो गए थे। घर में कोई सम्पज्त्त न थी। उसने न- जाने ककन तकलीफों से अपने बच्चे को पाल-पोस कर बडा ककया था। व ी जवान बेटा आज उसकी गोद से छीन मलया गया था और छीनने वाले कौन थे ? अगर मतृ ्यु ने छीना ोता तो व सब्र कर लेती। मौत से ककसी को द्वेष न ीिं ोता। मगर स्वाधथयग ों के ाथों य अत्याचार असहृ ो र ा था। इस घोर सतिं ाप की दशा मंे उसका जी र -र कर इतना ववफल ो जाता कक इसी समय चलिंू और उस अत्याचारी से इसका बदला लिूं ज्जसने उस पर ननष्ठु र आघात ककया ै। मारूंि या मर जाऊिं । दोनों ी में संति ोष ो जाएगा। ककतना सदुिं र, ककतना ोन ार बालक था ! य ी उसके पनत की ननशानी, उसके जीवन का आिार उसकी अम्रिं भर की कमाई थी। व ी लडका इस वक्त जले मे पडा न जाने क्या-क्या तकलीफंे झले र ा ोगा ! और उसका अपराि क्या था ? कु छ न ी। सारा मु ल्ला उस पर जान देता था। वविालय के अध्यापक उस पर जान देते थे। अपने-बेगाने सभी तो उसे प्यार करते थ।े कभी उसकी कोई मशकायत सनु ने में न ींि आयी।कसे बालक की माता ोन पर उसे बिाई देती थी। कै सा सजजन, कै सा उदार, कै सा परमाथी ! खुद भखू ो सो र े मगर क्या मजाल कक द्वार पर आने वाले अनतधथ को रूखा जबाब दे। कसा बालक क्या इस योग्य था कक जले में जाता ! उसका अपराि य ी था, व कभी-कभी सुनने वालों को अपने दखु ी भाइयों का दखु डा सुनाया करता था। अत्याचार से पीडडत प्राखणयों की मदद के मलए मेशा तयै ार र ता था। क्या य ी उसका अपराि था? दसू रो की सेवा करना भी अपराि ै ? ककसी अनतधथ को आश्रय देना भी अपराि ै?
इस यवु क का नाम आत्मानंदि था। दभु ागग्यवश उसमें वे सभी सद्गुण थे जो जेल का द्वार खोल देते ै। व ननभीक था, स्पष्टवादी था, सा सी था, स्वदेश-प्रेमी था, नन:स्वाथग था, कतवग ्यपरायण था। जले ल जाने के मलए इन् ीिं गणु ो की जरूरत ै। स्वािीन प्राखणयों के मलए वे गुण स्वगग का द्वार खोल देते ै, परािीनो के मलए नरक के ! आत्मानदिं के सेवा-कायग ने, उसकी वक्ततृ ताओंि ने और उसके राजनीनतक लेखो ने उसे सरकारी कमचग ाररयों की नजरों में चढा हदया था। सारा पमु लस-ववभाग नीचे से ऊपर तक उससे सतकग र ता था, सबकी ननगा ें उस पर लगींि र ती थीि।ं आखखर ज्जले मंे एक भयिंकर डाके ने उन् े इज्च्छत अवसर प्रदान कर हदया। आत्मानिंद के घर की तलाशी ुई, कु छ पत्र और लेख ममले, ज्जन् ें पमु लस ने डाके का बीजक मसद्व ककया। लगभग २० युवकों की एक टोली फािसं ली गयी। आत्मानिदं इसका मुखखया ठ राया गया। श ादतें ुई । इस बेकारी और धगरानी के जमाने में आत्मा सस्ती और कौन वस्तु ो सकती ै। बेचने को और ककसी के पास र ी क्या गया ै। नाम मात्र का प्रलोभन देकर अच्छी-से-अच्छी श ादतंे ममल सकती ै, और पुमलस के ाथ तो ननकृ ष्ट-से- ननकृ ष्ट गवाह यांि भी देववाणी का म त्व प्राप्त कर लेती ै। श ादतें ममल गयीिं, म ीनंे-भर तक मुकदमा क्या चला एक स्वािगं चलता र ा और सारे अमभयकु ्तों को सजाएिं दे दी गयीि।ं आत्मानदिं को सबसे कठोर दंिड ममला ८ वषग का कहठन कारावास। मािवी रोज कच री जाती; एक कोने में बैठी सारी कायवग ाई देखा करती। मानवी चररत्र ककतना दबु लग , ककतना नीच ै, इसका उसे अब तक अनमु ान भी न ुआ था। जब आत्मानिंद को सजा सनु ा दी गयी और व माता को प्रणाम करके मसपाह यों के साथ चला तो मािवी मनू छगत ोकर धगर पडी । दो-चार सजजनों ने उसे एक तािंगे पर बैठाकर घर तक प ुिंचाया। जब से व ोश मंे आयी ै उसके हृदय मंे शूल-सा उठ र ा ै। ककसी तर िैयग न ी ोता । उस घोर आत्म-वेदना की दशा में अब जीवन का एक लक्ष्य हदखाई देता ै और व इस अत्याचार का बदला ै।
अब तक पतु ्र उसके जीवन का आिार था। अब शत्रओु िं से बदला लेना ी उसके जीवन का आिार ोगा। जीवन में उसके मलए कोई आशा न थी। इस अत्याचार का बदला लेकर व अपना जन्म सफल समझगी। इस अभागे नर-वपशाच बगची ने ज्जस तर उसे रक्त के आसूंि रॅलाये ंै उसी भािंनत य भी उस रूलायेगी। नारी-हृदय कोमल ै लेककन के वल अनकु ू ल दशा में: ज्जस दशा में पुरूष दसू रों को दबाता ै, स्त्री शील और ववनय की देवी ो जाती ै। लेककन ज्जसके ाथों में अपना सवनग ाश ो गया ो उसके प्रनत स्त्री की पुरूष से कम घ्ज्ञणृ ा ओर क्रोि न ींि ोता अंितर इतना ी ै कक पुरूष शास्त्रों से काम लेता ै, स्त्री कौशल से । रा भीगती जाती थी और मािवी उठने का नाम न लेती थी। उसका द:ु ख प्रनतकार के आवशे मंे ववलीन ोता जाता था। य ािं तक कक इसके मसवा उसे और ककसी बात की याद ी न र ी। उसने सोचा, कै से य काम ोगा? कभी घर से न ीिं ननकली।विै व्य के २२ साल इसी घर कट गये लेककन अब ननकू लंिूगी।ंि जबरदस्ती ननकलूगंि ी, मभखाररन बनूगींि, ट लनी बनूगी, झूठ बोलंगिू ी, सब कु कमग करूिं गी। सत्कमग के मलए सिसं ार में स्थान न ी।ंि ईश्वर ने ननराश ोकर कदाधचत ् इसकी ओर से मंिु फे र मलया ै। जभी तो य ािं कसे-कसे अत्याचार ोते ै। और पावपयों को दडिं न ींि ममलता। अब इन् ीिं ाथों से उसे दंिड दगू ी। 2 सधंि ्या का समय था। लखनऊ के एक सजे ुए बगिं ले मंे ममत्रों की म कफल जमी ुई थी। गाना-बजाना ो र ा था। एक तरफ आतशबाज्जयािं रखी ुई थीि।ं दसू रे कमरे में मेजों पर खना चनु ा जा र ा था। चारों तरफ पुमलस के कमचग ारी नजर आते थें व पुमलस के सुपररटंि ेंडटंे ममस्टर बगीची का बंगि ला ै। कई हदन ुए उन् ोने एक माके का मुकदमा जीता था।अफसरो ने खुश ोकर उनकी तरक्की की दी थी। और उसी की खुशी में य उत्सव मनाया जा र ा था। य ािं आये हदन कसे उत्सव ोते र ते थे। मुफ्त के गवयै े ममल जाते थे, मफु ्त की अतशबाजी; फल और मेवे और ममठाईयांि आिे दामों पर बाजार से आ जाती थींि। और चट दावतो ो जाती थी। दसू रों के ज ों सौ लगत,े व ािं इनका दस से काम
चल जाता था। दौड-िूप करने को मसपाह यों की फौज थी ी।िं और य माके का मकु दमा क्या था? व ज्जसमें ननरपराि यवु कों को बनावटी श ादत से जेल में ठू स हदया गया था। गाना समाप्त ोने पर लोग भोजन करने बैठें । बेगार के मजदरू और पल्लेदार जो बाजार से दावत और सजावट के सामान लाये थे, रोते या हदल मंे गामलयािं देते चले गये थे; पर एक बहु ढ़या अभी तक द्वार पर बैठी ुई थी। और अन्य मजदरू ों की तर व भनू भुना कर काम न करती थी। ुक्म पाते ी खशु -हदल मजदरू की तर ुक्म बजा लाती थी। य मिवी थी, जो इस समय मजरू नी का वेष िारण करके अपना घतक सिंकल्प पूरा करने आयी थी। मे मान चले गये। म कफल उठ गयी। दावत का समान समेट हदया गया। चारों ओर सन्नाटा छा गया; लेककन मािवी अभी तक व ींि बैठी थी। स सा ममस्टर बागची ने पछू ा-बुड्ढी तू य ािं क्यों बठै ी ै? तुझे कु छ खाने को ममल गया? मािवी- ािं ुजूर, ममल गया। बागची-तो जाती क्यों न ींि? मािवी-क ांि जाऊिं सरकार , मेरा कोई घर-द्वार थोडे ी ै। ुकु म ो तो य ीिं पडी र ूिं। पाव-भर आटे की परवस्ती ो जाय ुजरु । बगची -नौकरी करेगी? मािवी-क्यो न करूिं गी सरकार, य ी तो चा ती ूंि। बागची-लडका खखला सकती ै? मािवी- ािं जरू , व मेरे मन का काम ै।
बगची-अच्छी बात ै। तु आज ी से र । जा घर में देख, जो काम बताय,ें व ा कर। 3 एक म ीना गुजर गया। मािवी इतना तन-मन से काम करती ै कक सारा घर उससे खशु ै। ब ू जी का मीजाज ब ुम ी धचडधचडा ै। व हदन-भर खाट पर पडी र ती ै और बात-बात पर नौकरों पर झल्लाया करती ै। लेककन मािवी उनकी घडु ककयों को भी स षग स लेती ै। अब तक मजु ्श्कल से कोई दाई एक सप्ता से अधिक ठ री थी। मािवी का कलेजा ै कक जली-कटी सनु कर भी मखु पर मैल न ींि आने देती। ममस्टर बागची के कई लडके ो चुके थे, पर य ी सबसे छोटा बच्चा बच र ा था। बच्चे पैदा तो हृष्ट-पषृ ्ट ोत,े ककन्तु जन्म लेते ी उन् े एक -न एक रोग लग जाता था और कोई दो-चार म ीनंे, कोई साल भर जी कर चल देता था। मािं-बाप दोनों इस मशशु पर प्राण देते थ।े उसे जरा जकु ाम भी ो तो दोनो ववकल ो जात।े स्त्री-परु ूष दोनो मशक्षक्षत थे, पर बच्चे की रक्षा के मलए टोना-टोटका , दआु ता-बीच, जन्तर-मंितर एक से भी उन् ें इनकार न था। मािवी से य बालक इतना ह ल गया कक एक क्षण के मलए भी उसकी गोद से न उतरता। व क ींि एक क्षण के मलए चली जाती तो रो-रो कर दनु नया मसर पर उठा लेता। व सुलाती तो सोता, व दिू वपलाती तो वपता, व खखलाती तो खेलता, उसी को व अपनी माता समझता। मािवी के मसवा उसके मलए ससंि ार में कोई अपना न था। बाप को तो व हदन-भर में के वल दो-नार बार देखता और समझता य कोई परदेशी आदमी ै। मािं आलस्य और कमजारी के मारे गोद में लेकर ट ल न सकती थी। उसे व अपनी रक्षा का भार सभंि ालने के योग्य न समझता था, और नौकर-चाकर उसे गोद में ले लेते तो इतनी वेददी से कक उसके कोमल अिंगो मे पीडा ोने लगती थी। कोई उसे ऊपर उछाल देता था, य ािं तक कक अबोि मशशु का कलेजा मंिु को आ जाता था। उन सबों से व
डरता था। के वल मािवी थी जो उसके स्वभाव को समझती थी। व जानती थी कक कब क्या करने से बालक प्रसन्न ोगा। इसमलए बालक को भी उससे प्रेम था। मािवी ने समझाया था, य ािं कंि चन बरसता ोगा; लेककन उसे देखकर ककतना ववस्मय ुआ कक बडी मुज्श्कल से म ीने का खचग पूरा पडता ै। नौकरों से एक- एक पैसे का ह साब मलया जाता था और ब ुिा आवश्यक वस्तएु ंि भी टाल दी जाती थीिं। एक हदन मािवी ने क ा-बच्चे के मलए कोई तजे गाडी क्यों न ीिं मंिगवा देतीं।ि गोद में उसकी बाढ़ मारी जाती ै। ममसेज बागजी ने कु हठंित ोकर क ा-क ािं से मगवािं दिं?ू कम से कम ५०-६० रुपयंि में आयेगी। इतने रुपये क ािं ै? मािवी-मलककन, आप भी कसा क ती ै! ममसेज बगची-झठू न ींि क ती। बाबू जी की प ली स्त्री से पाचंि लडककयांि और ै। सब इस समय इला ाबाद के एक स्कू ल में पढ र ी ैं। बडी की उम्र १५-१६ वषग से कम न ोगी। आिा वते न तो उिार ी चला जाता ै। कफर उनकी शादी की भी तो कफक्र ै। पािंचो के वववा मंे कम-से-कम २५ जार लगेंगे। इतने रूपये क ािं से आयेगंे। मै धचतंि ा के मारे मरी जाती ूिं। मझु े कोई दसू री बीमारी न ींि ै के वल धचतिं ा का रोग ै। मािवी-घसू भी तो ममलती ै। ममसेज बागची-बढू ़ी, कसी कमाई में बरकत न ींि ोती। य ी क्यों सच पूछो तो इसी घूस ने मारी य दगु तग ी कर रखी ै। क्या जाने औरों को कै से जम ोती ै। य ािं तो जब कसे रूपये आते ै तो कोई-न-कोई नुकसान भी अवश्य ो जाता ै। एक आता ै तो दो लेकर जाता ै। बार-बार मना करती ूंि, राम की कौडी घर मे न लाया करो, लेककन मेरी कौन सनु ता ै।
बात य थी कक मािवी को बालक से स्ने ोता जाता था। उसके अमंगि ल की कल्पना भी व न कर सकती थी। व अब उसी की नीिदं सोती और उसी की नीदंि जागती थी। अपने सवनग ाश की बात याद करके एक क्षण के मलए बागची पर क्रोि तो ो आता था और घाव कफर रा ो जाता था; पर मन पर कु ज्त्सत भावों का आधिपत्य न था। घाव भर र ा था, के वल ठे स लगने से ददग ो जाता था। उसमंे स्वयिं टीस या जलन न थी। इस पररवार पर अब उसे दया आती थी। सोचती, बेचारे य छीन-झपट न करंे तो कै से गुजर ो। लडककयों का वववा क ािं से करेगंे! स्त्री को जब देखो बीमार ी र ती ै। उन पर बाबू जी को एक बोतल शराब भी रोज चाह ए। य लोग स्वयंि अभागे ै। ज्जसके घर मंे ५-५क्वारी कन्याएिं ों, बालक ो- ो कर मर जाते ों, घरनी दा बीमार र ती ो, स्वामी शराब का तली ो, उस पर तो यों ी ईश्वर का कोप ै। इनसे तो मैं अभाधगन ी अच्छी! ४ दबु लग बलकों के मलए बरसात बरु ी बला ै। कभी खािंसी ै, कभी जवर, कभी दस्त। जब वा में ी शीत भरी ो तो कोई क ांि तक बचाये। मािवी एक हदन आपने घर चली गयी थी। बच्चा रोने लगा तो मांि ने एक नौकर को हदया, इसे बा र ब ला ला। नौकर ने बा र ले जाकर री- री घास पर बैठा हदया,। पानी बरस कर ननकल गया था। भूमम गीली ो र ी थी। क ीिं-क ीिं पानी भी जमा ो गया था। बालक को पानी मंे छपके लगाने से जयादा प्यारा और कौन खले ो सकता ै। खबू प्रेम से उमंगि -उमगिं कर पानी मंे लोटने लगािं नौकर बठै ा और आदममयों के साथ गप-शप करता घिंटो गुजर गये। बच्चे ने खूब सदी खायी। घर आया तो उसकी नाक ब र ी थीिं रात को मािवी ने आकर देखा तो बच्चा खासिं र ा था। आिी रात के करीब उसके गले से खरु खरु की आवाज ननकलने लगी। मािवी का कलेजा सन से ो गया। स्वाममनी को जगाकर बोली-देखो तो बच्चे
को क्या ो गया ै। क्या सदी-वदी तो न ींि लग गयी। ािं, सदी ी मालूम ोती ै। स्वाममनी कबका कर उठ बैठी और बालक की खरु खरा ट सनु ी तो पािवं तलेजमीन ननकल गयीिं य भंयि कर आवाज उसने कई बार सनु ी थी और उसे खूब प चानती थी। व्यग्र ोकर बोली-जरा आग जलाओ। थोडा-सा तिंग आ गयी। आज क ार जरा देर के मलए बा र ले गया था, उसी ने सदी में छोड हदया ोगा। सारी रात दोंनो बालक को सकें ती र ीिं। ककसी तर सवेरा ुआ। ममस्टर बागची को खबर ममली तो सीिे डाक्टर के य ांि दौड।े खैररयत इतनी थी कक जल्द ए नतयात की गयी। तीन हदन में अच्छा ो गया; लेककन इतना दबु लग ो गया था कक उसे देखकर डर लगता था। सच पछू ों तो मािवी की तपस्या ने बालक को बचायाि।ं माता-वपता सो जाता, ककंि तु मािवी की आखंि ों में नीिंद न थी। खना- पीना तक भूल गयी। देवताओंि की मनौनतयांि करती थी, बच्चे की बलाएंि लेती थी, बबल्कु ल पागल ो गयी थी, य व ी मािवी ै जो अपने सवनग ाश का बदला लेने आयी थी। अपकार की जग उपकार कर र ी थी।ववष वपलाने आयी थी, सिु ा वपला र ी थी। मनषु ्य में देवता ककतना प्रबल ै! प्रात:काल का समय था। ममस्टर बागची मशशु के झूले के पास बैठे ुए थ।े स्त्री के मसर मंे पीडा ो र ी थी। व ीिं चारपाई पर लेटी ुई थी और मािवी समीप बैठी बच्चे के मलए दिु गरम कर र ी थी। स सा बागची ने क ा-बूढ़ी, म जब तक ज्जयगें े तुम् ारा यश गयगें े। तमु ने बच्चे को ज्जला मलयांि स्त्री-य देवी बनकर मारा कष्ट ननवारण करने के मलए आ गयी। य न ोती तो न जाने क्या ोता। बूढ़ी, तुमसे मेरी एक ववनती ै। यों तो मरना जीना प्रारब्ि के ाथ ै, लेककन अपना-अपना पौरा भी बडी चीज ै। मैं अभाधगनी ूंि। अबकी तुम् ारे ी पणु ्य-प्रताप से बच्चा संभि ल गया। मुझे डर लग र ा ै कक ईश्वर इसे मारे ाथ से छीन ने ले। सच क तीिं ूिं बूढ़ी, मझु े इसका गोद मंे लेते डर लगता ंै। इसे तुम आज से अपना बच्चा समझो। तमु ् ारा ोकर शायद बच
जाय। म अभागे ंै, मारा ोकर इस पर ननत्य कोई-न-कोई सकंि ट आता र ेगा। आज से तुम इसकी माता ो जाआ। तमु इसे अपने घर ले जाओ। ज ांि चा े ले जाओ, तुम् ारी गोंद मे देर मझु े कफर कोई धचतंि ा न र ेगी। वास्तव मंे तमु ् ीिं इसकी माता ो, मै तो राक्षसी ूिं। मािवी-ब ू जी, भगवान ् सब कु शल करेगें, क्यों जी इतना छोटा करती ो? ममस्टर बागची-न ीिं-न ीिं बूढ़ी माता, इसमंे कोई रज न ीिं ै। मै मज्स्तष्क से तो इन बािंतो को ढकोसला ी समझता ूिं; लेककन हृदय से इन् ंे दरू न ीिं कर सकता। मुझे स्वयिं मेरी माता जीने एक िाबबन के ाथ बेच हदया था। मेरे तीन भाई मर चकु े थ।े मै जो बच गया तो मांि-बाप ने समझा बेचने से ी इसकी जान बच गयी। तुम इस मशशु को पालो-पासो। इसे अपना पुत्र समझो। खचग म बराबर देते र ेंगें। इसकी कोई धचतिं ा मत करना। कभी -कभी जब मारा जी चा ेगा, आकर देख मलया करेगें। में ववश्वास ै कक तुम इसकी रक्षा म लोंगों से क ींि अच्छी तर कर सकती ो। मैं कु कमी ूिं। ज्जस पेशे में ूंि, उसमें कु कमग ककये बगैर काम न ीिं चल सकता। झठू ी श ादतंे बनानी ी पडती ै, ननरपरािों को फंि साना ी पडता ै। आत्मा इतनी दबु लग ो गयी ै कक प्रलोभन मंे पड ी जाता ूंि। जानता ी ूंि कक बरु ाई का फल बरु ा ी ोता ै; पर पररज्स्थनत से मजबरू ूिं। अगर न करूंि तो आज नालायक बनाकर ननकाल हदया जाऊंि । अग्रेज जारों भलू ें करंे, कोई न ीिं पूछता। ह नदसू ्तानी एक भूल भी कर बैठे तो सारे अफसर उसके मसर ो जाते ै। ह दंि सु ्ताननयत को दोष ममटाने के मलए ककतनी ी कसी बातें करनी पडती ै ज्जनका अग्रेंज के हदल मंे कभी ख्याल ी न ीिं पदै ा ो सकता। तो बोलो, स्वीकार करती ो? मािवी गद्गद् ोकर बोली-बाबू जी, आपकी इच्छा ै तो मुझसे भी जो कु छ बन पडगे ा, आपकी सेवा कर दंिगू ीिं भगवान ् बालक को अमर करंे, मेरी तो उनसे य ी ववनती ै।
मािवी को कसा मालमू ो र ा था कक स्वगग के द्वार सामने खलु े ंै और स्वगग की देववयांि अंचि ल फै ला-फै ला कर आशीवादग दे र ी ंै, मानो उसके अंितस्तल में प्रकाश की ल रें-सी उठ र ीिं ै। स्ने मय सेवा मंे कक ककतनी शानंि त थी। बालक अभी तक चादर ओढ़े सो र ा था। मािवी ने दिू गरम ो जाने पर उसे झलू े पर से उठाया, तो धचल्ला पडी। बालक की दे ठंि डी ो गयी थी और मंुि पर व पीलापन आ गया था ज्जसे देखकर कलेजा ह ल जाता ै, कंि ठ से आ ननकल आती ै और आिंखों से आसंिू ब ने लगते ंै। ज्जसने इसे एक बारा देखा ै कफर कभी न ींि भूल सकता। मािवी ने मशशु को गोंद से धचपटा मलया, ालाककिं नीचे उतार दोना चाह ए था। कु राम मच गया। मािं बच्चे को गले से लगाये रोती थी; पर उसे जमीन पर न सलु ाती थी। क्या बातें ो र ी र ी थीिं और क्या ो गया। मौत को िोखा दोने मंे आन्नद आता ै। व उस वक्त कभी न ीिं आती जब लोग उसकी रा देखते ोते ंै। रोगी जब सिभं ल जाता ै, जब व पर्थय लेने लगता ै, उठने-बैठने लगता ै, घर-भर खमु शयािं मनाने लगता ै, सबकों ववश्वास ो जाता ै कक सकिं ट टल गया, उस वक्त घात में बठै ी ुई मौत मसर पर आ जाती ै। य ी उसकी ननठु र लीला ै। आशाओिं के बाग लगाने मंे म ककतने कु शल ैं। य ांि म रक्त के बीज बोकर सुिा के फल खाते ंै। अज्ग्न से पौिों को सीिंचकर शीतल छािं मंे बैठते ैं। ांि, मिंद बुवद्ध। हदन भर मातम ोता र ा; बाप रोता था, मांि तडपती थी और मािवी बारी-बारी से दोनो को समझाती थी।यहद अपने प्राण देकर व बालक को ज्जला सकती तो इस समया अपना िन्य भाग समझती। व अह त का सिकं ल्प करके य ांि आयी थी और आज जब उसकी मनोकामना पूरी ो गयी और उसे खशु ी से फू ला न समाना चाह ए था, उस उससे क ींि घोर पीडा ो र ी थी जो अपने पतु ्र की जले यात्रा मंे ुई थी। रूलाने आयी थी और खुद राती जा र ींि थी। माता का हृदय
दया का आगार ै। उसे जलाओ तो उसमंे दया की ी सुगिंि ननकलती ै, पीसो तो दया का ी रस ननकलता ै। व देवी ै। ववपज्त्त की क्रू र लीलाएंि भी उस स्वच्छ ननमलग स्रोत को ममलन न ींि कर सकती।ंि ***
परीक्षा नाहदरशा की सेना मंे हदल्ली के कत्लेआम कर रखा ै। गमलयों मे खून की नहदयांि ब र ी ंै। चारो तरफ ा ाकार मचा ुआ ै। बाजार बदिं ै। हदल्ली के लोग घरों के द्वार बिंद ककये जान की खरै मना र े ै। ककसी की जान सलामत न ींि ै। क ीिं घरों मंे आग लगी ुई ै, क ींि बाजार लटु र ा ै; कोई ककसी की फररयाद न ींि सनु ता। रईसों की बेगमें म लो से ननकाली जा र ी ै और उनकी बे ुरती की जाती ै। ईरानी मसपाह यों की रक्त वपपासा ककसी तर न ीिं बझु ती। मानव हृदया की क्रू रता, कठोरता और पशै ाधचकता अपना ववकरालतम रूप िारण ककये ुए ै। इसी समया नाहदर शा ने बादशा ी म ल में प्रवेश ककया। हदल्ली उन हदनों भोग-ववलास की कें द्र बनी ुई थी। सजावट और तकल्लफु के सामानों से रईसों के भवन भरे र ते थे। ज्स्त्रयों को बनाव-मसगांरि के मसवा कोई काम न था। पुरूषों को सुख-भोग के मसवा और कोई धचन्ता न थी। राजीननत का स्थान शरे ो-शायरी ने ले मलया था। समस्त प्रन्तो से िन खखचिं -खखचिं कर हदल्ली आता था। और पानी की भािनं त ब ाया जाता था। वेश्याओिं की चादीिं थी। क ीिं तीतरों के जोड ोते थे, क ीिं बटेरो और बुलबलु ों की पमलयािं ठनती थी।िं सारा नगर ववलास -ननद्रा मंे मग्न था। नाहदरशा शा ी म ल में प ुिंचा तो व ांि का सामान देखकर उसकी आिखं ंे खुल गयीं।ि उसका जन्म दररद्र-घर मंे ुआ था। उसका समसत जीवन रणभमू म में ी कटा था। भोग ववलास का उसे चसका न लगा था। क ांि रण-क्षते ्र के कष्ट और क ािं य सुख-साम्राजय। ज्जिर आखंि उठती थी, उिर से टने का नाम न लेती थी। सधिं ्या ो गयी थी। नाहदरशा अपने सरदारों के साथ म ल की सरै करता और अपनी पसंिद की सचीजों को बटोरता ुआ दीवाने-खास में आकर कारचोबी मसनद पर बैठ गया, सरदारों को व ािं से चले जाने का ुक्म दे हदया, अपने सब धथयार रख हदये और म ल के दरागा को बुलाकर ुक्म हदया-मै शा ी बेगमों का नाच देखना चा ता ूिं। तमु इसी वक्त उनको सिुदं र वस्त्राभूषणों से
सजाकर मेरे सामने लाओिं खबरदार, जरा भी देर न ो! मै कोई उज्र या इनकार न ींि सुन सकता। 2 दारोगा ने य नाहदरशा ी ुक्म सुना तो ोश उड गये। व मह लएिं ज्जन पर सूयग की दृहट भी न ीिं पडी कै से इस मजमलस मंे आयगंे ी! नाचने का तो क ना ी क्या! शा ी बेगमों का इतना अपमान कभी न ुआ था। ा नरवपशाच! हदल्ली को खनू से रिंग कर भी तरे ा धचत्त शाितं न ीिं ुआ। मगर नाहदरशा के सम्मुख एक शब्द भी जबान से ननकालना अज्ग्न के मुख में कू दना था! मसर झुकाकर आदाग लाया और आकर रननवास मंे सब वगे मों को नादीरशा ी ुक्म सनु ा हदया; उसके साथ ी य इत्त्ला भी दे दी कक जरा भी ताम्मुल न ो , नाहदरशा कोई उज्र या ह ला न सनु ेगा! शा ी खानदोन पर इतनी बडी ववपज्त्त कभी न ींि पडी; पर अस समय ववजयी बादशा की आज्ञा को मशरोिायग करने के मसवा प्राण-रक्षा का अन्य कोई उपाय न ींि था। बेगमों ने य आज्ञा सुनी तो तबुवद्ध-सी ो गयीिं। सारे रननवास में मातम-सा छा गया। व च ल-प ल गायब ो गयीि।ं सकै डो हृदयों से इस स ायता-याचक लोचनों से देखा, ककसी ने खदु ा और रसलू का सुममरन ककया; पर कसी एक मह ला भी न थी ज्जसकी ननगा कटार या तलवार की तरफ गयी ो। यद्यपी इनमें ककतनी ी बेगमों की नसों में राजपूताननयों का रक्त प्रवाह त ो र ा था; पर इंिहद्रयमलप्सा ने जौ र की परु ानी आग ठंि डी कर दी थी। सुख-भोग की लालसा आत्म-सम्मान का सवनग ाश कर देती ै। आपस मंे सला करके मयागदा की रक्षा का कोई उपाया सोचने की मु लत न थी। एक-एक पल भाग्य का ननणयग कर र ा था। ताश का ननणयग कर र ा था। ताश ोकर सभी ललपाओिं ने पापी के सम्मुख जाने का ननश्चय ककया। आखंि ों से आसंूि जारी थे, अश्रु-मसधंि चत नते ्रों मंे सरु मा लगाया जा र ा था और शोक-व्यधथत हृदयािं पर सगु ििं का लेप ककया जा र ा था। कोई के श गुिथं तींि थी, कोई मािंगो मंे मोनतयों वपरोती थी। एक भी कसे
पक्के इरादे की स्त्री न थी, जो इश्वर पर अथवा अपनी टेक पर, इस आज्ञा का उल्लंिघन करने का सा स कर सके । एक घंटि ा भी न गुजरने पाया था कक बेगमात पूरे-के -परू े, आभषू णों से जगमगातीिं, अपने मखु की कािंनत से बेले और गुलाब की कमलयों को लजातींि, सगु िंि की लपटंे उडाती, छमछम करती ुई दीवाने-खास मंे आकर दनाहदरशा के सामने खडी ो गयी।िं 3 नाहदर शा ने एक बार कनखखयों से पररयों के इस दल को देखा और तब मसनद की टेक लगाकर लटे गया। अपनी तलवार और कटार सामने रख दी। एक क्षण में उसकी आखंि ें झपकने लगींि। उसने एक अगडाई ली और करवट बदल ली। जरा देर में उसके खरागटों की अवाजंे सनु ायी देने लगीिं। कसा जान पडा कक ग री ननद्रा मंे मग्न ो गया ै। आि घंटि े तक व सोता र ा और बेगमंे जयों की त्यों मसर ननचा ककये दीवार के धचत्रों की भानिं त खडी र ीि।ं उनमें दो-एक मह लाएिं जो ढीठ थींि, घघू ंटि की ओट से नाहदरशा को देख भी र ींि थींि और आपस मंे दबी जबान में कानाफू सी कर र ी थींि-कै सा भंियकर स्वरूप ै! ककतनी रणोन्मत आिंखंे ै! ककतना भारी शरीर ै! आदमी का े को ै, देव ै। स सा नाहदरशा की आखंि ें खुल गई पररयों का दल पवू वग त ् खडा था। उसे जागते देखकर बेगमों ने मसर नीचे कर मलये और अंिग समेट कर भेडो की भानंि त एक दसू रे से ममल गयीि।ं सबके हदल िडक र े थे कक अब य जामलम नाचने-गाने को क ेगा, तब कै से ोगा! खदु ा इस जामलम से समझ!े मगर नाचा तो न जायेगा। चा े जान ी क्यों न जाय। इससे जयादा ज्जल्लत अब न स ी जायगी। स सा नाहदरशा कठोर शब्दों मंे बोला-क खुदा की बहंि दयो, मैने तमु ् ारा इम्त ान लेने के मलए बुलाया था और अफसोस के साथ क ना पडता ै कक तमु ् ारी ननसबत मेरा जो गमु ान था, व फग -ब- फग सच ननकला। जब ककसी कौम की
औरतों में गरै त न ीिं र ती तो व कौम मरु दा ो जाती ै। देखना चा ता था कक तमु लोगों में अभी कु छ गैरत बाकी ै या न ी।ंि इसमलए मैने तमु ् ंे य ािं बुलाया था। मै तुम ारी बे ुरमली न ींि करना चा ता था। मैं इतना कश का बंदि ा न ीिं ूिं , वरना आज भेडो के गल्ले चा ता ोता। न इतना वसपरस्त ूंि, वरना आज फारस मंे सरोद और मसतार की तानंे सनु ाता ोता, ज्जसका मजा मै ह दिं सु ्तानी गाने से क ीिं जयादा उठा सकता ूंि। मुझे मसफग तमु ् ारा इम्त ान लेना था। मझु े य देखकर सचा मलाल ो र ा ै कक तमु मंे गरै त का जौ र बाकी न र ा। क्या य मुमककन न था कक तमु मेरे ुक्म को परै ों तले कु चल देतींि? जब तमु य ांि आ गयीिं तो मनै े तुम् ें एक और मौका हदया। मैने नींदि का ब ाना ककया। क्या य मुमककन न था कक तुममंे से कोई खुदा की बदिं ी इस कटार को उठाकर मेरे ज्जगर में चभु ा देती। मै कलामेपाक की कसम खाकर क ता ूिं कक तमु मंे से ककसी को कटार पर ाथ रखते देखकर मझु े बे द खशु ी ोती, मै उन नाजुक ाथों के सामने गरदन झुका देता! पर अफसोस ै कक आज तमै ूरी खानदान की एक बेटी भी य ािं कसी न ीिं ननकली जो अपनी ुरमत बबगाडने पर ाथ उठाती! अब य सल्लतनत ज्जिदं ा न ीिं र सकती। इसकी सती के हदन धगने ुए ंै। इसका ननशान ब ुत जल्द दनु नया से ममट जाएगा। तमु लोग जाओ और ो सके तो अब भी सल्तनत को बचाओ वरना इसी तर वस की गुलामी करते ुए दनु नया से रुखसत ो जाओगी। ***
तेंतर आखखर व ी ुआ ज्जसकी आंिशका थी; ज्जसकी धचतिं ा में घर के सभी लोग और ववषेशत: प्रसूता पडी ुई थी। तीनो पुत्रो के पश्चात ् कन्या का जन्म ुआ। माता सौर मंे सखू गयी, वपता बा र आिंगन में सखू गये, और की वदृ ्ध माता सौर द्वार पर सखू गयी। अनथग, म ाअनथग भगवान ् ी कु शल करें तो ो? य पतु ्री न ींि राक्षसी ै। इस अभाधगनी को इसी घर मंे जाना था! आना था तो कु छ हदन प ले क्यों न आयी। भगवान ् सातवें शत्रु के घर भी तंेतर का जन्म न दंे। वपता का नाम था पिंडडत दामोदरदत्त। मशक्षक्षत आदमी थे। मशक्षा-ववभाग ी में नौकर भी थे; मगर इस सिंस्कार को कै से ममटा देते, जो परम्परा से हृदय मंे जमा ुआ था, कक तीसरे बेटे की पीठ पर ोने वाली कन्या अभाधगनी ोती ै, या वपता को लेती ै या वपता को, या अपने कों। उनकी वदृ ्धा माता लगी नवजात कन्या को पानी पी-पी कर कोसन,े कलमंिु ी ै, कलमु ी! न जाने क्या करने आयी ंै य ा।िं ककसी बांिझ के घर जाती तो उसके हदन कफर जात!े दामोदरदत्त हदल मंे तो घबराये ुए थे, पर माता को समझाने लगे-अम्मा तेंतर- बंेतर कु छ न ीिं, भगवान ् की इच्छा ोती ै, व ी ोता ै। ईश्वर चा ेंगे तो सब कु शल ी ोगा; गानवे ामलयों को बलु ा लो, न ींि लोग क ेंगे, तीन बेटे ुए तो कै से फू ली कफरती थींि, एक बेटी ो गयी तो घर में कु राम मच गया। माता-अरे बेटा, तमु क्या जानो इन बातों को, मेरे मसर तो बीत चकु ी ंै, प्राण न ींि मंे समाया ुआ ंै तंेतर ी के जन्म से तुम् ारे दादा का दे ांति ुआ। तभी से तेंतर का नाम सनु ते ी मेरा कलेजा कांपि उठता ै। दामोदर-इस कष्ट के ननवारण का भी कोई उपाय ोगा? माता-उपाय बताने को तो ब ुत ैं, पडंि डत जी से पूछो तो कोई-न-कोई उपाय बता देंगे; पर इससे कु छ ोता न ी।ंि मनंै े कौन-से अनषु ्ठान न ींि ककये, पर पडिं डत जी
की तो महु ट्ठयािं गरम ुईं, य ािं जो मसर पर पडना था, व पड ी गया। अब टके के पंिडडत र गये ंै, जजमान मरे या ज्जये उनकी बला से, उनकी दक्षक्षणा ममलनी चाह ए। (िीरे से) लकडी दबु ली-पतली भी न ीिं ै। तीनों लकडों से हृष्ट-पषु ्ट ै। बडी-बडी आंिखे ै, पतले-पतले लाल-लाल ओंिठ ंै, जैसे गुलाब की पत्ती। गोरा- धचट्टा रिंग ैं, लम्बी-सी नाक। कलमु ी न लाते समय रोयी भी न ीिं, टु कु रटु कु र ताकती र ी, य सब लच्छन कु छ अच्छे थोडे ी ै। दामोदरदत्त के तीनों लडके सािंवले थे, कु छ ववशेष रूपवान भी न थे। लडकी के रूप का बखान सुनकर उनका धचत्त कु छ प्रसन्न ुआ। बोले-अम्मा जी, तमु भगवान ् का नाम लेकर गानेवामलयों को बलु ा भेजों, गाना-बजाना ोने दो। भाग्य में जो कु छ ंै, व तो ोगा ी। माता-जी तो ुलसता न ींि, करूिं क्या? दामोदर-गाना न ोने से कष्ट का ननवारण तो ोगा न ीिं, कक ो जाएगा? अगर इतने सस्ते जान छू टे तो न कराओ गान। माता-बुलाये लेती ूिं बेटा, जो कु छ ोना था व तो ो गया। इतने मंे दाई ने सौर मंे से पुकार कर क ा-ब ूजी क ती ंै गानावाना कराने का काम न ींि ै। माता-भला उनसे क ो चुप बठै ी र े, बा र ननकलकर मनमानी करेंगी, बार ी हदन ैं ब ुत हदन न ींि ै; ब ुत इतराती कफरती थी-य न करूिं गी, व न करूिं गी, देवी क्या ैं, मरदों की बातें सनु कर व ी रट लगाने लगी थीिं, तो अब चपु के से बैठती क्यो न ीि।ं मैं तो तेंतर को अशुभ न ींि मानतींि, और सब बातों में मेमों की बराबरी करती ंै तो इस बात मंे भी करे। य क कर माता जी ने नाइन को भेजा कक जाकर गानवे ामलयों को बलु ा ला, पडोस मंे भी क ती जाना।
सवरे ा ोते ी बडा लडका सो कर उठा और आिंखे मलता ुआ जाकर दादी से पूछने लगा-बडी अम्मा, कल अम्मा को क्या ुआ? माता-लडकी तो ुई ै। बालक खुशी से उछलकर बोला-ओ- ो- ो पैजननयािं प न-प न कर छु न-छु न चलेगी, जरा मुझे हदखा दो दादी जी? माता-अरे क्या सौर में जायगा, पागल ो गया ै क्या? लडके की उत्सुकता न मानी।िं सौर के द्वार पर जाकर खडा ो गया और बोला- अम्मा जरा बच्ची को मझु े हदखा दो। दाई ने क ा-बच्ची अभी सोती ै। बालक-जरा हदखा दो, गोद मंे लेकर। दाई ने कन्या उसे हदखा दी तो व ािं से दौडता ुआ अपने छोटे भाइयंे के पास प ुिंचा और उन् ें जगा-जगा कर खुशखबरी सनु ायी। एक बोला-नन् ीिं-सी ोगी। बडा-बबलकु ल नन् ींि सी! जसै ी बडी गुडडया! कसी गोरी ै कक क्या ककसी सा ब की लडकी ोगी। य लडकी मंै लंूगि ा। सबसे छोटा बोला-अमको बी हदका दो। तीनों ममलकर लडकी को देखने आये और व ांि से बगलें बजाते उछलते-कू दते बा र आये। बडा-देखा कै सी ै!
मंझि ला-कै से आंखि ंे बदंि ककये पडी थी। छोटा- मंे में तो देना। बडा-खबू द्वार पर बारात आयेगी, ाथी, घोडे, बाजे आतशबाजी। मझिं ला और छोटा कसे मग्न ो र े थे मानो व मनो र दृश्य आखंि ो के सामने ै, उनके सरल नते ्र मनोल्लास से चमक र े थे। मंझि ला बोला-फु लवाररयािं भी ोंगी। छोटा-अम बी पूल लंेगे! 2 छट्ठी भी ुई, बर ी भी ुई, गाना-बजाना, खाना-वपलाना-देना-हदलाना सब-कु छ ुआ; पर रस्म पूरी करने के मलए, हदल से न ीिं, खुशी से न ी।ंि लडकी हदन-हदन दबु लग और अस्वस्थ ोती जाती थी। मांि उसे दोनों वक्त अफीम खखला देती और बामलका हदन और रात को नशे में बे ोश पडी र ती। जरा भी नशा उतरता तो भखू से ववकल ोकर रोने लगती! मािं कु छ ऊपरी दिू वपलाकर अफीम खखला देती। आश्चयग की बात तो य थी कक अब की उसकी छाती मंे दिू न ीिं उतरा। यों भी उसे दिू दे से उतरता था; पर लडकों की बेर उसे नाना प्रकार की दिू वद्धगक औषधियांि खखलायी जाती, बार-बार मशशु को छाती से लगाया जाता, य ांि तक कक दिू उतर ी आता था; पर अब की य आयोजनाएंि न की गयीं।ि फू ल- सी बच्ची कु म् लाती जाती थी। मािं तो कभी उसकी ओर ताकती भी न थी। ांि, नाइन कभी चटु ककयांि बजाकर चमु कारती तो मशशु के मखु पर कसी दयनीय, कसी करूण बेदना अिकं कत हदखायी देती कक व आंखि ें पोंछती ुई चली जाती थी। ब ु से कु छ क ने-सनु ने का सा स न पडता। बडा लडका मसद्धु बार-बार क ता-अम्मा, बच्ची को दो तो बा र से खेला लाऊिं । पर मांि उसे खझडक देती थी।
तीन-चार म ीने ो गये। दामोदरदत्त रात को पानी पीने उठे तो देखा कक बामलका जाग र ी ै। सामने ताख पर मीठे तले का दीपक जल र ा था, लडकी टकटकी बािंिे उसी दीपक की ओर देखती थी, और अपना अिंगूठा चसू ने में मग्न थी। चभु -चभु की आवाज आ र ी थी। उसका मखु मुरझाया ुआ था, पर व न रोती थी न ाथ-परै फंे कती थी, बस अगंि ूठा पीने में कसी मग्न थी मानों उसमें सिु ा-रस भरा ुआ ै। व माता के स्तनों की ओर मुंि भी न ींि फे रती थी, मानो उसका उन पर कोई अधिकार ै न ींि, उसके मलए व ांि कोई आशा न ींि। बाबू सा ब को उस पर दया आयी। इस बेचारी का मेरे घर जन्म लेने मंे क्या दोष ै? मुझ पर या इसकी माता पर कु छ भी पड,े उसमंे इसका क्या अपराि ै? म ककतनी ननदगयता कर र े ंै कक कु छ कज्ल्पत अननष्ट के कारण इसका इतना नतरस्कार कर र े ै। मानों कक कु छ अमिंगल ो भी जाय तो क्या उसके भय से इसके प्राण ले मलये जायगंे े। अगर अपरािी ै तो मेरा प्रारब्ि ै। इस नन् ें -से बच्चे के प्रनत मारी कठोरता क्या ईश्वर को अच्छी लगती ोगी? उन् ोनंे उसे गोद में उठा मलया और उसका मुख चूमने लगे। लडकी को कदाधचत ् प ली बार सच्चे स्ने का ज्ञान ुआ। व ाथ-पैर उछाल कर ‘गिूं-गंूि’ करने लगी और दीपक की ओर ाथ फै लाने लगी। उसे जीवन-जयोनत-सी ममल गयी। प्रात:काल दामोदरदत्त ने लडकी को गोद मंे उठा मलया और बा र लाये। स्त्री ने बार-बार क ा-उसे पडी र ने दो। कसी कौन-सी बडी सनु ्दर ै, अभाधगन रात-हदन तो प्राण खाती र ती ैं, मर भी न ींि जाती कक जान छू ट जाय; ककिं तु दामोदरदत्त ने न माना। उसे बा र लाये और अपने बच्चों के साथ बैठकर खेलाने लगे। उनके मकान के सामने थोडी-सी जमीन पडी ुई थी। पडोस के ककसी आदमी की एकबकरी उसमें आकर चरा करती थी। इस समय भी व चर र ी थी। बाबू सा ब ने बडे लडके से क ा-मसद्धू जरा उस बकरी को पकडो, तो इसे दिू वपलाय,ंे शायद भखू ी ै बेचारी! देखो, तुम् ारी नन् ींि-सी ब न ै न? इसे रोज वा मंे खेलाया करो।
मसद्धु को हदल्लगी ाथ आयी। उसका छोटा भाई भी दौडा। दोनो ने घेर कर बकरी को पकडा और उसका कान पकडे ुए सामने लाये। वपता ने मशशु का मिुं बकरी थन मंे लगा हदया। लडकी चुबलाने लगी और एक क्षण में दिू की िार उसके मुंि मंे जाने लगी, मानो हटमहटमाते दीपक मंे तले पड जाये। लडकी का मंिु खखल उठा। आज शायद प ली बार उसकी क्षिु ा तपृ ्त ुई थी। व वपता की गोद में ुमक- ुमक कर खेलने लगी। लडकों ने भी उसे खबू नचाया-कु दाया। उस हदन से मसद्धु को मनोंरजन का एक नया ववषय ममल गया। बालकों को बच्चों से ब ुत प्रेम ोता ै। अगर ककसी घोंसनले मंे धचडडया का बच्चा देख पायंि तो बार-बार व ािं जायगंे े। देखंेगंे कक माता बच्चे को कै से दाना चगु ाती ै। बच्चा कै से चोंच खोलता ैं। कै से दाना लेते समय परों को फडफडाकर कर चें-चंे करता ै। आपस में बडे गम्भीर भाव से उसकी चरचा करंेगे, उपने अन्य साधथयों को ले जाकर उसे हदखायगंे े। मसद्धू ताक में लगा देता, कभी हदन में दो- दो तीन-तीन बा वपलाता। बकरी को भसू ी चोकर खखलाकार कसा परचा मलया कक व स्वयिं चोकर के लोभ से चली आती और दिू देकर चली जाती। इस भािनं त कोई एक म ीना गजु र गया, लडकी हृष्ट-पुष्ट ो गयी, मखु पुष्प के समान ववकमसत ो गया। आखंि ें जग उठीिं, मशशुकाल की सरल आभा मन को रने लगी। माता उसको देख-देख कर चककत ोती थी। ककसी से कु छ क तो न सकती; पर हदल मंे आशंिका ोती थी कक अब व मरने की न ींि, मींि लोगों के मसर जायेगी। कदाधचत ् ईश्वर इसकी रक्षा कर र े ंै, जभी तो हदन-हदन ननखरती आती ै, न ींि, अब तक ईश्वर के घर प ुंिच गयी ोती। 3 मगर दादी माता से क ीिं जयादा धचनंि तत थी। उसे भ्रम ोने लगा कक व बच्चे को खबू दिू वपला र ी ैं, सापंि को पाल र ी ै। मशशु की ओर आंखि उठाकर भी न देखती। य ािं तक कक एक हदन क बैठी-लडकी का बडा छो करती ो? ािं
भाई, मािं ो कक न ींि, तमु न छो करोगी, तो करेगा कौन? ‘अम्मा जी, ईश्वर जानते ैं जो मंै इसे दिू वपलाती ोऊंि ?’ ‘अरे तो मंै मना थोडे ी करती ूिं, मझु े क्या गरज पडी ै कक मुफ्त में अपने ऊपर पाप ल,ंूि कु छ मेरे मसर तो जायेगी न ीं।ि ’ ‘अब आपको ववश्वास ी न आये तो क्या करें ?’ ‘मुझे पागल समझती ो, व वा पी-पी कर कसी ो र ी ै?’ ‘भगवान ् जाने अम्मा, मुझे तो अचरज ोता ै।’ ब ू ने ब ुत ननदोवषता जतायी; ककंि तु वदृ ्धा सास को ववश्वास न आया। उसने समझा, व मेरी शंिका को ननमलूग समझती ै, मानों मझु े इस बच्ची से कोई बैर ै। उसके मन मंे य भाव अकिं ु ररत ोने लगा कक इसे कु छ ो जोये तब य समझे कक मंै झूठ न ीिं क ती थी। व ज्जन प्राखणयों को अपने प्राणों से भी अधिक समझती थी।िं उन् ीिं लोगों की अमिगं ल कामना करने लगी, के वल इसमलए कक मेरी शिंकाएिं सत्य ा जायंि। व य तो न ींि चा ती थी कक कोई मर जाय; पर इतना अवश्य चा ती थी कक ककसी के ब ाने से मंै चते ा दिंू कक देखा, तमु ने मेरा क ा न माना, य उसी का फल ै। उिर सास की ओर से जयो-जयों य द्वषे -भाव प्रकट ोता था, ब ू का कन्या के प्रनत स्ने बढ़ता था। ईश्वर से मनाती र ती थी कक ककसी भांिनत एक साल कु शल से कट जाता तो इनसे पछू ती। कु छ लडकी का भोला-भाला चे रा, कु छ अपने पनत का प्रेम-वात्सल्य देखकर भी उसे प्रोत्सा न ममलता था। ववधचत्र दशा ो र ी थी, न हदल खोलकर प्यार ी कर सकती थी, न सम्पणू ग रीनत से ननदगय ोते ी बनता था। न िंसते बनता था न रोत।े
इस भांिनत दो म ीने और गजु र गये और कोई अननष्ट न ुआ। तब तो वदृ ्धा सासव के पेट मंे चू ंे दौडने लगे। ब ू को दो-चार हदन जवर भी न ीिं जाता कक मेरी शंिका की मयादग ा र जाये। पतु ्र भी ककसी हदन पैरगाडी पर से न ीिं धगर पडता, न ब ू के मैके ी से ककसी के स्वगवग ास की सनु ावनी आती ै। एक हदन दामोदरदत्त ने खुले तौर पर क भी हदया कक अम्मा, य सब ढकोसला ै, तंेतरे लडककयांि क्या दनु नया मंे ोती ी न ींि, तो सब के सब मांि-बाप मर ी जाते ै? अंित मंे उसने अपनी शंिकाओिं को यथाथग मसद्ध करने की एक तरकीब सोच ननकाली। एक हदन दामोदरदत्त स्कू ल से आये तो देखा कक अम्मा जी खाट पर अचते पडी ुई ंै, स्त्री अगंि ीठी मंे आग रखे उनकी छाती सकंे र ी ैं और कोठरी के द्वार और खखडककयािं बंिद ै। घबरा कर क ा-अम्मा जी, क्या दशा ै? स्त्री-दोप र ी से कलेजे मंे एक शूल उठ र ा ै, बेचारी ब ुत तडफ र ी ै। दामोदर-मंै जाकर ड क्टर सा ब को बुला लाऊंि न.? देर करने से शायद रोग बढ़ जाय। अम्मा जी, अम्मा जी कै सी तबबयत ै? माता ने आिखं े खोलींि और करा ते ुए बोली-बेटा तमु आ गये? अब न बचगिंू ी, ाय भगवान,् अब न बचगिंू ी। जैसे कोई कलेजे मंे बरछी चुभा र ा ो। कसी पीडा कभी न ुई थी। इतनी उम्र बीत गयी, कसी पीडा कभी न ुई। स्त्री-व कलमु ी छोकरी न जाने ककस मन ूस घडी में पदै ा ुई। सास-बेटा, सब भगवान करते ै, य बेचारी क्या जान!े देखो मैं मर जाऊिं तो उसे कश्ट मत देना। अच्छा ुआ मेरे मसर आयीिं ककसी कके मसर तो जाती ी, मेरे ी मसर स ी। ाय भगवान, अब न बचिंगू ी। दामोदर-जाकर ड क्टर बलु ा लाऊिं ? अभ्भी लौटा आता ूिं। माता जी को के वल अपनी बात की मयागदा ननभानी थी, रूपये न खच्र कराने थे, बोली-न ीिं बेटा, ड क्टर के पास जाकर क्या करोगे? अरे, व कोई ईश्वर ै। ड क्टर
के पास जाकर क्या करोगंे? अरे, व कोई ईश्वर ै। ड क्टर अमतृ वपला देगा, दस- बीस व भी ले जायेगा! ड क्टर-वैद्य से कु छ न ोगा। बेटा, तुम कपडे उतारो, मेरे पास बैठकर भागवत पढ़ो। अब न बचूंगि ी। अब न बचंगिू ी, ाय राम! दामोदर-तेंतर बुरी चीज ै। मंै समझता था कक ढकोसला ै। स्त्री-इसी से मैं उसे कभी न ीिं लगाती थी। माता-बेटा, बच्चों को आराम से रखना, भगवान तुम लोगों को सुखी रखंे। अच्छा ुआ मेरे ी मसर गयी, तुम लोगों के सामने मेरा परलोक ो जायेगा। क ींि ककसी दसू रे के मसर जाती तो क्या ोता राम! भगवान ् ने मेरी ववनती सुन ली। ाय! ाय!! दामोदरदत्त को ननश्चय ो गया कक अब अम्मा न बचंेगी। बडा द:ु ख ुआ। उनके मन की बात ोती तो व मांि के बदले तंेतर को न स्वीकार करत।े ज्जस जननी ने जन्म हदया, नाना प्रकार के कष्ट झले कर उनका पालन-पोषण ककया, अकाल वैिव्य को प्राप्त ोकर भी उनकी मशक्षा का प्रबििं ककया, उसके सामने एक दिु मु ींि बच्ची का कया मलू ्य था, ज्जसके ाथ का एक धगलास पानी भी व न जानते थ।े शोकातरु ो कपडे उतारे और मािं के मसर ाने बठै कर भागवत की कथा सुनाने लगे। रात को ब ू भोजन बनाने चली तो सास से बोली-अम्मा जी, तमु ् ारे मलए थोडा सा साबदू ाना छोड दंि?ू माता ने व्यगिं ्य करके क ा-बेटी, अन्य बबना न मारो, भला साबदू ाना मझु से खया जायेगा; जाओंि, थोडी परू रयांि छान लो। पड-े पडे जो कु छ इच्छा ोगी, खा लंगिू ी, कचौररयािं भी बना लेना। मरती ूंि तो भोजन को तरस-तरस क्यों मरूंि । थोडी मलाई भी मगंि वा लेना, चौक की ो। कफर थोडे खाने आऊिं गी बेटी। थोडे-से के ले मंिगवा लेना, कलेजे के ददग में के ले खाने से आराम ोता ै।
भोजन के समय पीडा शाितं ो गयी; लेककन आि घटंि े बाद कफर जोर से ोने लगी। आिी रात के समय क ीिं जाकर उनकी आिखं लगी। एक सप्ता तक उनकी य ी दशा र ी, हदन-भर पडी करा ा करतींि बस भोजन के समय जरा वदे ना कम ो जाती। दामोदरदत्त मसर ाने बैठे पंखि ा झलते और मातवृ वयोग के आगत शोक से रोत।े घर की म री ने मु ल्ले-भर मंे एक खबर फै ला दी; पडोमसनंे देखने आयीिं, तो सारा इलजाम बामलका के मसर गया। एक ने क ा-य तो क ो बडी कु शल ुई कक बहु ढ़या के मसर गयी; न ीिं तो तंेतर मांि-बाप दो मंे से एक को लेकर तभी शािंत ोती ै। दैव न करे कक ककसी के घर तेंतर का जन्म ो। दसू री बोली-मेरे तो तेंतर का नाम सनु ते ी रोयें खडे ो जाते ै। भगवान ् बाझिं रखे पर तेंतर का जन्म न दें। एक सप्ता के बाद वदृ ्धा का कष्ट ननवारण ुआ, मरने मंे कोई कसर न थी, व तो क ों परु ूखाओिं का पुण्य-प्रताप था। ब्राह्मणों को गोदान हदया गया। दगु ा-ग पाठ ुआ, तब क ींि जाके सिकं ट कटा। ***
नैराश्य बाज आदमी अपनी स्त्री से इसमलए नाराज र ते ैं कक उसके लडककयािं ी क्यों ोती ंै, लडके क्यों न ीिं ोत।े जानते ंै कक इनमंे स्त्री को दोष न ीिं ै, या ै तो उतना ी ज्जतना मेरा, कफर भी जब देखखए स्त्री से रूठे र ते ंै, उसे अभाधगनी क ते ैं और सदैव उसका हदल दखु ाया करते ंै। ननरुपमा उन् ी अभाधगनी ज्स्त्रयों में थी और घमंडि ीलाल बत्रपाठी उन् ींि अत्याचारी परु ुषों में। ननरुपमा के तीन बेहटयािं लगातार ुई थींि और व सारे घर की ननगा ों से धगर गयी थी। सास-ससुर की अप्रसन्नता की तो उसे ववशषे धचतिं ा न थी, व परु ाने जमाने के लोग थे, जब लडककयािं गरदन का बोझ और पूवजग न्मों का पाप समझी जाती थीिं। ांि, उसे द:ु ख अपने पनतदेव की अप्रसन्नता का था जो पढ़े-मलखे आदमी ोकर भी उसे जली-कटी सुनाते र ते थ।े प्यार करना तो दरू र ा, ननरुपमा से सीिे मुिं बात न करते, कई-कई हदनों तक घर ी मंे न आते और आते तो कु छ इस तर खखचिं े-तने ुए र ते कक ननरुपमा थर-थर कापंि ती र ती थी, क ींि गरज न उठें । घर मंे िन का अभाव न था; पर ननरुपमा को कभी य सा स न ोता था कक ककसी सामान्य वस्तु की इच्छा भी प्रकट कर सके । व समझती थी, मंे यथाथग में अभाधगनी ूिं, न ीिं तो भगवान ् मेरी कोख मंे लडककयांि ी रचत।े पनत की एक मदृ ु मुस्कान के मलए, एक मीठी बात के मलए उसका हृदय तडप कर र जाता था। य ांि तक कक व अपनी लडककयों को प्यार करते ुए सकु चाती थी कक लोग क ंेगे, पीतल की नथ पर इतना गुमान करती ै। जब बत्रपाठी जी के घर मंे आने का समय ोता तो ककसी-न-ककसी ब ाने से व लडककयों को उनकी आखिं ों से दरू कर देती थी। सबसे बडी ववपज्त्त य थी कक बत्रपाठी जी ने िमकी दी थी कक अब की कन्या ुई तो घर छोडकर ननकल जाऊिं गा, इस नरक में क्षण-भर न ठ रूंि गा। ननरुपमा को य धचतंि ा और भी खाये जाती थी। व मंगि ल का व्रत रखती थी, रवववार, ननजलग ा एकादसी और न जाने ककतने व्रत करती थी। स्नान-पजू ा तो ननत्य का ननयम था; पर ककसी अनुष्ठान से मनोकामना न पूरी ोती थी। ननत्य अव ेलना, नतरस्कार, उपेक्षा, अपमान स ते-
स ते उसका धचत्त संसि ार से ववरक्त ोता जाता था। ज ांि कान एक मीठी बात के मलए, आंिखंे एक प्रेम-दृज्ष्ट के मलए, हृदय एक आमलगंि न के मलए तरस कर र जाये, घर में अपनी कोई बात न पछू े , व ांि जीवन से क्यों न अरुधच ो जाय? एक हदन घोर ननराशा की दशा मंे उसने अपनी बडी भावज को एक पत्र मलखा। एक-एक अक्षर से असह्य वेदना टपक र ी थी। भावज ने उत्तर हदया-तमु ् ारे भयै ा जल्द तुम् ें ववदा कराने जायगें े। य ांि आजकल एक सच्चे म ात्मा आये ुए ैं ज्जनका आशीवाद कभी ननष्फल न ींि जाता। य ांि कई संति ान ीन ज्स्त्रयांि उनक आशीवाद से पतु ्रवती ो गयींि। पूणग आशा ै कक तमु ् ंे भी उनका आशीवाद कल्याणकारी ोगा। ननरुपमा ने य पत्र पनत को हदखाया। बत्रपाठी जी उदासीन भाव से बोले-सजृ ्ष्ट- रचना म ात्माओंि के ाथ का काम न ींि, ईश्वर का काम ै। ननरुपमा- ािं, लेककन म ात्माओंि मंे भी तो कु छ मसवद्ध ोती ै। घमडिं ीलाल- ांि ोती ै, पर कसे म ात्माओंि के दशनग दलु भग ैं। ननरुपमा-मंै तो इस म ात्मा के दशगन करुंि गी। घमडंि ीलाल-चली जाना। ननरुपमा-जब बांखि झनों के लडके ुए तो मंै क्या उनसे भी गयी-गुजरी ूिं। घमडंि ीलाल-क तो हदया भाई चली जाना। य करके भी देख लो। मझु े तो कसा मालूम ोता ै, पुत्र का मखु देखना मारे भाग्य मंे ी न ीिं ै। 2 कई हदन बाद ननरुपमा अपने भाई के साथ मकै े गयी। तीनों पबु त्रयांि भी साथ थीिं। भाभी ने उन् ंे प्रेम से गले लगाकर क ा, तमु ् ारे घर के आदमी बडे ननदगयी
ंै। कसी गलु ाब -फू लों की-सी लडककयािं पाकर भी तकदीर को रोते ैं। ये तमु ् ंे भारी ों तो मुझे दे दो। जब ननद और भावज भोजन करके लेटीिं तो ननरुपमा ने पछू ा-व म ात्मा क ािं र ते ंै? भावज-कसी जल्दी क्या ै, बता दिंगू ी। ननरुपमा- ै नगीच ी न? भावज-ब ुत नगीच। जब क ोगी, उन् ें बुला दंिगू ी। ननरुपमा-तो क्या तमु लोगों पर ब ुत प्रसन्न ंै? भावज-दोनों वक्त य ींि भोजन करते ंै। य ींि र ते ंै। ननरुपमा-जब घर ी में वैद्य तो मररये क्यों? आज मझु े उनके दशगन करा देना। भावज-भंेट क्या दोगी? ननरुपमा-मैं ककस लायक ूंि? भावज-अपनी सबसे छोटी लडकी दे देना। ननरुपमा-चलो, गाली देती ो। भावज-अच्छा य न स ी, एक बार उन् ंे प्रेमामलगिं न करने देना। ननरुपमा-चलो, गाली देती ो। भावज-अच्छा य न स ी, एक बार उन् ें प्रेमामलगंि न करने देना। ननरुपमा-भाभी, मझु से कसी िंसी करोगी तो मंै चली आऊिं गी।
भावज-व म ात्मा बडे रमसया ैं। ननरुपमा-तो चूल् े में जायं।ि कोई दषु ्ट ोगा। भावज-उनका आशीवाद तो इसी शतग पर ममलेगा। व और कोई भेंट स्वीकार ी न ीिं करत।े ननरुपमा-तुम तो यों बातंे कर र ी ो मानो उनकी प्रनतननधि ो। भावज- ािं, व य सब ववषय मेरे ी द्वारा तय ककया करते ैं। मैं भेंट लेती ूिं। मंै ी आशीवाद देती ूंि, मंै ी उनके ह ताथग भोजन कर लेती ूंि। ननरुपमा-तो य क ो कक तमु ने मुझे बुलाने के मलए य ीला ननकाला ै। भावज-न ीिं, उनके साथ ी तमु ् ंे कु छ कसे गरु दिंगू ी ज्जससे तमु अपने घर आराम से र ा। इसके बाद दोनों सखखयों मंे कानाफू सी ोने लगी। जब भावज चपु ुई तो ननरुपमा बोली-और जो क ींि कफर क्या ी ुई तो?भावज-तो क्या? कु छ हदन तो शांनि त और सुख से जीवन कटेगा। य हदन तो कोई लौटा न लेगा। पुत्र ुआ तो क ना ी क्या, पतु ्री ुई तो कफर कोई नयी यजु ्क्त ननकाली जायेगी। तुम् ारे घर के जसै े अक्ल के दशु ्मनों के साथ कसी ी चालंे चलने से गजु ारा ै। ननरुपमा-मझु े तो संिकोच मालमू ोता ै। भावज-बत्रपाठी जी को दो-चार हदन मंे पत्र मलख देना कक म ात्मा जी के दशगन ुए और उन् ोंने मुझे वरदान हदया ै। ईश्वर ने चा ा तो उसी हदन से तुम् ारी मान-प्रनतष्ठा ोने लगी। घमिडं ी दौडे ुए आयगें े और तम् ारे ऊपर प्राण ननछावर करंेगे। कम-से-कम साल भर तो चैन की वंिशी बजाना। इसके बाद देखी जायेगी।
ननरुपमा-पनत से कपट करूिं तो पाप न लगेगा? भावज-कसे स्वाधथयग ों से कपट करना पुण्य ै। 3 तीन चार म ीने के बाद ननरुपमा अपने घर आयी। घमडिं ीलाल उसे ववदा कराने गये थ।े सल ज ने म ात्मा जी का रिंग और भी चोखा कर हदया। बोली-कसा तो ककसी को देखा न ीिं कक इस म ात्मा जी ने वरदान हदया ो और व पूरा न ो गया ो। ािं, ज्जसका भाग्य फू ट जाये उसे कोई क्या कर सकता ै। घमंिडीलाल प्रत्यक्ष तो वरदान और आशीवाद की उपेक्षा ी करते र े, इन बातों पर ववश्वास करना आजकल सिकं ोचजनक मालूम ोता ; पर उनके हदल पर असर जरूर ुआ। ननरुपमा की खानतरदाररयािं ोनी शुरू ुईं। जब व गभवग ती ुई तो सबके हदलों में नयी-नयी आशाएंि ह लोरें लेने लगी। सास जो उठते गाली और बठै ते व्यगिं ्य से बातें करती थीिं अब उसे पान की तर फे रती-बेटी, तमु र ने दो, मंै ी रसोई बना लंगूि ी, तमु ् ारा मसर दखु ने लगेगा। कभी ननरुपमा कलसे का पानी या चारपाई उठाने लगती तो सास दौडती-ब ू,र ने दो, मंै आती ूिं, तुम कोई भारी चीज मत उठाया करा। लडककयों की बात और ोती ै, उन पर ककसी बात का असर न ींि ोता, लडके तो गभग ी मंे मान करने लगते ैं। अब ननरुपमा के मलए दिू का उठौना ककया गया, ज्जससे बालक पषु ्ट और गोरा ो। घमिंडी वस्त्राभूषणों पर उतारू ो गये। र म ीने एक-न-एक नयी चीज लात।े ननरुपमा का जीवन इतना सुखमय कभी न था। उस समय भी न ींि जब नवेली विू थी। म ीने गुजरने लगे। ननरूपमा को अनभु तू लक्षणों से ववहदत ोने लगा कक य कन्या ी ै; पर व इस भेद को गुप्त रखती थी। सोचती, सावन की िपू ै, इसका क्या भरोसा ज्जतनी चीज िूप में सखु ानी ो सखु ा लो, कफर तो घटा
छायेगी ी। बात-बात पर बबगडती। व कभी इतनी मानशीला न थी। पर घर में कोई चूिं तक न करता कक क ींि ब ू का हदल न दखु ,े न ींि बालक को कष्ट ोगा। कभी-कभी ननरुपमा के वल घरवालों को जलाने के मलए अनषु ्ठान करती, उसे उन् ें जलाने मंे मजा आता था। व सोचती, तुम स्वाधथयग ों को ज्जतना जलाऊंि उतना अच्छा! तमु मेरा आदर इसमलए करते ो न कक मैं बच्च जनिंगू ी जो तमु ् ारे कु ल का नाम चलायेगा। मैं कु छ न ींि ूिं, बालक ी सब-कु छ ै। मेरा अपना कोई म त्व न ींि, जो कु छ ै व बालक के नात।े य मेरे पनत ैं! प ले इन् ें मझु से ककतना प्रेम था, तब इतने ससिं ार-लोलुप न ुए थ।े अब इनका प्रेम के वल स्वाथग का स्वांगि ै। मैं भी पशु ूंि ज्जसे दिू के मलए चारा-पानी हदया जाता ै। खरै , य ी स ी, इस वक्त तो तमु मेरे काबू मंे आये ो! ज्जतने ग ने बन सकंे बनवा लंूि, इन् ंे तो छीन न लोगे। इस तर दस म ीने पूरे ो गये। ननरुपमा की दोनों ननदें ससुराल से बलु ायी गयीिं। बच्चे के मलए प ले ी सोने के ग ने बनवा मलये गये, दिू के मलए एक सुन्दर दिु ार गाय मोल ले ली गयी, घमंिडीलाल उसे वा खखलाने को एक छोटी- सी सेजगाडी लाये। ज्जस हदन ननरूपमा को प्रसव-वदे ना ोने लगी, द्वार पर पंडि डत जी मु ूतग देखने के मलए बलु ाये गये। एक मीरमशकार बिदं कू छोडने को बलु ाया गया, गायनें मिगं ल-गान के मलए बटोर ली गयी।िं घर से नतल-नतल कर खबर मगंि ायी जाती थी, क्या ुआ? लेडी ड क्टर भी बुलायी गयीं।ि बाजे वाले ुक्म के इिंतजार में बठै े थ।े पामर भी अपनी सारंिगी मलये ‘जच्चा मान करे नंिदलाल सों’ की तान सनु ाने को तैयार बठै ा था। सारी तैयाररयांि; सारी आशाएिं, सारा उत्सा समारो एक ी शब्द पर अवलज्म्ब था। जयों-जयों देर ोती थी लोगों मंे उत्सुकता बढ़ती जाती थी। घमंिडीलाल अपने मनोभावों को नछपाने के मलए एक समाचार -पत्र देख र े थे, मानो उन् ें लडका या लडकी दोनों ी बराबर ैं। मगर उनके बढू ़े वपता जी इतने साविान न थ।े उनकी पीछंे खखली जाती थीिं, ंिस- िंस कर सबसे बात कर र े थे और पसै ों की एक थैली को बार-बार उछालते थे। मीरमशकार ने क ा-मामलक से अबकी पगडी दपु ट्टा लिगूं ा।
वपताजी ने खखलकर क ा-अबे ककतनी पगडडयांि लेगा? इतनी बेभाव की दंिगू ा कक सर के बाल गिंजे ो जायगंे े। पामर बोला-सरकार अब की कु छ जीववका लूि।ं वपताजी खखलकर बोले-अबे ककतनी खायेगा; खखला-खखला कर पेट फाड दंिगू ा। स सा म री घर मंे से ननकली। कु छ घबरायी-सी थी। व अभी कु छ बोलने भी न पायी थी कक मीरमशकार ने बन्दकू फै र कर ी तो दी। बन्दकू छू टनी थी कक रोशन चौकी की तान भी नछड गयी, पामर भी कमर कसकर नाचने को खडा ो गया। म री-अरे तुम सब के सब भगिं खा गये ो गया? मीरमशकार-क्या ुआ? म री- ुआ क्या लडकी ी तो कफर ुई ै? वपता जी-लडकी ुई ै? य क ते-क ते व कमर थामकर बैठ गये मानो वज्र धगर पडा। घमंडि ीलाल कमरे से ननकल आये और बोले-जाकर लेडी डाक्टर से तो पछू । अच्छी तर देख न ले। देखा सनु ा, चल खडी ुई। म री-बाबजू ी, मनैं े तो आखंि ों देखा ै! घमडिं ीलाल-कन्या ी ै? वपता- मारी तकदीर ी कसी ै बेटा! जाओ रे सब के सब! तुम सभी के भाग्य में कु छ पाना न मलखा था तो क ांि से पात।े भाग जाओ। सकैं डों रुपये पर पानी कफर गया, सारी तैयारी ममट्टी में ममल गयी।
घमिडं ीलाल-इस म ात्मा से पूछना चाह ए। मैं आज डाक से जरा बचा की खबर लेता ूंि। वपता-ितू ग ै, ितू !ग घमिडं ीलाल-मंै उनकी सारी ितू गता ननकाल दिंगू ा। मारे डडिं ों के खोपडी न तोड दिंू तो कह एगा। चािडं ाल क ींि का! उसके कारण मेरे सकंै डों रुपये पर पानी कफर गया। य सेजगाडी, य गाय, य पलना, य सोने के ग ने ककसके मसर पटकंिू । कसे ी उसने ककतनों ी को ठगा ोगा। एक दफा बचा ी मरम्मत ो जाती तो ठीक ो जात।े वपता जी-बेटा, उसका दोष न ींि, अपने भाग्य का दोष ै। घमडिं ीलाल-उसने क्यों क ा कसा न ीिं ोगा। औरतों से इस पाखंिड के मलए ककतने ी रुपये किंठे ोंगे। व सब उन् ंे उगलना पडगे ा, न ीिं तो पुमलस में रपट कर दंिगू ा। काननू मंे पाखिंड का भी तो दंिड ै। मैं प ले ी चौंका था कक ो न ो पाखंिडी ै; लेककन मेरी सल ज ने िोखा हदया, न ींि तो मैं कसे पाज्जयों के पंिजे में कब आने वाला था। एक ी सअु र ै। वपताजी-बेटा सब्र करो। ईश्वर को जो कु छ मिजं रू था, व ुआ। लडका-लडकी दोनों ी ईश्वर की देन ै, ज ािं तीन ैं व ािं एक और स ी। वपता और पुत्र मंे तो य बातें ोती र ींि। पामर, मीरमशकार आहद ने अपने-अपने डडंि े सिभं ाले और अपनी रा चले। घर मंे मातम-सा छा गया, लेडी ड क्टर भी ववदा कर दी गयी, सौर में जच्चा और दाई के मसवा कोई न र ा। वदृ ्धा माता तो इतनी ताश ुई कक उसी वक्त अटवास-खटवास लेकर पड र ी।ंि जब बच्चे की बर ी ो गयी तो घमंिडीलाल स्त्री के पास गये और सरोष भाव से बोले-कफर लडकी ो गयी!
ननरुपमा-क्या करूिं , मेरा क्या बस? घमंडि ीलाल-उस पापी िूतग ने बडा चकमा हदया। ननरुपमा-अब क्या क ंे, मेरे भाग्य ी मंे न ोगा, न ींि तो व ांि ककतनी ी औरतें बाबाजी को रात-हदन घेरे र ती थी।ंि व ककसी से कु छ लेते तो क ती कक िूतग ैं, कसम ले लो जो मनंै े एक कौडी भी उन् ंे दी ो। घमडिं ीलाल-उसने मलया या न मलया, य ािं तो हदवाला ननकल गया। मालमू ो गया तकदीर मंे पतु ्र न ीिं मलखा ै। कु ल का नाम डू बना ी ै तो क्या आज डू बा, क्या दस साल बाद डू बा। अब क ीिं चला जाऊिं गा, गृ स्थी में कौन-सा सुख रखा ै। व ब ुत देर तक खडे-खडे अपने भाग्य को रोते र े; पर ननरुपमा ने मसर तक न उठाया। ननरुपमा के मसर कफर व ी ववपज्त्त आ पडी, कफर व ी ताने, व ी अपमान, व ी अनादर, व ी छीछालेदार, ककसी को धचतंि ा न र ती कक खाती-पीती ै या न ींि, अच्छी ै या बीमार, दखु ी ै या सुखी। घमडंि ीलाल यद्यवप क ींि न गये, पर ननरूपमा को य ी िमकी प्राय: ननत्य ी ममलती र ती थी। कई म ीने यों ी गजु र गये तो ननरूपमा ने कफर भावज को मलखा कक तमु ने और भी मुझे ववपज्त्त मंे डाल हदया। इससे तो प ले ी भली थी। अब तो काई बात भी न ीिं पूछता कक मरती ै या जीती ै। अगर य ी दशा र ी तो स्वामी जी चा े सिंन्यास लंे या न लें, लेककन मैं सिसं ार को अवश्य त्याग दंिगू ी। 4 भाभी य पत्र पाकर पररज्स्थनत समझ गयी। अबकी उसने ननरुपमा को बुलाया न ीिं, जानती थी कक लोग ववदा ी न करेंगे, पनत को लेकर स्वयिं आ प ुंिची।
उसका नाम सुके शी था। बडी ममलनसार, चतरु ववनोदशील स्त्री थी। आते ी आते ननरुपमा की गोद मंे कन्या देखी तो बोली-अरे य क्या? सास-भाग्य ै और क्या? सकु े शी-भाग्य कै सा? इसने म ात्मा जी की बातंे भलु ा दी ोंगी। कसा तो ो ी न ीिं सकता कक व मंिु से जो कु छ क दंे, व न ो। क्यों जी, तुमने मगंि ल का व्रत रखा? ननरुपमा-बराबर, एक व्रत भी न छोडा। सुके शी-पांचि ब्राह्मणों को मगंि ल के हदन भोजन कराती र ी? ननरुपमा-य तो उन् ोंने न ीिं क ा था। सकु े शी-तमु ् ारा मसर, मझु े खबू याद ै, मेरे सामने उन् ोंने ब ुत जोर देकर क ा था। तुमने सोचा ोगा, ब्राह्मणों को भोजन कराने से क्या ोता ै। य न समझा कक कोई अनषु ्ठान सफल न ीिं ोता जब तक ववधिवत ् उसका पालन न ककया जाये। सास-इसने कभी इसकी चचाग ी न ींि की;न ींि;पाचंि क्या दस ब्राह्मणों को ज्जमा देती। तुम् ारे िमग से कु छ कमी न ीिं ै। सुके शी-कु छ न ीिं, भलू ो गयी और क्या। रानी, बेटे का मिंु यों देखना नसीब न ीिं ोता। बडे-बडे जप-तप करने पडते ैं, तमु मिंगल के व्रत ी से घबरा गयींि? सास-अभाधगनी ै और क्या? घमडिं ीलाल-कसी कौन-सी बडी बातंे थींि, जो याद न र ीिं? व म लोगों को जलाना चा ती ै।
सास-व ी तो क ूंि कक म ात्मा की बात कै से ननष्फल ुई। य ांि सात बरसों ते ‘तलु सी माई’ को हदया चढ़ाया, जब जा के बच्चे का जन्म ुआ। घमिंडीलाल-इन् ोंने समझा था दाल-भात का कौर ै! सुके शी-खैर, अब जो ुआ सो ुआ कल मंगि ल ै, कफर व्रत रखो और अब की सात ब्राह्मणों को ज्जमाओ, देखें, कै से म ात्मा जी की बात न ींि परू ी ोती। घमिंडीलाल-व्यथग ै, इनके ककये कु छ न ोगा। सुके शी-बाबजू ी, आप ववद्वान समझदार ोकर इतना हदल छोटा करते ंै। अभी आपककी उम्र क्या ै। ककतने पुत्र लीज्जएगा? नाकों दम न ो जाये तो कह एगा। सास-बेटी, दिू -पूत से भी ककसी का मन भरा ै। सकु े शी-ईश्वर ने चा ा तो आप लोगों का मन भर जायेगा। मेरा तो भर गया। घमंडि ीलाल-सुनती ो म ारानी, अबकी कोई गोलमोल मत करना। अपनी भाभी से सब ब्योरा अच्छी तर पछू लेना। सुके शी-आप ननज्श्चंित र ें, मंै याद करा दिंगू ी; क्या भोजन करना ोगा, कै से र ना ोगा कै से स्नान करना ोगा, य सब मलखा दंिगू ी और अम्मा जी, आज से अठार मास बाद आपसे कोई भारी इनाम लिंूगी। सकु े शी एक सप्ता य ांि र ी और ननरुपमा को खूब मसखा-पढ़ा कर चली गयी। 5 ननरुपमा का एकबाल कफर चमका, घमंिडीलाल अबकी इतने आश्वामसत से रानी ुई, सास कफर उसे पान की भानिं त फे रने लगी, लोग उसका मुंि जो ने लगे।
हदन गजु रने लगे, ननरुपमा कभी क ती अम्मािं जी, आज मनैं े स्वप्न देखा कक वदृ ्ध स्त्री ने आकर मझु े पुकारा और एक नाररयल देकर बोली, ‘य तुम् ें हदये जाती ूंि; कभी क ती,’अम्मांि जी, अबकी न जाने क्यों मेरे हदल मंे बडी-बडी उमिगं ें पदै ा ो र ी ंै, जी चा ता ै खूब गाना सनु ंूि, नदी में खूब स्नान करूिं , रदम नशा-सा छाया र ता ै। सास सुनकर मसु ्कराती और क ती-ब ू ये शुभ लक्षण ंै। ननरुपमा चुपके -चुपके माजरू मिगं ाकर खाती और अपने असल नेत्रों से ताकते ुए घमिंडीलाल से पूछती-मेरी आखंि ें लाल ंै क्या? घमडंि ीलाल खशु ोकर क ते-मालूम ोता ै, नशा चढ़ा ुआ ै। ये शुभ लक्षण ैं। ननरुपमा को सुगिंि ों से कभी इतना प्रेम न था, फू लों के गजरों पर अब व जान देती थी। घमिंडीलाल अब ननत्य सोते समय उसे म ाभारत की वीर कथाएिं पढ़कर सुनाते, कभी गुरु गोववदिं मसंि कीनतग का वणनग करत।े अमभमन्यु की कथा से ननरुपमा को बडा प्रेम था। वपता अपने आने वाले पतु ्र को वीर-ससंि ्कारों से पररपरू रत कर देना चा ता था। एक हदन ननरुपमा ने पनत से क ा-नाम क्या रखोगे? घमडिं ीलाल-य तो तमु ने खबू सोचा। मुझे तो इसका ध्यान ी न र ा। कसा नाम ोना चाह ए ज्जससे शौयग और तजे टपके । सोचो कोई नाम। दोनों प्राणी नामों की व्याख्या करने लगे। जोरावरलाल से लके र ररश्चन्द्र तक सभी नाम धगनाये गये, पर उस असामान्य बालक के मलए कोई नाम न ममला। अिंत मंे पनत ने क ा तगे ब ादरु कै सा नाम ै। ननरुपमा-बस-बस, य ी नाम मुझे पसन्द ै?
घमिडं ी लाल-नाम ी तो सब कु छ ै। दमडी, छकौडी, घरु ू, कतवारू, ज्जसके नाम देखे उसे भी ‘यथा नाम तथा गणु ’ ी पाया। मारे बच्चे का नाम ोगा तगे ब ादरु । 6 प्रसव-काल आ प ुंिचा। ननरुपमा को मालूम था कक क्या ोने वाली ै; लेककन बा र मंगि लाचरण का परू ा सामान था। अबकी ककसी को लेशमात्र भी सिंदे न था। नाच, गाने का प्रबििं भी ककया गया था। एक शाममयाना खडा ककया गया था और ममत्रगण उसमें बैठे खशु -गज्प्पयािं कर र े थे। लवाई कडाई से परू रयािं और ममठाइयािं ननकाल र ा था। कई बोरे अनाज के रखे ुए थे कक शुभ समाचार पाते ी मभक्षकु ों को बाटंि े जाय।ंे एक क्षण का भी ववलम्ब न ो, इसमलए बोरों के मिुं खोल हदये गये थे। लेककन ननरुपमा का हदल प्रनतक्षण बैठा जाता था। अब क्या ोगा? तीन साल ककसी तर कौशल से कट गये और मजे मंे कट गये, लेककन अब ववपज्त्त मसर पर मिडं रा र ी ै। ाय! ननरपराि ोने पर भी य ी दंिड! अगर भगवान ् की इच्छा ै कक मेरे गभग से कोई पुत्र न जन्म ले तो मेरा क्या दोष! लेककन कौन सनु ता ै। मंै ी अभाधगनी ूिं मंै ी त्याजय ूिं मंै ी कलमंिु ी ूिं इसीमलए न कक परवश ूिं! क्या ोगा? अभी एक क्षण मंे य सारा आनिदं ात्सव शोक मंे डू ब जायेगा, मझु पर बौछारें पडने लगंेगी, भीतर से बा र तक मझु ी को कोसेंगे, सास-ससुर का भय न ींि, लेककन स्वामी जी शायद कफर मेरा मुिं न देखें, शायद ननराश ोकर घर-बार त्याग दंे। चारों तरफ अमगंि ल ी अमंगि ल ंै मैं अपने घर की, अपनी सतिं ान की ददु गशा देखने के मलए क्यों जीववत ूिं। कौशल ब ुत ो चुका, अब उससे कोई आशा न ी।ंि मेरे हदल में कै से-कै से अरमान थ।े अपनी प्यारी बज्च्चयों का लालन- पालन करती, उन् ें ब्या ती, उनके बच्चों को देखकर सखु ी ोती। पर आ ! य सब अरमान झाक में ममले जाते ैं। भगवान!् तुम् ी अब इनके वपता ो, तमु ् ींि इनके रक्षक ो। मैं तो अब जाती ूंि।
लेडी ड क्टर ने क ा-वेल! कफर लडकी ै। भीतर-बा र कु राम मच गया, वपट्टस पड गयी। घमंिडीलाल ने क ा-ज न्नमु मंे जाये कसी ज्जंदि गी, मौत भी न ीिं आ जाती! उनके वपता भी बोले-अभाधगनी ै, वज्र अभाधगनी! मभक्षुकों ने क ा-रोओ अपनी तकदीर को म कोई दसू रा द्वार देखते ंै। अभी य शोकादगार शािंत न ोने पाया था कक ड क्टर ने क ा मािं का ाल अच्छा न ीिं ै। व अब न ीिं बच सकती। उसका हदल बदिं ो गया ै। ***
दंड सधिं ्या का समय था। कच री उठ गयी थी। अ लकार चपरासी जेबंे खनखनाते घर जा र े थे। मे तर कू डे टटोल र ा था कक शायद क ीिं पैसे ममल जाय।ंे कच री के बरामदों में सािंडों ने वकीलों की जग ले ली थी। पेडों के नीचे मु ररगरों की जग कु त्ते बठै े नजर आते थे। इसी समय एक बूढ़ा आदमी, फटे- पुराने कपडे प ने, लाठी टेकता ुआ, जंिट सा ब के बंगि ले पर प ुिंचा और सायबान मंे खडा ो गया। जिटं सा ब का नाम था ममस्टर जी0 मसन ा। अरदली ने दरू ी से ललकारा—कौन सायबान में खडा ै? क्या चा ता ै। बढू ़ा—गरीब बाम् ान ूंि भैया, सा ब से भंेट ोगी? अरदली—सा ब तुम जसै ों से न ींि ममला करत।े बूढ़े ने लाठी पर अकड कर क ा—क्यों भाई, म खडे ंै या डाकू -चोर ंै कक मारे मुिं मंे कु छ लगा ुआ ै? अरदली—भीख मांिग कर मुकदमा लडने आये ोंगे? बढू ़ा—तो कोई पाप ककया ै? अगर घर बेचकर न ींि लडते तो कु छ बरु ा करते ैं? य ांि तो मकु दमा लडते-लडते उमर बीत गयी; लेककन घर का पसै ा न ींि खरचा। ममयांि की जतू ी ममयांि का मसर करते ंै। दस भलेमानसों से मािंग कर एक को दे हदया। चलो छु ट्टी ुई। गांवि भर नाम से कािंपता ै। ककसी ने जरा भी हटर-वपर की और मनैं े अदालत मंे दावा दायर ककया। अरदली—ककसी बडे आदमी से पाला न ींि पडा अभी? बूढ़ा—अजी, ककतने ी बडों को बडे घर मभजवा हदया, तमू ो ककस फे र में। ाई-कोटग तक जाता ूिं सीिा। कोई मेरे मिुं क्या आयेगा बेचारा! गांवि से तो
कौडी जाती न ीिं, कफर डरें क्यों? ज्जसकी चीज पर दातिं लगाये, अपना करके छोडा। सीिे न हदया तो अदालत में घसीट लाये और रगेद-रगेद कर मारा, अपना क्या बबगडता ै? तो सा ब से उत्तला करते ो कक मैं ी पुकारूंि ? अरदली ने देखा; य आदमी यों टलनेवाला न ीिं तो जाकर सा ब से उसकी इत्तला की। सा ब ने ुमलया पछू ा और खुश ोकर क ा—फौरन बुला लो। अरदली— जरू , बबलकु ल फटे ाल ै। सा ब—गदु डी ी मंे लाल ोते ैं। जाकर भेज दो। ममस्टर मसन ा अिडे आदमी थे, ब ुत ी शांित, ब ुत ी ववचारशील। बातंे ब ुत कम करते थे। कठोरता और असभ्यता, जो शासन की अंगि समझी जाती ैं, उनको छु भी न ींि गयी थी। न्याय और दया के देवता मालूम ोते थ।े डील- डौल देवों का-सा था और रिंग आबनूस का-सा। आराम-कु सी पर लेटे ुए पेचवान पी र े थे। बूढ़े ने जाकर सलाम ककया। मसन ा—तमु ो जगत पाडंि !े आओ बठै ो। तुम् ारा मुकदमा तो ब ुत ी कमजोर ै। भले आदमी, जाल भी न करते बना? जगत—कसा न क ें जूर, गरीब आदमी ूिं, मर जाऊिं गा। मसन ा—ककसी वकील मखु ्तार से सला भी न ले ली? जगत—अब तो सरकार की सरन मंे आया ूिं। मसन ा—सरकार क्या मममसल बदल दंेगे; या नया कानून गढ़ंेगे? तुम गच्चा खा गये। मैं कभी कानून के बा र न ीिं जाता। जानते ो न अपील से कभी मेरी तजवीज रद्द न ीिं ोती?
जगत—बडा िरम ोगा सरकार! (मसन ा के परै ों पर धगज्न्नयों की एक पोटली रखकर) बडा दखु ी ूिं सरकार! मसन ा—(मसु ्करा कर) य ािं भी अपनी चालबाजी से न ींि चूकत?े ननकालो अभी और, ओस से प्यास न ीिं बझु ती। भला द ाई तो परू ा करो। जगत—ब ुत तिंग ूिं दीनबििं !ु मसन ा—डालो-डालो कमर मंे ाथ। भला कु छ मेरे नाम की लाज तो रखो। जगत—लटु जाऊिं गा सरकार! मसन ा—लुटंे तमु ् ारे दशु ्मन, जो इलाका बेचकर लडते ैं। तुम् ारे जजमानों का भगवान भला करे, तमु ् ें ककस बात की कमी ै। ममस्टर मसन ा इस मामले में जरा भी ररयायत न करते थे। जगत ने देखा कक य ाँा काइयािपं न से काम चलेगा तो चपु के से 4 धगज्न्नयांि और ननकालींि। लेककन उन् ंे ममस्टर मसन ा के पैरों रखते समय उसकी आखंि ों से खून ननकल आया। य उसकी बरसों की कमाई थी। बरसों पेट काटकर, तन जलाकर, मन बािंिकर, झुठी गवाह यािं देकर उसने य थाती सचंि य कर पायी थी। उसका ाथों से ननकलना प्राण ननकलने से कम दखु दायी न था। जगत पांिडे के चले जाने के बाद, कोई 9 बजे रात को, जिंट सा ब के बगिं ले पर एक तांिगा आकर रुका और उस पर से पंडि डत सत्यदेव उतरे जो राजा सा ब मशवपरु के मुख्तार थ।े ममस्टर मसन ा ने मसु ्कराकर क ा—आप शायद अपने इलाके में गरीबों को न र ने देंगे। इतना जलु ्म!
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