Important Announcement
PubHTML5 Scheduled Server Maintenance on (GMT) Sunday, June 26th, 2:00 am - 8:00 am.
PubHTML5 site will be inoperative during the times indicated!

Home Explore Bargad Ka Ped_Final(29.09.2018) (1)

Bargad Ka Ped_Final(29.09.2018) (1)

Published by 1303mansi, 2020-04-05 15:18:48

Description: Bargad Ka Ped_Final(29.09.2018) (1)

Search

Read the Text Version

I N DI A SINGAPORE MALAYSI A

Notion Press Old No. 38, New No. 6 McNichols Road, Chetpet Chennai - 600 031 First Published by Notion Press 2018 Copyright © Tejas 2018 All Rights Reserved. ISBN 978-1-64429-552-6 This book has been published with all efforts taken to make the material error-free after the consent of the author. However, the author and the publisher do not assume and hereby disclaim any liability to any party for any loss, damage, or disruption caused by errors or omissions, whether such errors or omissions result from negligence, accident, or any other cause. No part of this book may be used, reproduced in any manner whatsoever without written permission from the author, except in the case of brief quotations embodied in critical articles and reviews.

अनकु ्रमणिका अनकही शरु ुआत........................................................... vii यादें...............................................................................1 गमु समु .........................................................................2 ये मैं हूँ या तुम हो.........................................................3 सोता शहर.....................................................................4 नहीं पता.......................................................................5 छोटू ..............................................................................6 आख़री पड़ाव यादें...............................................................................9 बरगद का पेड़..............................................................11 इंतज़ार........................................................................ 13 उखड़ी सासँ ंे ................................................................15 सन्नाटे शोर करते हैं.....................................................17 रद्दी.............................................................................19 डायरी..........................................................................21 पत्थर, एक दोस्त मेरा..................................................23 एहसास को जीने दो......................................................25 गुमसमु .......................................................................27 उम्मीद बड़ी है..............................................................29 जाओ तमु ....................................................................31 साथ सपने देखे थे........................................................33

अनुक्रमणिका ज़वाब..........................................................................34 मेरी कहानी..................................................................35 वो बारिश अब नहीं आती..............................................36 शायद सकु ू न मिले मझु े तब...........................................37 सबेरा फिर नहीं आया....................................................39 अनकही दास्ताँ.............................................................40 मेरे पाने तमु ्हारे खोने मंे................................................41 ये मैं हूँ या तुम हो.......................................................43 उदास पानी..................................................................46 फिर मिले हाथँ उनके हाथों से........................................48 खर्रटा े..........................................................................49 मेरे जैसे हो तमु ...........................................................51 चाँद बड़ा धुंधला सा था.................................................54 निःशब्द हँसी................................................................56 जसै ा तमु ने देखा था......................................................58 आशियाना ढूंढता दिल...................................................60 एक लम्हा....................................................................61 एक प्याली चाय...........................................................63 सलु गता चाँद................................................................64 बड़े झूठे हो तमु ............................................................66 सफ़र...........................................................................68 सोता शहर...................................................................69 मायाजाल..................................................................... 71 चलो गंगा नहा आय.ंे ....................................................73 शहर...........................................................................75 लाल बत्ती का इंतज़ार..................................................77 न कोई भगवान अब होगा.............................................80 iv

अनकु ्रमणिका उनकी हैवानियत...........................................................82 तुम वहीं थे..................................................................84 नहीं पता.....................................................................86 मनंै े खुदा बदल डाला.....................................................87 काल...........................................................................88 साइकिल...................................................................... 90 रिश्ते...........................................................................92 इश्क़ का परचम...........................................................94 सपनो का बोझ ...........................................................97 वक़्त दर्ज़ी है................................................................98 आधा इश्क़...................................................................99 वो चार लोग..............................................................101 छोटू ..........................................................................103 चाँद निकल आया है...................................................105 तमु ्हारे लफ़्ज़..............................................................106 तलाश.......................................................................107 दो चेहरे.....................................................................108 अनाड़ी....................................................................... 109 अधँ ियारा ..................................................................110 तनहा........................................................................ 111 गिरहें ........................................................................ 112 आग लगी है..............................................................113 वीराने........................................................................114 स्वेटर की तरह...........................................................115 आख़री पड़ाव..............................................................116 नाम तजे स................................................................118 v



अनकही शुरुआत हर शाम जागता था म,ंै कु छ कहानियाँ गढ़ने कि कोशिश में किसी शिल्पकार की तरह। कु छ तो हथौड़े की धमक और छे नी की चोट से, बनत-े बनते ही चूरा हो गयीं। कु छ को मंै जब अपने डायरी के पन्नो में रात छोड़ जाता था, ओस के बँदू ों सी सुबह ग़ायब हो जाती थी। बहुत ढूंढा फिर शाम मंे उनको, चिरागों को भी जलाया, पर ओस की बँदू जो ठहरी ढूंढ नहीं पाया। कु छ तो ऐसी थीं जो बनना ही नहीं चाहती थी,ं बहुत धोया नमक के पानी से बहुत रगड़ा पर चमक आयी ही नहीं। कु छ ने तो दशु ्मनी भी निभायी मझु से मेरे हथौड़े की चोट शायद ज्यादा थी, उनकी किरछें हाँथ में चभु गयीं मेरे थोड़ा खनू भी निकल आया था, शायद नया शिल्पकार रास नहीं आया था उन्हंे। आता भी कै से पत्थरों को तराशना सीख रहा था म,ैं कभी चोट ज़ोर की कर देता तो कभी आधी बनने के बाद बीच रास्ते मंे छोड़ देता। कोशिश बदस्तूर जारी थी, कि बन जाये कु छ कहानियां और ओढ़ लँू उनको। छु प जाऊं उनमंे। हर शाम जब मेरी सुबह होती थी, फिर से चल पड़ता था मैं अपने कहानियों के सफर पे। धीरे-धीरे दोस्ती होने लगी थी हमारी, अब कु छ कहानियाँ बन गयीं थी जो मुझे प्यार करने लगी थी,ं मैं भी समेट लेता था खुद को उनके दामन vii

अनकही शरु ुआ में। थोड़ा कमजोर था म,ैं तो खुद को छु पाना सीख लिया था मेरी दोस्त कहानियों के परै हन मंे, जब भी कोई तीखी कहानी मुझसे लड़ने आती थी। वो भी छु पा लेती थीं मुझे जसै े कोई माँ छु पा लेती है अपने बच्चे को अपने आचँ ल मंे, जिससे डर भी डरने लगता है। हर शाम मेरे अदं र का शिल्पकार थोड़ा बड़ा हो रहा था, मेरे हाथों पे मेरी पकड़ बढ़ती जा रही थी और मेरी कहानियों का प्यार मझु पे। उनके आग़ोश में खो के ऐसा लगता था कि डू बा रहूँ इनमंे कभी बाहर न आऊं म।ैं जसै े कोई प्ेरमी अपने प्ेरयसी की आखँ ों में खो जाता है। शब्द दर शब्द, हर्फ़ दर हर्फ़ , सफ़्हा दर सफ़्हा मेरा इश्क़ बढ़ रहा था उनसे और उनका मुझसे। फिर मेरी उम्मीदों का बोझ ढोने लगीं मेरी कहानियाँ और बोझ इतना ज्यादा कि दब गयीं वो, न जाने कब मेरी वो छोटी कहानियाँ और छोटी हो गयी,ं और कविताओं की शक्ल लेली। बहुत रोया मंै पर कु छ कर नहीं पाया, तो सिल दिया उन कहानियों की यादों, उन कविताओं को एक साथ अपने आखँ ों के पानी से। ये सिर्फ मेरी कवितायँे नहीं हैं, मेरी कहानियाँ हैं और उनकी यादें हैं। एक शिल्पकार के जज़्बातों का पलु िदं ा हंै, जो कु छ पन्नों पे समेटी हैं मनंै े। ‑ तजे स viii

यादंे बरगद का पेड़ इंतज़ार उखड़ी सासँ ें सन्नाटे शोर करते हंै रद्दी डायरी पत्थर, एक दोस्त मेरा एहसास को जीने दो 1

गमु सुम उम्मीद बड़ी है जाओ तुम साथ सपने देखे थे ज़वाब मेरी कहानी वो बारिश अब नहीं आती शायद सुकू न मिले मुझे तब सबेरा फिर नहीं आया अनकही दास्ताँ मेरे पाने तमु ्हारे खोने मंे 2

ये मंै हूँ या तमु हो उदास पानी फिर मिले हाथँ उनके हाथों से खर्रटा े चाँद बड़ा धंुधला सा था निःशब्द हँसी एक लम्हा जसै ा तुमने देखा था आशियाना ढूंढता दिल एक प्याली चाय सलु गता चादँ बड़े झूठे हो तमु सफ़र 3

सोता शहर मायाजाल चलो गंगा नहा आयंे शहर लाल बत्ती का इंतज़ार न कोई भगवान अब होगा उनकी हैवानियत तमु वहीं थे 4

नहीं पता मनंै े खुदा बदल डाला काल साइकिल रिश्ते इश्क़ का परचम सपनो का बोझ वक़्त दर्ज़ी है आधा इश्क़ वो चार लोग 5

छोटू चादँ निकल आया है तमु ्हारे लफ़्ज़ तलाश दो चेहरे अनाड़ी अधँ ियारा तनहा गिरहें आग लगी है वीराने स्वेटर की तरह 6

आख़री पड़ाव



यादें कल ही कि बात लगती है, सूरज को बिस्किट समझ कु तर बठै ा था मंै चाय में डु बा के । होंठ जल गये थे मेरे, माँ भाग के पानी ले आयी मँहु धलु ाया पर जलन जा ही नहीं रही थी, चाय भी कु छ ज्यादा ही गर्म थी। छु पा लिया था माँ ने फिर अपने आचँ ल मंे। कु छ ऐसी ही यादंे कु रेदती हंै, अदं र तक टटोलती हंै मझु ,े फिर धीरे से मेरे कानो मंे फु सफु सा जाती हंै उन लम्हों को और वीडियो चलने लगती है मेरे सामने। कु छ गर्म। कु छ सर्द। कु छ तीखी, खट्टी और मीठी। कभी जब दर्द की धंुध सामने हो तो चुपके से गुदगदु ा जाती हैं। कभी जो तनहा हूँ तो ज़िंदा ख्वाब चलके आते हैं मेरे साथ बठै जाते हैं। कभी तगं करते हैं थोड़ा मझु को, कभी मुझे समझाते हंै, वसै े ही जसै े मेरे बाबा समझाते थे, जब मैं परेशान हो जाता था कु छ खट्ेट मीठे एहसासों से। चादँ को भी उतरते देखा है मनंै े, शायद मेरी यादों का गनु गुनाना सुनने आता है और जो मंै खशु हूँ तो मेरे सामने जो गमगीन तो पीछे खड़ा हो आड़ी तिरछी परछाइयाँ बना देता है। मझु े परछाइयों के साथ खेलना अच्छा लगता है। मंै बाबा के साथ खड़ा होकर अजीब शक्लें बनाता था इन परछाइयों से और हम खेलते थे उनसे, शायद याद दिलाता है उन बीते पलों को, कि देखंू उनको और हंस दँ।ू चादँ की 9

बरगद का पेड़ रौशनी को रोप लेते थे हम हाथों पे, और घना अधँ ियारा उगा देते थे। निहारता हूँ उन यादों को ख़ुशी देते हैं मुझ।े लेकिन सब की सब यादंे हंै बस यादंे। 10

बरगद का पेड़ छाओं में बठै े जिसके मनैं े कई दपु हरी गुज़ारी थी जिसके गिरते पत्तों को कॉपी में रखा करता था सखू े पत्तों की झिल्ली को मंै देख के खुश हो जाता था अब सूख गया है बरगद का वो पेड़। जब मम्मी मेरे पीछे चिमटा लेके दौड़ी थी उसकी टहनियों पे चढ़ मैं उसमें गमु हो जाता था  जब दिन दहकने लगता था वो घनी छाओं मझु े देता था  मेरे बाबा के जसै ा था  बरगद का वो पेड़। मनैं े पापा को खोया था उसे खूब पकड़ के रोया था उसके पत्ते खड़-खड़ करके मेरे गम में शामिल थे वो चपु होता मेरे गम से मेरी खशु ियों से खशु होता अब डू ब गया है बरगद का वो पेड़। 11

बरगद का पेड़ उम्र बढ़ी भलू ा उसको शायद वो रोया होगा मैं काबिल बनने निकला था वो कामिल होके बठै ा है  आज बड़ा संजीदा हो मैं उससे मिलने आया हूँ  वो ठूं ठ के जसै े बठै ा है  वो ख़त्म हुआ है  बरगद का वो पेड़। 12

इंतज़ार क्या वापस नहीं आ सकती तुम? तुम्हारे साथ बठै के उस चादँ को तापना है फिर, वहीँ उसी बगीचे में जहाँ दिल की बात आखँ ों से बयां की थी। वो कोना गलु ज़ार हो गया था बगीचे का, जब हंसी थी तुम उस रात मेरे साथ में। वक़्त के पाओं निकल आये थे, हमने काफ़ी शिद्दत से पकड़ रखा था। पर वक़्त तो वक़्त है ज़ोर कहाँ उसपे चलता, बिन बोले घसीटता हमको आगे बढ़ रहा था। बोलो ना, क्या वापस नहीं आ सकती तुम? बहुत रोता हूँ मैं तमु को याद करके , जब दरवाज़े को कोई तमु ्हारे जसै ा ही दो बार खट-खट कर देता है। 13

बरगद का पेड़ ऐसा लगता है तमु हो, पर खलु ते ही दरवाज़ा ख़ुशी जिन्न की तरह गायब हो जाती है, मैं वापस अपने अके लेपन से लड़ने लगता हूँ। ख़ामोशी नश्तर लेके आती है, मंै भी तमु ्हारे यादों की ढाल बहार करता हूँ। द्वन्द होता है दोनों मंे बड़ी देर तलक, कोशिश बहुत करता हूँ जीतने की, फिर भी हार जाता हूँ। बोलो ना, क्या वापस नहीं आ सकती तुम? 14

उखड़ी साँसें तुम सफ़े द बेड पे हरे कपड़ों में लेटी थी, आसपास कई मशीने जुगाली कर रहीं थी। तुम्हारी नसों मंे इतने सारे पाइप फिट कर दिये थे, और मंै परेशान निहार रहा था तुमको। मैं तुम्हें सनु ना चाहता था, पर इन मशीनों ने सुला के रखा था तमु को। तमु ्हारे उखड़ी साँसों की सीढियों पे चढ़, मेरी रूह तुमसे मिलने चल दी थी। उखड़ी-उखड़ी सी सीढ़ी थी कई बार गिरा, पर ढु लकता चढ़ गया था म।ैं तमु ्हारे होंठों से फिसलता रूह तक पहं ुचा, बड़ी तकलीफ़ में थी तुम। फिर तमु और मंै तमु ्हारे दिल के बेंच पे बठै े , अपनी कहानियों के परु ्ज़े उडा रहे थे। 15

बरगद का पेड़ हर तरफ फाहे ही फाहे बादलों से, बाहर चिल्लाने की आवाज़ दौड़ रही थी। लोग कु छ और मशीने लेके दौड़ रहे थे, तुमको रोबोट बनाने के लिए। कु छ और तारंे कु छ और पाइप, तमु वापस भेज रही थी मझु को। बाहर आवाज़ थम गयी थी और अदं र रोशनी, घपु ्प अधँ ेरा, तमु खो गयी और मेरी रूह भी। जब आखँ खलु ी तो देखा, मरे े दिल को पागल समझ बिजली के झटके दे रहा था कोई। मैं तो जाग गया था पर रूह तो अब भी वहीँ थी, खरै तुम नहीं थी तो रूह करना भी क्या था। बस एक अधँ ेरा इंतज़ार था, मेरी उखड़ी सांसों का। 16

सन्नाटे शोर करते हंै पलट लेता हूँ जब पन्ने, मेरी पीली किताबों के । सफर पे चलने लगता हूँ, तरे ी उन तंग यादों के । तमु ्हारे हाँथ से खाना, तुम्हारे साथ में सोना। ना चाहो फिर भी तुमसे, रोज़ एक कहानी सनु लेना। हँसी में तुम ख़ुशी में तमु , मेरी तो ज़िंदगी थे तमु । हुआ ग़मगीन जब भी म,ैं तो मेरी तिश्नगी थे तुम। 17

बरगद का पेड़ जब भी मैं दर्द मंे डू बा, सहारा तमु को था पाया। तमु ्हारी आखरी हिचकी से, मंै वापस नहीं आया। तरे े जाने से पसरा गम का साया, मेरे आँगन मंे। तुम्हारी याद बस बाकी, मेरे सारे तरानो मंे। तुम्हारी इन्त्ज़ारी में, रात से भोर करते हैं। चले आओ ना तुम वापस, सन्नाटे शोर करते हंै। 18

रद्दी कल घर से रद्दी बाहर निकाली जा रही थी, रद्दी वाला क़रीने से लगा रहा था उनको। यादों को मंै घर से बाहर कर रहा था, और वो उन्हंे सजा के रख रहा था। एक भी पन्ना मडु ़ जाता, उसे सीधा करता फिर से लगाता। जमीं थी कई दिनों से कोने वाले कमरे में, मंै भी अब उनसे निजात चाहता था। कु छ और भी यादें जमा हैं, दिमाग के एक कोने में। बड़ी कीमती हैं, क्या इनको भी लेने आएगा कोई। 19

बरगद का पेड़ कोई नहीं आएगा इन यादों को लेने, ना हटा सकँू गा में कभी भी झाड़ कर इनको। क्योंकि क़ीमत तो मनैं े लगायी है, ख़रीदार यहाँ कोई नही।ं कै सा ताना-बाना है ज़िन्दगी का, रद्दी जो मेरे लिये है किसी के लिये कीमती। और क़ीमत जिसकी मंै लगाता, सभी के लिए रद्दी। 20

डायरी कल डायरी पढ़ रहा था म,ंै सारे किस्से फिर से ताज़ा थे। सफ़े द पन्ने जो, अतरंगी पीले पड़ गए थे, झुर्रियां भी साफ़ दिखने लगी थी पन्नों पे। ज़र-ज़र होते सारे पन्ने, कई किस्से समेटे ज़िंदा थे। कई खुशियाँ लपेटे हँसते थे, तो कु छ शब्दों के ग़म में भींगे थे। कई को पढ़ के आखँ रोयी मेरी, तो कु छ ने मझु को हँसाया था रोते से। 21

बरगद का पेड़ बदं कर सोचा कितनी क़ाबिल हैं, ना दर्द दिखते हैं ना आसँ ू इनके । सारी यादों का ताना बाना लिये, कै से ख़ामोशी लपेटे हंै बठै े । कल डायरी पढ़ रहा था म,ंै सारे किस्से फिर से ताज़ा थे। 22

पत्थर, एक दोस्त मेरा नया-नया वो दोस्त था मेरा मेरे साथ ही चलता था घर से स्कू ल तक फिर स्कू ल से घर की ड्योढ़ी तक। किक मारते ले जाता था फ़िर वापस उसे ले आता था कभी वो उफ़ न करता था मंै उसके साथ बहुत ख़ुश था। कभी जो किक तज़े लग जाती वो तजे ी से आगे बढ़ता मंै भी उसके साथ भागता वो पत्थर था एक दोस्त मेरा। बड़ा हुआ मैं छू टा वो जब नई-नई साईकल आयी थी मंै खशु था शायद वो भी फ़िर दरू हुआ उससे मैं था। 23

बरगद का पेड़ अब सोचंू तो लगता है वो दिन ज्यादा अच्छे थे जब मम्मी के एक रुपये से ख़ुशी छलकने लगती थी। जब दस पसै े वाली “किसमी” मुंह में मिठास भर देती थी जब साथ मेरे वो चलता था जब पत्थर था एक दोस्त मेरा। मैं भीड़ का अब एक हिस्सा हूँ चलती दनु िया का परु ्ज़ा हूँ चीज़ंे तमाम तो पास में हैं पर सकु ंू की कोई आस नहीं है मैं तराशने निकला ख़ुद को शहर की जोर आजमाइश मंे खोया है सारा सकु ू न यहाँ कु छ पाने की गंुजाईश में अब सोचँू तो ये लगता है अब भी इंतज़ार मंे होगा मेरे क़दमों की आहट के वो पत्थर एक दोस्त मेरा 24

एहसास को जीने दो उस इक एहसास को जीने दो मझु में, कहीं पिघल के आखँ ों से न बह जाये वो। पर्त-दर-पर्त घुलने दो मेरी ख़ामोशी मंे, ज़र्द खशु ियों से जुटाई हुई सारी हसरत। तमु ्हारी हँसी का वो कतरा उस एहसास में छु पा रखा है, उसी कतरे मंे छु पाये हंै तरे े आसँ ू भी। उस इक एहसास को जीने दो मझु मंे, कहीं पिघल के आखँ ों से न बह जाये वो। तुम्हारी करवटों से पड़ी सिलवटें, तुम रोज़ सीधा करती थी। वो भी सोई हैं उसमंे, मैं रोज़ गिनता हूँ कहीं चोरी न हो जाय।ंे 25

बरगद का पेड़ उस इक एहसास को जीने दो मझु में, कहीं पिघल के आखँ ों से न बह जाये वो। और वो मगरूर हवा भी जो तमु ्हारे जुल्फों से खेलती थी, मझु े गसु ्सा भी आता था। अपने हाथों से तुम्हारे आसपास दीवार बुनता था, बाधँ के रखा है उसी एहसास मंे मनंै े। उस इक एहसास को जीने दो मझु में, कहीं पिघल के आखँ ों से न बह जाये वो। वो लड़का जो तमु को छू के गुजरा था, और मनंै े आखँ ें गुरेरी थी।ं तमु ने हौले से मेरा हाँथ थामा था वो भी उसी एहसास का एक अहम हिस्सा है। उस इक एहसास को जीने दो मझु में, कहीं पिघल के आखँ ों से न बह जाये वो। 26

गुमसुम वो कु हासे भरी सर्द रात मुझे अच्छी लगती थी, जो बहते कु हासे में ढूंढ लेता था तुम्हारी हंसी से, जब तुम्हारी हंसी उस गमु समु अधं ियारे में करवटें लेती थी। घना कु हासा जिसमंे आखँ ों को हाथँ भी न सझू ।े हमको भी कोई देख न पाता था। फिर मैं और तुम पकड़ते थे उन्हें। सांसों से धुएं का छल्ला बनाते थे। सांसों की गर्मी बाहर की सर्द हवा में जम जाती थी। कितनी सर्दी है ये तुम्हारी नाक पे दिख जाता था। सफ़े द पड़ जाती थी। फिर वसै ी ही एक कु हासे की रात में तमु ्हारा फ़ोन आया था, तमु ्हारी आवाज़ की महक फै ली ही थी थोड़ी, थोड़ा कमरे में रखा गलु दान भी मसु ्कराया था, वो गडु ़हल का पौधा आदतन कमरे की खिड़की से झाकं रहा था, फिर जो आखरी अलविदा कहा तुमने लगा कमरे में तमु ्हारी आवाज़ टू टे आईने सी बिखर गयी हो। मेरे लाखों चेहरे उगे थे उसमें, पर सब मंे मंै अके ला गमु सुम खड़ा था। उस दिन वो कु हासे की रात उस फ़ोन के रस्ते घर में दाखिल हो गयी और धीरे-धीरे मझु में। जो अधँ ियारा अच्छा लगता मुझ,े क्या पता था कि वो मेरे रूह मंे समा जायेगा। कल सांस थोड़ी उखड़ी-उखड़ी थी, किसी ने कहा धड़कने तजे हो गयीं हैं। क्या ही बताता उन्हंे, 27

बरगद का पेड़ खालीपन इतना ज्यादा है कि खनू को धमनियों मंे दौड़ने बेपनाह जगह मिल गयी है। वो तजे ी से दौड़ती हैं, और मेरी हार्ट-बीट बढ़ जाती है। वादा तो नहीं था पर उम्मीद बड़ी है, की आओगी तमु फिर से तमु ्हंे ढूंढ लंूगा म,ंै जब तुम्हारी हंसी उस गमु सुम अधं ियारे मंे करवटें लेगी। 28

उम्मीद बड़ी है वादा तो नहीं किया था तमु ने साथ देने का, पर उम्मीद बड़ी है तमु से। मायसू है दिल तमु ्हारे जाने से गले पे सिलवटें पड़ गयी हैं रुं ध गया है गला भी थोड़ा-थोड़ा आके उँ गलियों से खोलोगी तुम ये जानता हूँ म।ैं हर करवट मंे महससू होती हो तुम वो बिस्तर की सिलवटंे मनैं े समेटी नहीं हंै देखोगी इन सिलवटों को, समेटोगी उनको ये जानता हूँ म।ैं वो कमरे में झांकता गडु ़हल का पौधा अब खिलता नहीं है ग़म में सखू गया है शायद 29

बरगद का पेड़ आके हँस दोगी, खिल जायेगा फिर से ये जानता हूँ म।ंै वो पीपल के पत्ते जिनपे चलने से चरपर आवाज़ आती थी काम वाली बाहर कर देती है मंै रोक के रखता हूँ। क्योंकि आओगी तमु , ये जानता हूँ म।ंै वो नीला पंेट जो कमरे में कराया था तमु ने, थोड़ा उखड़ा-उखड़ा है मंै बदलता नहीं उसको, तुम्हारी यादंे बसती हैं। आके गाढ़ा करोगी फिर से उसे। ये जानता हूँ म।ंै उजड़ा-उजड़ा सा हमारा कमरा हो गया है और वसै ी ही उजड़ी ज़िन्दगी आओगी तमु , और बुन दोगी इसे स्वेटर की तरह ये जानता हूँ म।ैं 30

जाओ तुम हाँ जाओ तुम, ले जाओ अपना प्यार, रोकंू गा नहीं। पर तुम्हारे गीले बालों की खशु बू, जो तौलिये में लपेट रखी है। वो वापस नहीं दंगू ा। जाओ फिर मत देखना मुड़ के पीछे तमु , टोकंू गा नहीं। पर तमु ्हारे तज़े सासँ ों की आवाज़,जो कमरे मंे छु पा रखी है। वो वापस नहीं दंगू ा। ले जाओ सारे गिफ्ट्स, जो दिए थे तुमने, मागँ ूंगा नहीं। पर जो तमु ्हारे किस से, लिप्स्टिक का निशान मेरी सफ़े द शर्ट पे है। वो वापस नहीं दंगू ा। कु छ कार्ड भी रखे हैं, उनको भी ले जाना, बरु ा सोचगूं ा नही।ं पर आईने मंे जो हम दोनों ने एक साथ निहारा था खदु को। वो वापस नहीं दंगू ा। 31

बरगद का पेड़ ले जाओ सारी यादें, सारे सकु ँू के पल, पूछू ँगा नही।ं पर जो उँ गलियों से, अपना नाम, तमु ने मेरे बदन पे लिखा था। वो वापस नहीं दंगू ा। 32

साथ सपने देखे थे साथ सपने देखे थे कभी हमने, सितारों को छू ने के । मेरे कं धे की सीढ़ी पे चढ़, तुम आगे निकल गए। ऐसा नहीं के तमु ्हारे सितारों को छू ने से, मुझे ख़ुशी नहीं मिली। पर रेत पे हमने जो परै ों के जोड़े बनाये थे, सब वहीँ का वहीँ धरा रह गया। पलट के देखो और दिख जाएँ, जो आसँ ू मेरे। समझ लेना के हमारे सपनो का चरू ा, मेरी आखँ ों मंे पड़ा रह गया। कभी गिर जाओ ना, सपनो के आसमां से तुम। बस इसी डर से म,ंै कं धा लिए अपना वहीँ पे खड़ा रह गया। साथ सपने देखे थे कभी हमने, सितारों को छू ने के । 33

ज़वाब तुम्हारे सवालों के जवाब, नहीं आज मेरे पास मंे हंै। मिलूंगा जब, क़यामत के रोज़, जवाब दंगू ा म।ैं ख़दु ा जब सामने होगा, मक़ु दमा लड़ रहे होंगे। उस रोज़ सब सवालों के ज़वाब दंगू ा म।ंै तमु ्हारे हिस्से का सच सनु गूं ा, बेपरवाह म।ैं अपने हिस्से का सच भी बयाँ करूँ गा म।ैं मेरी ख़ुश्क सी आखँ ंे सब कहेंगी तब। तमु ्हारी ख़शु ्क सी बातंे भी सुनँगू ा म।ैं उस रोज़ सब सवालों के ज़वाब दंगू ा म।ंै तुम्हारे आखँ ों के पानी की क़ीमत भी दंगू ा। अपने आखँ ों से गिरते ख़ून का हिसाब लँगू ा म।ंै जब खलु ा होगा अपने कर्मों का बहीखाता। तब हम दोनों की गलतियाँ गिनँगू ा म।ंै हाँ उस रोज़ सब सवालों के ज़वाब दंगू ा म।ंै 34

मेरी कहानी कलम हाथों मंे है मेरे, मेरी आँखों में पानी है। सवालों और जवाबों ने लिखी मेरी कहानी है। कई यादों के टु कड़े हैं, कई बिखरे से पन्नों में। कहीं पे ख़ुशी लिखी है, कहीं पे दर्द शब्दों मंे। कई सपनो का जायज फ़लसफ़ा लिखा है पन्नों मंे। कहीं लफ़्ज़ों ने घायल कर रखा है सारे हर्फ़ों को। कहीं सफे दी की चादर, कहीं है स्याह से पन्ने। कहीं खशु िया लपेटे आ रहीं हैं मौत की आहट। समेटे सारे पन्ने हंै, सिलता आखँ ों का पानी है। सवालों और जवाबों ने लिखी मेरी कहानी है। 35

वो बारिश अब नहीं आती याद है, जब उस खुली सड़क पे बारिश की बँदू ंे दौड़ी थी।ं तुम उस कपडे के दकु ान के बहार खड़ी थी, शीशे से चिपक के । बारिश तमु से अठखेलियाँ कर रही थी। सर घमु ा लिया था तमु ने नाराज़ होके , आसमान को कोसा भी था। उस शीशे पे तुम्हारे होठों की गरमाहट ने दस्तक दी थी। हल्का निशान बन गया था। तुम्हारे जाने के बाद मनैं े उसे दसू री तरफ से चमू ा था। कशिश खींच लायी थी। मैं अक्सर जाता हूँ उस दकु ान के सामन,े घटं ो बठै ा रहता हूँ। इंतज़ार में, के बारिश हो और तुम भी। पर वो बारिश अब नहीं आती। 36

शायद सुकू न मिले मुझे तब पोंछ दँ ू खुद को गर्द जसै ा, मिटा दँ ू सारे निशान अपने। न तुमको ढूंढू न रौशनी को, शायद सुकू न मिले मझु े तब। जो कतरा आँखों से बह गया था, बटोर के उसके सारे चूरे। छु पा दँ ू यादों के परै हन में, शायद सुकू न मिले मझु े तब। जो रातें काटी तुम्हारे सगं में, बना के उनको मज़मनू जसै ा। नाबदू कर दँ ू गगं ा लहर मंे, शायद सुकू न मिले मझु े तब। 37

बरगद का पेड़ वो खत तमु ्हारे अब भी पड़े हंै, बटोर के उसके सारे किस्से। लगा लँू कश और धुआँ उठे , शायद सुकू न मिले मझु े तब। नाआश्ना सा मिलूं मंै खदु से, लिबास जसै ा बदल दँ ू चेहरा। नक़्श बनु दँ ू नयी ज़बां मंे, शायद सुकू न मिले मझु े तब। 38

सबेरा फिर नहीं आया शाम में आखँ ों मंे कु छ हलचल छलक गयी। तमु गुमसुम खड़ी थी दरू , मैं भी चपु अनजान बठै ा था। आखँ ों से हमने रेत के टीले बनाये थे। कोशिश की टीले से तमु तक पहुँचने की, पर रेत का टीला था। जितना चढ़ता था उसपे, उतना धसँ ता जाता था। उस शाम में वो टीला मझु को भी खा गया। बस उस रात के बाद सबेरा फिर नहीं आया। 39

अनकही दास्ताँ जो तुमको सनु ानी थी हमने कभी सनु ाई नहीं, दास्ताँ थी अनकही होठों पे कभी आयी नहीं। गँूजती थी जो सदायें मेरे वीराने मंे, तमु ने पूछा भी नहीं हमने भी बताई नही।ं लफ़्ज़ करवटें लेते रहे जहन मंे मेरे, वो आग ऐसी थी जबु ां पे कभी आयी नही।ं तोड़ के चादँ को कमरे मे तरे े टांगा था, आखँ ंे थीं लाल मनंै े किरछंे कभी दिखाई नही।ं वो जो रिश्ता बनु ा था मनैं े दिल के करीब, शबनम सी बरसी रात भर पर जतायी नहीं। अश्क़ और इश्क़ के बेमेल से जनाज़े थे, कहानी बहती रही आखँ ों से पर लफ़्ज़ों में घुल पायी नही।ं जो तमु को सुनानी थी हमने कभी सुनाई नहीं, दास्ताँ थी अनकही होठों पे कभी आयी नही।ं 40

मेरे पाने तमु ्हारे खोने मंे मेरे पाने तुम्हारे खोने मंे, कहानी यूँ बयां होगी ये नहीं जानते थे। बयां होती थी जो तमु ्हारे हंसने मंे, रात तबस्सुम मंे तरे े बीती थी। अब तो बीते है गमु नाम से सबेरों में, करवटें लेते सुनसान से अधं ेरों में। वक़्त को रोक के तुम थी खड़ी, सासँ आती थी तमु ्हारे होने में। खुद को पाने में कितना वक़्त लगा, सगं आने मंे कितना वक़्त लगा। 41

बरगद का पेड़ तुम्हारे आखँ ों का वो छोटा समदं र, मेरी कश्ती जिसमें उड़ान भरती थी। अब तो आदत भी कहानी लगती है, वो सारी बातंे हैं पुरानी लगती है। मेरे पाने तुम्हारे खोने में, कहानी यूँ बयां होगी ये नहीं जानते थे। 42


Like this book? You can publish your book online for free in a few minutes!
Create your own flipbook