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Gunahon Ka Devta

Published by THE MANTHAN SCHOOL, 2021-05-12 08:51:01

Description: Gunahon Ka Devta

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तक केिलए! सबुह सेह सधुा जैसेबझु गयी थी। कल तक जो उसम उ लास वापस आ गया था, वह जैसेकैलाश क छाँह ने ह स िलया था। च दर केकॉलजे का आ खर दन था। च दर कैलाश को लेगया और अपनेिम स,े ोफेसर से उसका प रचय करा लाया। एक ोफेसर, जनक आदत थी क वेकांेस सरकार सेस ब धत हर य को दावत ज र देतेथे, उ ह नेकैलाश को भी दावत द य क वह सांकृितक िमशन म जा रहा था। वापस जानेकेिलए रात क गाड़ तय रह । ह त-ेभर बाद ह कैलाश को जाना था अत: वह यादा नह ं क सकता था। दोपहर का खाना दोन नेसाथ खाया। सधुा महरा जन का िलहाज करती थी, अत: वह कैलाश केसाथ खानेनह ंबठै। िन य हुआ क अभी सेसामान बाँध िलया जाए ता क पाट केबाद सीधेटेशन जा सक। जब सधुा नेच दर केलायेहुए कपड़ेकैलाश को दखायेतो उसेबड़ा ता जुब हुआ। लेकन उसनेकुछ नह ंकहा, कपड़ेरख िलयेऔर च दर सेजाकर बोला, ''अब जब तमुनेलने-ेदेनेका यवहार ह िनभाया हैतो यह बता दो, तमु बड़ेहो या छोटे?'' '' य ?'' च दर नेपछूा। ''इसिलए क बड़ेहो तो परैछूकर जाऊँ, और छोटेहो तो पया देकर जाऊँ!'' कैलाश बोला। च दर हँस पड़ा। घर म दोपहर सेह उदासी छा गयी। न च दर दोपहर को सोया, न कैलाश और न सधुा। शाम क पाट म सब लोग गय।ेवहाँसेलौटकर आयेतो सधुा को लगा क उसका मन अभी डूब जाएगा। उसेशाद म भी जाना इतना नह ं अखरा था जतना आज अखर रहा था। मोटर पर सामान रखा जा रहा था तो वह ख भेसेटककर खड़ रो रह थी। महरा जन एक टोकर म खानेका सामान बाँध रह थी। कैलाश नेदेखा तो बोला, ''रो य रह हो? छोड़ जाएँतुह यह ं? च दर सेसभँलगेा!'' सधुा नेआँसूप छकर आँख सेडाँटा-''महरा जन सनु रह ह क नह ं।'' मोटर तक पहुँचत-ेपहुँचतेसधुा फूट-फूटकर रो पड़ और महरा जन उसेगलेसेलगाकर आँसूप छनेलगीं। फर बोलीं, ''रोवौ न ब टया! अब छोटेबाबूका बयाह कर देव तो दईु-तीन मह ना आयकेरह जाव। तोहार सास छो ड़ह क न?'' सधुा नेकुछ जवाब नह ंदया और पाँच पयेका नोट महरा जन केहाथ म थमाकर आ बठै। ेन लटेफाम पर आ गयी थी। सकेड लास म च दर नेइन लोग का ब तर लगवा दया। सीट रजव करवा द । गाड़ छूटनेम अभी घटंा-भर देर थी। सधुा क आँख म विच -सा भाव था। कल तक क ढ़ता, तजे, उ लास बझु गया था और अजब-सी कातरता आ गयी थी। वह चुप बठै थी। च दर सेजब नह ंदेखा गया तो वह उठकर लटेफाम पर टहलनेलगा। कैलाश भी उतर गया। दोन बात करनेलगे। सहसा कैलाश नेच दर केक धेपर हाथ रखकर कहा, ''हाँयार, एक बात बहुत ज र थी।'' '' या?'' ''इ ह नेतमुसेबनती केबारेम कुछ कहा?''

''कहा था!'' ''तो या सोचा तमुन?े'' ''म शाद -वाद नह ंक ँगा।'' ''यह सब आदशवाद मझुेअ छा नह ंलगा, और फर उससेशाद करकेसच पछूो तो बहुत बड़ बात करोगेतमु! उस घटना केबाद अब ा ïण म तो वर उसेिमलनेसेरहा। और येकह रह थींक वह तुह मानती भी बहुत है।'' ''हाँ, लेकन इसकेमतलब यह नह ंक म शाद कर ल।ँूमझुेबहुत कुछ करना है।'' ''अरेजाओ यार, तमु िसवा बात केकुछ नह ंकर सकत।े'' ''हो सकता है।'' च दर नेबात टाल द । वह शाद तो नह ंह करेगा। थोड़ देर बाद च दर नेपछूा, ''इ ह द ली कब भजेोगे?'' ''अभी तो जस दन म जाऊँगा, उस दन येद ली मरेेसाथ जाएगँी, लेकन दसूरेदन शाहजहाँपरुलौट जाएगँी।'' '' य ?'' ''अभी माँबहुत बगड़ हुई ह। वह इ ह आनेथोड़ेह देती थीं। वह तो लखनऊ केबहानेम इ ह लेआया। तमु शकंर भइया सेकभी ज मत करना-अब द ली तो इसिलए चली जाएँक म दो-तीन मह नेबाद लौटूँगा... फर शायद िसत बर, अ टूबर म येतीन-चार मह नेकेिलए द ली जाएगँी। यूनो शी इज कैर इ !'' ''हाँ, अ छा!'' ''हाँ, यह तो बात है, पहला मौका है।'' दोन लौटकर क पाटमट म बठै गय।े सधुा बोली, ''तो िसत बर म आओगेन, च दर?'' ''हाँ-हाँ!'' ''ज र स?े फर व कोई बहाना न बना देगा।'' ''ज र आऊँगा!'' कैलाश उतरकर कुछ लनेेगया तो सधुा नेअपनी आँख सेआँसूप छकर झुककर च दर केपाँव छूिलयेऔर रोकर बोली, ''च दर, अब बहुत टूट चुक हूँ...अब हाथ न खींच लनेा...'' उसका गला ँध गया। च दर नेसधुा केहाथ को अपनेहाथ म लेिलया और कुछ भी नह ंबोला। सधुा थोड़ देर चुप रह , फर बोली-

''च दर, चुप य हो? अब तो नफरत नह ंकरोगे? म बहुत अभागी हूँ, देवता! तमुने या बनाया था और अब या हो गयी!...देखो, अब िच ठ िलखतेरहना। नह ंतो सहारा टूट जाता है...'' और फर वह रो पड़ । कैलाश कुछ कताब और प काएँखर दकर वापस आ गया। दोन बठैकर बात करतेरहे। यह िन य हुआ क जब कैलाश लौटेगा तो बजाय ब बई सेसीधेद ली जानेके, वह याग सेहोता हुआ जाएगा। गाड़ चली तो च दर नेकैलाश को बहुत यार सेगलेलगा िलया। जब तक गाड़ लटेफॉम केअ दर रह , सधुा िसर िनकालेझाँकती रह । लटेफाम केबाहर भी पीली चाँदनी म सधुा का फहराता हुआ आँचल दखता रहा। धीरे-धीरे वह एक सफेद ब दुबनकर अ य हो गया। गाड़ एक वशाल अजगर क तरह चाँदनी म रगती चली जा रह थी। जब मन म यार जाग जाता हैतो यार क करन बादल म िछप जाती है। अजब थी च दर क क मत! इस बार तो, सधुा गयी थी तो उसकेतन-मन को एक गुलाबी नशेम सराबोर कर गयी थी। च दर उदास नह ंथा। वह बहेद खुश था। खूब घमूता था और गरमी केबावजूद खूब काम करता था। अपनेपरुानेनो स िनकाल िलयेथेऔर एक नयी कताब क परेखा सोच रहा था। उसेलगता था क उसका पौ ष, उसक श , उसका ओज, उसक ढ़ता, सभी कुछ लौट आया है। उसेहरदम लगता क गुलाबी पाँखुरय क एक छाया उसक आ मा को चूमती रहती है। वह जब कभी लटेता तो उसलेगता क सधुा फूल केधनषु क तरह उसकेपलगँ केआर-पार पाट पर हाथ टेकेबठै है। उसे लगता-कमरेम अब भी धूप क सौरभ लहरा रह हैऔर हवाओंम सधुा केमधुर कंठ के ोक गँूज रहेह। दो ह दन म च दर को लग रहा था क उसक जंदगी म जहाँजो कुछ टूट-फूट गया है, वह सब सभँल रहा है। वह सब अभाव धीरे-धीरेभर रहा है। उसकेमन का पजूा-गहृखँडहर हो चुका था, सहसा उस पर जैसेकसी नेआँसू िछड़ककर जीवन केवरदान सेअिभ ष कर दया था। प थर केबीच दबकर पसेहुए पजूा-गीत फर सेस वर हो उठे थे। मरुझायेहुए पजूा-फूल क पाँखुरय म फर रस छलक आया था और रंग चमक उठेथे। धीरे-धीरेम दर का कँगूरा फर िसतार सेसमझौता करनेक तयैार करनेलगा था। च दर क नस म वदे-म क प व ता और ज क वशंी क मधुराई पलक म पलक डालकर नाच उठ थी। सारा काम जैसेवह कसी अ य आ मा क आ मा क आ ा सेकरता था। वह आ मा िसवा सधुा केऔर भला कसक थी! वह सधुामय हो रहा था। उसकेकदम-कदम म, बात-बात म, साँस-साँस म सधुा का यार फर सेलौट आया था। तीसरेदन बनती का एक प आया। बनती नेउसेद ली बलुाया था और मामाजी (डॉ टर शुला) भी चाहतेथे क च दर कुछ दन केिलए द ली चला आयेतो अ छा है। च दर केिलए कुछ कोिशश भी कर रहेथे। उसनेिलख दया क वह मई केअ त म या जून के ार भ म आएगा। और बनती को बहुत, बहुत-सा नहे। उसनेसधुा केआने क बात नह ंिलखी य क कैलाश नेमना कर दया था। सबुह च दर गंगा नहाता, नयी पुतक पढ़ता, अपनेनो स दोहराता। दोपहर को सोता और रेडयो बजाता, शाम को घमूता और िसनमेा देखता, सोतेव क वताएँपढ़ता और सधुा के यार केबादल म महँुिछपाकर सो जाता। जस दन कैलाश जानेवाला था, उसी दन उसका एक प आया क वह और सधुा द ली आ गयेह। शकंर भइया और नीलूउसेपहुँचानेब बई जाएगँे। च दर सधुा केइलाहाबाद जानेका ज कसी को भी न िलखे। यह उसकेऔर च दर केबीच क बात थी। खत केनीचेसधुा क कुछ लाइन थीं।

''च दर, राम-राम। तमुनेमझुेजो साड़ द थी वह या अपनी भावी ीमती केनाप क थी? वह मरेेघटुन तक आती है। बढ़ू होकर िघस जाऊँगी तो उसेपहना क ँगी-अ छा नहे। और जो तमुसेकह आयी हूँउन बात का यान रहेगा न? मरे त दुती ठ क है। इधर मनेगाँधीजी क आ मकथा पढ़नी शु क है। तुहार -सधुा। ''...और हाँ, लालाजी! िमठाई खलाओ, द ली म बहुत खबर हैक शरणाथ वभाग म याग केएक ोफेसर आनेवालेह!'' कैलाश तो अब ब बई चल दया होगा। ब बई केपतेसेउसनेबधाई का एक तार भजे दया और सधुा को एयर मले सेउसनेएक खत भजेा जसम उसनेबहुत-सी िमठाइय का िच बना दया था। लेकन वह पसोपशे म पड़ गया। द ली जाए या न जाए। वह अपनेअ तमन सेसरकार नौकर का वरोधी था। उसेत कालीन भारतीय सरकार और टश सरकार म यादा अ तर नह ंलगता था। फर हर कोण सेवह समाजवा दय केअिधक समीप था। और अब वह सधुा सेवायदा कर चुका था क वह काम करेगा। ऊँचा बनगेा। िस होगा, लेकन पद वीकार कर ऊँचा बनना उसकेच र केव था। क तुडॉ टर शुला कोिशश कर कर रहे थे। च दर के य सरकार के कसी ऊँचेपद पर आए, यह उनका सपना था। च दर को कॉलजे क व छ द और ढ ली नौकर पस द थी। अ त म उसनेयह सोचा क पहलेनौकर वीकार कर लगेा। बाद म फर कॉलजे चला आएगा-एक दन रात को जब वह बजली बझुाकर, कताब ब द कर सीनेपर रखकर िसतार को देख रहा था और सोच रहा था क अब सधुा द ली लौट गयी होगी, अगर द ली रह गया तो बगँलेम कसेटकाया जाएगा...इतनेम कसी य नेफाटक खोलकर बगँलेम वशे कया। उसेता जुब हुआ क इतनी रात को कौन आ सकता है, और वह भी साइ कल लकेर! उसनेबजली जला द । तार वाला था। साइ कल खड़ कर, तार वाला लॉन पर चला गया और तार देदया। द तखत करकेउसनेिलफाफा फाड़ा। तार डॉ टर साहब का था। िलखा था क ''अगली ेन सेफौरन चलेआओ। टेशन पर सरकार कार होगी सलटे रंग क ।'' उसकेमन नेफौरन कहा, च दर, हो गयेतमु के म! उसक आँख सेनींद गायब हो गयी। वह उठा, अगली ेन सबुह तीन बजेजाती थी। यारह बजेथे। अभी चार घटंेथे। उसनेएक अटैची म कुछ अ छे-स-ेअ छेसटूरखे, कताब रखीं, और माली को सहेजकर चल दया। मोटर को टेशन सेवापस लानेक द कत होती, ाइवर अब था नह ं, अत: नौकर को अटैची देकर पदैल चल दया। राह म िसनमेा सेलौटता हुआ र शा िमल गया। च दर नेसकेड लास का टकट िलया और ठाठ सेचला। कानपरुम उसनेसाद चाय पी और इटावा म रेतराँ- बार म जाकर खाना खाया। उसकेबगल म मारवाड़ द पित बठैेथेजो सकेड लास का कराया खच करके ाय त व प एक आनेक पकौड़ और दो आनेक दालमोठ सेउदर-पिूत कर रहेथे। हाथरस टेशन पर एक मजेदार घटना घट । हाथरस म छोट और बड़ लाइन ॉस करती ह। छोट लाइन ऊपर पलु पर खड़ होती है। टेशन

केपास जब ेन धीमी हुई तो सठेजी सो रहेथे। सठेानी नेबाहर झाँककर देखा और िन सकंोच उनकेपथृुल उदर पर कर- हार करकेकहा, ''हो! देखो रेलगाड़ केिसर पर रेलगाड़ !'' सठे एकदम च ककर जागेऔर उछलकर बोल,े''बाप रे बाप! उलट गयी रेलगाड़ । ज द सामान उतार। लटुगयेराम! येतो जंगल है। कहतेथेजेवर न लेचल।'' च दर खल खलाकर हँस पड़ा। सठेजी नेप र थित समझी और चुपचाप बठै गय।ेच दर करवट बदलकर फर पढ़नेलगा। इतनेम ऊपर क गाड़ सेउतर कर कोई औरत हाथ म एक गठर िलयेआयी और अ दर य ह घसुी क मारवाड़ बोला, ''बुढ , यह सकेड लास है।'' ''होई! सकेेड-थड तो सब गो व द क माया है, ब चा!'' च दर का महँुदसूर ओर था, लेकन उसनेसोचा गो व दजी क माया का वणन और व ेषण करतेहुए रेल के ड ब केवग करण को भी मायाजाल बताना शायद भागवतकार क द य सेस भव होगा। लेकन यह भी मारवाड़ कोई सधुा तो था नह ंक वैणव सा ह य और गो व दजी क माया का भ होता। जब उसनेकहा-गाड साहब को बलुाऊँ? तो बुढ़या गरज उठ -''बस-बस, चल हुआँस,ेगाड का तोर दमाद लगत हैजौन बलुाइहै। मोटका क !ू'' च दर हँस पड़ा, कम-स-ेकम गाली क नवीनता पर। दसूर बात; गाड़ उस समय ज ेम थी, वहाँयह अवधी का सफल व ा कौन है! उसनेघमूकर देखा। एक बुढ़या थी, िसर मड़ुाय।ेउसनेकह ंदेखा हैइस!े ''कहाँजाओगी, माई?'' ''कानपरुजाब।ै'' ''लेकन यह गाड़ तो द ली जाएगी?'' ''तहुूँबो यो टुप स!ेहम ऐसेधमकावेम नैआइत। ई कानपरुजइहै!'' उसनेहाथ नचाकर च दर सेकहा। और फर जाने य क गयी और च दर क ओर देखनेलगी। फर बोली, ''अरेच दर बटेवा, कहाँसेआवत हौ त!ू'' ''ओह! बआुजी ह। िसर मड़ुा िलया तो पहचान म ह नह ंआतीं!'' च दर नेफौरन उठकर पाँव छुए। बआुजी वृदावन सेआ रह थीं। वह बठै गयीं, बोलीं, ''ऊ न टिनयाँमर गयी क अब हन है?'' ''कौन?'' ''ओह बनती!'' ''मरेगी य ?'' ''भइया! सकुुल तो हमार कुल डुबोय द हन। लेकन जैसेऊ हमर ब टया केमड़वा तरेसेउठाय िल हन वसैे भगवान चाह तो उनहूका लड़क सेसमझी!'' च दर कुछ नह ंबोला। थोड़ देर बाद खुद बड़बड़ाती हुई बआुजी बोलीं, ''अब हम का करैको है। हम सब मोह-

माया याग दया। लेकन हमरेयाग म कुछौ समरथ हैतो सकुुल को बदला िमिलहै!'' कानपरुक गाड़ आयी तो च दर खुद उ ह बठाल आया। विच थींबआुजी, बचेार कभी समझ ह नह ंपायीं क बनती को उठाकर डॉ टर साहब नेउपकार कया या अपकार और मजा तो यह हैक एक ह वा य केपवूा म मायामोह सेवर क घोषणा और उ रा म दवुासा का शाप... ह दुतान केिसवा ऐसेनमनूेकह ंभी िमलनेमुकल ह। इतनेम च दर क गाड़ नेसीट द । वह भागा। बआुजी नेच दर का खयाल छोड़कर अपनेबगल केमसुा फर से लड़ना शु कर दया। वह द ली पहुँचा। दो-तीन साल पहलेभी वह द ली आया था लेकन अब द ली टेशन क चहल-पहल ह दसूर थी। गाड़ घटंा-भर लटे थी। नौ बज चुकेथे। अगर मोटर न िमली तो भी इतनी मशहूर सड़क पर डॉ टर साहब का बगँला था क च दर को वशषे द कत न होती। लेकन य ह वह लटेफॉम सेबाहर िनकला तो उसनेदेखा क जहाँ मरकर क बड़ सचलाइट लगी है, ठ क उसी केनीचेसलटे रंग क शानदार कार खड़ थी जसकेआगे-पीछे ाउन लगा था और सामनेितरंगा, आगेलाल वद पहनेएक खानसामा बठैा है। और पीछेएक िसख ाइवर खड़ा है। च दर का सटूचाहेजतना अ छा हो लेकन इस शान केलायक तो नह ंह था। फर भी वह बड़ेरोब सेगया और ाइवर सेबोला, ''यह कसक मोटर है?'' ''सकार ग ड हैजी।'' िसख नेअपनी ितभा का प रचय दया। '' या यह डॉ टर शुला नेभजेी है?'' ''जी हाँ, हुजूर!'' एकदम उसका वर बदल गया-''आप ह उनकेलड़केह-च दर बहादरुसाहब?'' उसनेउतरकर सलाम कया। दरवाजा खोला, च दर बठै गया। कुली को एक अटैची केिलए एक अठ नी द । मोटर उड़ चली। च दर बहुत उदार वचार का था लेकन आज तक वह डॉ टर साहब क उ नीसवींसद वाली परुानी कार पर ह चढ़ा था। इस राजमकुुट और रा ीय वज सेसशुोिभत मोटर पर खानसामेकेसाथ चढऩेका उसका पहला ह मौका था। उसेलगा जैसेइस समय ितरंगेका गौरव और महान टश सा ा य केइस ाउन का शासनद भ उसकेमन को उड़ायेिलयेजा रहा है। च दर तनकर बठैा लेकन थोड़ देर बाद वयंउसेअपनेमन पर हँसी आ गयी। फर वह सोचनेलगा क जन लोग केहाथ म आज शासन-स ा है; मोटर और खानसाम नेउनके दय को इस तरह बदल दया है। वेभी तो बचेारेआदमी ह, इतनेदन सेभतुा के यास।ेबकेार हम लोग उ ह गाली देतेह। फर च दर उन लोग का खयाल करकेहँस पड़ा। द ली म इलाहाबाद क अपेा कम गरमी थी। कार एक बगँलेकेअ दर मड़ु और पो टको म क गयी। बगँला नयेसादेअमेरकन ढंग का बना हुआ था। खानसामेनेउतरकर दरवाजा खोला। च दर उतर पड़ा। ाइवर नेहॉन दया। दरवाजा खुला और बनती िनकली। उसका महँु सखूा हुआ था, बाल अ त- य त थेऔर आँख जैसेरो-रोकर सजू गयी थीं। च दर का दल धक्-सेहो गया, राह-भर केसनुहरेसपनेटूट गय।े '' या बात है, बनती? अ छ तो हो?'' च दर नेपछूा। ''आओ, च दर?'' बनती नेकहा और अ दर जातेह दरवाजा ब द कर दया और च दर क बाँह पकडक़र

िससक-िससककर रो पड़ । च दर घबरा गया। '' या बात है? बताओ न! डॉ टर साहब कहाँह?'' ''अ दर ह।'' ''तब या हुआ? तमु इतनी द:ुखी य हो?'' च दर नेबनती केिसर पर हाथ रखकर पछूा...उसेलगा जैसेइस सम त वातावरण पर कसी बड़ेभयानक मृय-ुदतूकेपखं क काली छाया है...'' या बात है? बताती य नह ं?'' बनती बड़ मुकल सेबोली, ''द द ...सधुा द द ...'' च दर को लगा जैसेउस पर बजली टूट पड़ -'' या हुआ सधुा को?'' बनती कुछ नह ंबोली, उसेऊपर लेगयी और कमरेकेपास जाकर बोली, ''उसी म ह द द !'' कमरेकेअ दर क रोशनी उदास, फ क और बीमार थी। एक नस सफेद पोशाक पहनेपलगँ केिसरहानेखड़ थी, और कुस पर िसर झुकायेडॉ टर साहब बठैेथे। पलगँ पर चादर ओढ़ेसधुा पड़ थी। नस सामनेथी, अत: सधुा का चेहरा नह ंदखाई पड़ रहा था। च दर केभीतर पाँव रखतेह नस नेआँख केइशारेसेकहा, ''बाहर जाइए।'' च दर ठठककर खड़ा हो गया, डॉ टर साहब नेदेखा और वेभी उठकर चलेआय।े '' या हुआ सधुा को?'' च दर नेबहुत याकुल, बहुत कातर वर म पछूा। डॉ टर साहब कुछ नह ंबोल।ेचुपचाप च दर केक धेपर हाथ रखेहुए अपनेकमरेम आयेऔर बहुत भार वर म बोल,े''हमार ब टया गयी, च दर!'' और आँसूछलक आय।े '' या हुआ उस?े'' च दर नेफर उतनेह द:ुखी वर म पछूा। डॉ टर साहब ण-भर पथराई आँख सेच दर क ओर देखतेरहे, फर िसर झुकाकर बोल,े''एबॉशन!'' थोड़ देर बाद िसर उठाकर याकुल क तरह च दन का क धा पकडक़र बोल,े''च दर, कसी तरह बचाओ सधुा को, या कर कुछ समझ म नह ंआता...अब बचेगी नह ं...परस सेहोश नह ंआया। जाओ कपड़ेबदलो, खाना खा लो, रात-भर जागरण होगा...'' लेकन च दर उठा नह ं, कुस पर िसर झुकायेबठैा रहा। सहसा नस आकर बोली, '' ली डंग फर शु हो गयी और नाड़ डूब रह है। डॉ टर को बलुाइए...फौरन!'' और वह लौट गयी। डॉ टर साहब उठ खड़ेहुए। उनक आँख म बड़ िनराशा थी। बड़ उदासी सेबोल,े''जा रहा हूँ, च दर! अभी आता हूँ!'' च दर नेदेखा, कार बड़ तजेी सेजा रह है। बनती आकर बोली, ''खाना खा लो, च दर!'' च दर नेसनुा ह नह ं। ''यह या हुआ, बनती!'' उसनेघबराई आवाज म पछूा। ''कुछ समझ म नह ंआता, उस दन सबुह जीजाजी गय।ेदोपहर म पापा ऑ फस गयेथे। म सो रह थी, सहसा जीजी चीखी। म जागी तो देखा द द बहेोश पड़ ह। मनेज द सेफोन कया। पापा आय,ेडॉ टर आय।ेउसकेबाद से पापा और नस केअलावा कसी को नह ंजानेदेतेद द केपास। मझुेभी नह ं।''

और बनती रो पड़ । च दर कुछ नह ंबोला। चुपचाप प थर क मिूत-सा कुस पर बठैा रहा। खडक़ सेबाहर क ओर देख रहा था। थोड़ देर म डॉ टर साहब वापस आय।ेउनकेसाथ तीन डॉ टर थेऔर एक नस। डॉ टर नेकर ब दस िमनट देखा, फर अलग कमरेम जाकर सलाह करनेलगे। जब लौटेतो डॉ टर साहब नेबहुत व ïल होकर कहा, '' या उ मीद है?'' ''घबराइए मत, घबराइए मत-अब तो जब तक अ द नी सब साफ नह ंहो जाएगा तब तक खून जाएगा। न ज के िलए और होश केिलए एक इंजेशन देतेह-अभी।'' इंजेशन देनेकेबाद डॉ टर चलेगय।ेपापा वह ंजाकर बठै गय।े बनती और च दर चुपचाप बठैेरहे। कर ब पाँच िमनट केबाद सधुा नेभयकंर वर म कराहना शु कया। उन कराह म जैसेउनका कलजेा उलटा आता हो। डॉ टर साहब उठकर यहाँचलेआयेऔर च दर सेबोल,े''वहेमट ली डंग...'' और कुस पर िसर झुकाकर बठै गय।ेबगल के कमरेसेसधुा क ददनाक कराह उठती थींऔर स नाटेम छटपटानेलगती थीं। अगर आपनेकसी ज दा मगु के पखं और पछँू नोचेजातेहुए देखा हो तभी आप उसका अनमुान कर सकतेह; उस भयानकता का, जो उन कराह म थी। थोड़ देर बाद कराह ब द हो गयीं, फर सहसा इस बरु तरह सेसधुा चीखी जैसेगाय डकार रह हो। पापा उठकर भागे-वह भयकंर चीख उठ और स नाटेम मडँरानेलगी- बनती रो रह थी-च दर का चेहरा पीला पड़ गया था और पसीनेसेतर हो गया था वह। पापा लौटकर आय,े''हम लोग देख सकतेह?'' च दर नेपछूा। ''अभी नह ं-अब ली डंग ख म है।...नस अभी कपड़ेबदल देतो चलगे।'' थोड़ देर म तीन गयेऔर जाकर खड़ेहो गय।ेअब च दर नेसधुा को देखा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। जैसेजाड़ेके दन म थोड़ देर पानी म रहनेकेबाद उँगिलय का रंग र ह न ते हो जाता है। गाल क ह डïयाँ िनकल आयी थींऔर होठ कालेपड़ गयेथे। पलक केचार ओर कालापन गहरा गया था और आँख जैसेबाहर िनकली पड़ती थीं। खून इतना अिधक गया था क लगता था बदन पर चमड़ेक एक ह क झ ली मढ़ द गयी हो। यहाँतक क भीतर क ह ड केउतार-चढ़ाव तक प दख रहेथे। च दर नेडरत-ेडरतेमाथेपर हाथ रखा। सधुा के होठ म कुछ हरकत हुई, उसनेमहँुखोल दया और आँख ब द कयेहुए ह उसनेकरवट बदली, फर कराह और िसर सेपरैतक उसका बदन काँप उठा। नस नेनाड़ देखी और कहा, अब ठ क है। कमजोर बहुत है। थोड़ देर बाद पसीना िनकलना शु हुआ। पसीना प छत-ेप छतेएक बज गया। बनती बोली डॉ टर साहब स-े''मामाजी, अब आप सो जाइए। च दर देख लगेआज। नस हैह ।'' डॉ टर साहब क आँख लाल हो रह थीं। सबकेकहनेपर वह अपनी सीट पर लटे रहे। नस बोली, ''म बाहर आराम कुस पर थोड़ा बठै ल।ँूकोई ज रत हो तो बलुा लनेा।'' च दर जाकर सधुा केिसरहानेबठै गया। बनती बोली, ''तमु थकेहुए आयेहो। चलो तमु भी सो रहो। म देख रह हूँ!'' च दर नेकुछ जवाब नह ंदया। चुपचाप बठैा रहा। बनती नेसभी खड़ कयाँखोल द ंऔर च दर केपास ह बठै

गयी। सधुा सो रह थी चुपचाप। थोड़ देर बाद बनती उठ , घड़ देखी, महँु खोलकर दवा द । सहसा डॉ टर साहब घबरायेहुए-सेआय-े'' या बात है, सधुा य चीखी!'' ''कुछ नह ं, सधुा तो सो रह हैचुपचाप!'' बनती बोली। ''अ छा, मझुेनींद म लगा क वह चीखी है।'' फर वह खड़े-खड़ेसधुा का माथा सहलातेरहेऔर फर लौट गय।े नस अ दर थी। बनती च दर को बाहर लेआयी और बोली, ''देखो, तमु कल जीजाजी को एक तार देदेना!'' ''लेकन अब वह ह गेकहाँ?'' '' वजगाप टम या कोल बो म जहाजी क पनी केपतेसेदलवा देना तार।'' दोन फर जाकर सधुा केपास बठै गय।ेनस बाहर सो रह थी। साढ़ेतीन बज गयेथे। ठंड हवा चल रह थी। बनती च दर केक धेपर िसर रखकर सो गयी। सहसा सधुा केहोठ हलेऔर उसनेकुछ अ फुट वर म कहा। च दर नेसधुा केमाथेपर हाथ रखा। माथा सहसा जलनेलगा था; च दर घबरा उठा। उसनेनस को जगाया। नस ने बगल म थमामीटर लगाया। ताप म एक सौ पाँच था। सारा बदन जल रहा था और रह-रहकर वह काँप उठती थी। च दर नेफर घबराकर नस क ओर देखा। ''घबराइए मत! डॉ टर अभी आएगा।'' लेकन थोड़ देर म हालत और बगड़ गयी। और फर उसी तरह ददनाक कराह सबुह क हवा म िसर पटकनेलगीं। नस नेइन लोग को बाहर भजे दया और बदन अँगोछनेलगी। थोड़ देर म सधुा नेचीखकर पकुारा-''पापा...'' इतनी भयानक आवाज थी क जैसेसधुा को नरक केदतू पकड़ेले जा रहेह । पापा गय।ेसधुा का चेहरा लाल था और वह हाथ पटक रह थी।...पापा को देखतेह बोली, ''पापा...च दर को इलाहाबाद सेबलुवा दो।'' ''च दर आ गया बटेा, अभी बलुातेह।'' य ह पापा नेमाथेपर हाथ रखा क सधुा चीख उठ -''तमु पापा नह ं हो...कौन हो तमु?...दरूहटो, छुओ मत...अरेबनती...'' डॉ टर शुला नेनस क ओर देखा। नस बोली- सधुा नेफर करवट बदली और नस को देखकर बोली, ''कौन गेस.ू..आओ बठैो। च दर नहा रहा है। अभी बलुाती हूँ। अरेच दर...'' और फर हाँफनेलगी, आँख ब द कर लींऔर रोकर बोली, ''पापा, तमु कहाँचलेगय?े'' नस नेच दर और बनती को बलुाया। बनती पास जाकर खड़ हो गयी-आँसूप छकर बोली, ''द द , हम आ गय।े'' और सधुा क बाँह पर हाथ रख दया। सधुा नेआँख नह ंखोलीं, बनती केहाथ पर हाथ रखकर बोली, '' बनती, पापा कहाँगयेह?'' ''खड़ेतो ह मामाजी!'' ''झूठ मत बोल क ब त...अ छा ल,ेशरबत तयैार है, जा च दर टड म म पढ़ रहा हैबलुा ला, जा!'' बनती फफककर रो पड़ ।

''रोती य है?'' सधुा नेकराहकर कहा, ''म जाऊँगी तो च दर को तरेेपास छोड़ जाऊँगी। जा च दर को बलुा ला, नह ंबफ घलु जाएगी-शरबत छान िलया है?'' च दर आगेआया। ँधेगलेसेआँसूपीतेहुए बोला, ''सधुा, आँख खोलो। हम आ गय,ेसधुी!'' डॉ टर साहब कुस पर पड़ेिससक रहेथे...सधुा नेआँख खोलींऔर च दर को देखतेह फर बहुत जोर से चीखी...''तमु...तमु ऑ ेिलया सेलौट आय?े झूठे! तमु च दर हो? या म तुह पहचानती नह ं? अब या चा हए? इतना कहा, तमुसेहाथ जोड़ा, मरे या हालत है? लेकन तुह या? जाओ यहाँसेवना म अभी िसर पटक दँगूी...'' और सधुा नेिसर पटक दया-''नह ंगय?े'' नस नेइशारा कया-च दर कमरेकेबाहर आया और कुस पर िसर झुकाकर बठै गया। सधुा नेआँख खोलींऔर फट -फट आँख सेचार ओर देखनेलगी। फर नस सेबोली- ''गेस,ूतमु बहुत बहादरुहो! तमुनेअपनेको बचेा नह ं; अपनेपरैपर खड़ हो। कसी केआ य म नह ंहो। कोई खाना-कपड़ा देकर तुह खर द नह ंसकता, गेस।ू बनती कहाँगयी...?'' ''म खड़ हूँ, द द ?'' ''ह...अ छा, पापा कहाँह?'' सधुा नेकराहकर पछूा। डॉ टर साहब उठकर आ गय-े''बटेा!'' बड़ेदलुार सेसधुा केमाथेपर हाथ रखकर बोल।ेसधुा रो पड़ -''कहाँथे पापा, अभी तक तमु? हमनेइतना पकुारा, न तमु बोलेन च दर बोला...हम तो डर लग रहा था, इतना सनूा था...जाओ महरा जन नेरोट सक ली है-खा लो। हाँ, ऐसेबठै जाओ। लो पापा, हमनेनानखटाई बनायी...'' डॉ टर शुला रोतेहुए चलेगय-ेबनती नेच दर को बलुाया। देखा च दर कुस पर हथेली म महँुिछपायेबठैा था। बनती गयी और च दर केक धेपर हाथ रखा। च दर नेदेखा और िसर झुका िलया, ''चलो च दर, द द फर बहेोश हो गयीं।'' इतनेम नस बोली। ''वह फर होश म आयी ह; आप लोग वह ंचिलए।'' सधुा नेआँख खोल द थीं-च दर को देखतेह बोली, ''च दर आओ, कोई मा टर ठ क कया तमुन?ेजो कुछ पढ़ा था वह भलू रह हूँ। अब इ तहान म पास नह ंहोऊँगी।'' ''डेली रयम अब भी है।'' नस बोली। सहसा सधुा नेच दर का हाथ छोड़ दया और झट सेहथेिलयाँआँख पर रख लींऔर बोली, ''येकौन आ गया? यह च दर नह ंहै। च दर नह ंहै। च दर होता तो मझुेडाँटता- य बीमार पड़ ं? अब बताओ म च दर को या जवाब दँगूी...च दर को बलुा दो, गेस!ू जंदगी म दुमनी िनभायी, अब मौत म तो न िनभाए।'' ''उफ! मर ज केपास इतनेआदमी? तभी डेली रयम होता है।'' सहसा डॉ टर ने वशे कया। कोई दसूरा डॉ टर था, अँेज था। बनती और च दर बाहर चलेआय।े बनती बोली, ''येिस वल सजन ह।'' उसनेखून मगँवाया, देखा, फर डॉ टर शुला को भी हटा दया। िसफ नस रह गयी। थोड़ देर बाद वह िनकला तो उसका चेहरा याह था। '' या यह ैनेसी पहली मतबा थी?''

''जी हाँ?'' डॉ टर नेिसर हलाया और कहा, ''अब मामला हाथ सेबाहर है। इंजेशन लगगे। अ पताल लेचिलए।'' ''डॉ टर शुला, मवाद आ रहा है, कल तक सारेबदन म फैल जाएगा, कस बवेकूफ डॉ टर नेदेखा था...'' च दर नेफोन कया। ऐ बलुेस कार आ गयी। सधुा को उठाया गया... दन बड़ ह िच ता म बीता। तीन-तीन घटंेपर इंजेशन लग रहेथे। दोपहर को दो बजेइंजेशन ख म कर डॉ टर नेएक गहर साँस ली और बोला, ''कुछ उ मीद है-अगर बारह घटंेतक हाट ठ क रहा तो म आपक लड़क आपको वापस दँगूा।'' बड़ा भयानक दन था। बहुत ऊँची छत का कमरा, दालान म टाट केपरदेपड़ेथेऔर बाहर गम क भयानक लू हू-हूकरती हुई दानव क तरह महँुफाड़ेदौड़ रह थी। डॉ टर साहब िसरहानेबठैेथे, पथर ली िनगाह सेसधुा केपीले मतृ ाय चेहरेक ओर देखतेहुए... बनती और च दर बना कुछ खाय-ेपीयेचुपचाप बठैेथे-रह-रहकर बनती िससक उठती थी, लेकन च दर नेमन पर प थर रख िलया था। वह एकटक एक ओर देख रहा था...कमरेम वातावरण शा त था-रह-रहकर बनती क िसस कयाँ, पापा क िन: ास तथा घड़ क िनर तर टक- टक सनुाई पड़ रह थी। च दर का हाथ बनती क गोद म था। एक मकू सवंदेना नेबनती को सभँाल रखा था। च दर कभी बनती क ओर देखता, कभी घड़ क ओर। सधुा क ओर नह ंदेख पाता था। दखु अपनी परू चोट करनेकेव अकसर आदमी क आ मा और मन को लोरोफाम सघँुा देता है। च दर कुछ भी सोच नह ंपा रहा था। संा-हत, नीरव, िन े... घड़ क सईुअ वराम गित सेचल रह थी। सजन कई दफेआय।ेनस नेआकर टेपरेचर िलया। रात को यारह बजेटेपरेचर उतरनेलगा। डॉ टर शुला क आँख चमक उठ ं। ठ क बाहर बजकर पाँच िमनट पर सधुा नेआँख खोल द ं। च दर नेबनती का हाथ मारेखुशी सेदबा दया। '' बनती कहाँहै?'' बड़े ीण वर म पछूा। सधुा नेआँख घमुाकर देखा। पापा को देखतेह मुकरा पड़ । बनती और च दर उठकर आ गय।े ''आहा, च दर तमु आ गय?ेहमारेिलए या लाय?े'' ''पगली कह ंक !'' मारेखुशी केच दर का गला भर गया। ''लेकन तमु इतनी देर म य आय,ेच दर!'' ''कल रात को ह आ गयेथेहम।'' ''चलो-चलो, झूठ बोलना तो तुहारा धम बन गया। कल रात को आ गयेहोतेतो अभी तक हम अ छेभी हो गयेहोत।े'' और वह हाँफनेलगी।

सजन आया, ''बात मत करो...'' उसनेकहा। उसनेएक िम सचर दया। फर आला लगाकर देखा, और डॉ टर शुला को अलग लेजाकर कहा, ''अभी दो घटंे और खतरा है। लेकन परेशान मत होइए। अब स र ितशत आशा है। मर ज जो कहे, उसम बाधा मत द जएगा। उसे जरा भी परेशानी न हो।'' सधुा नेच दर को बलुाया, ''च दर, पापा सेमत कहना। अब म बचँूगी नह ं। अब कह ंमत जाना, यह ंबठैो।'' ''िछह पगली! डॉ टर कह रहा हैअब खतरा नह ंहै।'' च दर नेबहुत यार सेकहा, ''अभी तो तमु हमारेिलए ज दा रहोगी न!'' ''कोिशश तो कर रह हूँच दर, मौत सेलड़ रह हूँ! च दर, उ ह तार देदो! पता नह ंदेख पाऊँगी या नह ं।'' ''देदया, सधुा!'' च दर नेकहा और िसर झुकाकर सोचनेलगा। '' या सोच रहेहो, च दर! उ ह इसीिलए देखना चाहती हूँक मरनेकेपहलेउ ह मा कर दँ,ूउनसे मा माँग ल!ँू...च दर, तमु तकलीफ का अ दाजा नह ंकर सकत।े'' डॉ टर शुला आय।ेसधुा नेकहा, ''पापा, आज तुहार गोद म लटे ल।'' उ ह नेसधुा का िसर गोद म रख िलया। ''पापा, च दर को समझा दो, येअब अपना याह तो कर ल।े...हाँपापा, हमार भागवत मगँवा दो...'' ''शाम को मगँवा दगेबटे, अब एक बज रहा है...'' ''देखा...'' सधुा नेकहा, '' बनती, यहाँआओ!'' बनती आयी। सधुा नेउसका माथा चूमकर कहा, ''रानी, जो कुछ तझुेआज तक समझाया वसैा ह करना, अ छा! पापा तरेेज मेह।'' बनती रोकर बोली, ''द द , ऐसी बात य करती हो...'' सधुा कुछ न बोली, गोद सेहटाकर िसर त कयेपर रख िलया। ''जाओ पापा, अब सो रहो तमु।'' ''सो लगँूा, बटे...'' ''जाओ। नह ंफर हम अ छेनह ंह गे! जाओ...'' सजन का आदेश था क मर ज केमन के व कुछ नह ंहोना चा हए-डॉ टर शुला चुपचाप उठेऔर बाहर बछेपलगँ पर लटेरहे। सधुा नेच दर को बलुाया, बोली, ''म झुक नह ंसकती- बनती यहाँआ-हाँ, च दर केपरैछू...अरेअपनेमाथेम नह ंपगली मरेेमाथेसेलगा दे। मझुसेझुका नह ंजाता।'' बनती नेरोतेहुए सधुा केमाथेम चरण-धूल लगा द ,

''रोती य है, पगली! म मर जाऊँतो च दर तो हैह । अब च दर तझुेकभी नह ं लाएगँे...चाहेपछू लो! इधर आओ, च दर! बठै जाओ, अपना हाथ मरेेहोठ पर रख दो...ऐस.े..अगर म मर जाऊँतो रोना मत, च दर! तमु ऊँचेबनोगेतो मझुेबहुत चैन िमलगेा। म जो कुछ नह ंपा सक , वह शायद तुहारेह मा यम सेिमलगेा मझुे। और देखो, पापा को अकेलेद ली म न छोडऩा...लेकन म म ँगी नह ं, च दर...यह नरक भोगकर भी तुह यार क ँगी...म मरना नह ं चाहती, जानेफर कभी तमु िमलो या न िमलो, च दर...उफ कतनी तकलीफ है, च दर! हम लोग नेकभी ऐसा नह ं सोचा था...अरेहटो-हटो...च दर!'' सहसा सधुा क आँख म फर अँधेरा छा गया-''भागो, च दर! तुहारेपीछेकौन खड़ा है?'' च दर घबराकर उठ गया-पीछेकोई नह ंथा... ''अरेच दर, तुह पकड़ रहा है। च दर, तमु मरेेपास आओ।'' सधुा नेच दर का हाथ पकड़ िलया- बनती भागकर डॉ टर साहब को बलुानेगयी। नस भी भागकर आयी। सधुा चीख रह थी-''तमु हो कौन? च दर को नह ंलेजा सकत।ेम चल तो रह हूँ। च दर, म जाती हूँइसकेसाथ, घबराना मत। म अभी आती हूँ। तमु तब तक चाय पी लो-नह ं, म तुह उस नरक म नह ंजानेदँगूी, म जा तो रह हूँ- बनती, मरे च पल लेआ...अरेपापा कहाँह...पापा...'' और सधुा का िसर च दर क बाँह पर लढ़ुक गया- बनती को नस नेसभँाला और डॉ टर शुला पागल क तरह सजन केबगँलेक ओर दौड़े...घड़ नेटन-टन दो बजाय.े.. जब ए बलुेस कार पर सधुा का शव बगँलेपहुँचा तो शकंर बाबूआ गयेथे-बहूको वदा करान.े.. उपसहंार जंदगी का य णा-च एक वृ परूा कर चुका था। िसतारेएक ितज सेउठकर, आसमान पार कर दसूरे ितज तक पहुँच चुकेथे। साल-डेढ़ साल पहलेसहसा जंदगी क लहर म उथल-पथुल मच गयी थी और व ुध महासागर क तरह भखूी लहर क बाँह पसारकर वह कसी को दबोच लनेेकेिलए हुंकार उठ थी। अपनी भयानक लहर केिशकंजेम सभी को झकझोरकर, सभी के व ास और भावनाओंको चकनाचूर कर अ त म सबसेयारे, सबसेमासमू और सबसेसकुुमार य व को िनगलकर अब धरातल शा त हो गया-तफूान थम गया था, बादल खुल गयेथेऔर िसतारेफर आसमान केघ सल सेभयभीत वहंग-शावक क तरह झाँक रहेथे। डॉ टर शुला छुट लकेर याग चलेआयेथे। उ ह नेपजूा-पाठ छोड़ दया था। उ ह कभी कसी नेगातेहुए नह ंसनुा था। अब वह सबुह उठकर लॉन पर टहलतेऔर एक भजन गातेथे। बनती, जो इतनी सुदर थी, अब केवल खामोश पीड़ा और अवशषे मिृत क छाया मा थी। च दर शा त था, प थर हो गया था, लेकन उसकेमाथेका तजे बझु गया था और वह बढ़ूा-सा लगनेलगा था और यह सब केवल प ह दन म। जेठ दशहरेकेदन डॉ टर साहब बोल,े''च दर, आज जाओ, उसकेफूल छोड़ आओ, लेकन देखो, शाम को जाना जब वहाँभीड़-भाड़ न हो, अ छा!'' और चुपचाप टहलकर गुनगुनानेलगे। शाम को च दर चला तो बनती भी चुपचाप साथ हो ली; न बनती नेआ ह कया न च दर ने वीकृित द । दोन खामोश चल दय।ेकार पर च दर नेबनती क गोद म गठर रख द । वणेी पर कार क गयी। ह क चाँदनी मलैेकफन क तरह लहर क लाश पर पड़ हुई थी। दन-भर कमाकर म लाह थककर सो रहेथे। एक बढ़ूा बठैा िचलम पी रहा था। चुपचाप उसक नाव पर च दर बठै गया। बनती उसक बगल म बठै गयी। दोन खामोश थे, िसफ

पतवार क छप-छप सनु पड़ती थी। म लाह नेत त केपास नाव बाँध द और बोला, ''नहा ल बाब!ू'' वह समझता था बाबूिसफ घमूनेआयेह। ''जाओ!'' वह दरूत त क कतार केउस छोर पर जाकर खो गया। फर दरू-दरूतक फैला सगंम...और स नाटा...च दर िसर झुकायेबठैा रहा... बनती िसर झुकायेबठै रह । थोड़ देर बाद बनती िससक पड़ । च दर नेिसर उठाया और फौलाद हाथ सेबनती का कंधा झकझोरकर बोला, '' बनती, य द रोयी तो यह फक दगेउठाकर क ब त, अभागी!'' बनती चुप हो गयी। च दर चुपचाप बठैा त त केनीचेसेगुजरती हुई लहर को देखता रहा। थोड़ देर बाद उसनेगठर खोली... फर क गया, शायद फकनेका साहस नह ंहो रहा था... बनती नेपीछेसेआकर एक मुठ राख उठा ली और अपने आँचल म बाँधनेलगी। च दर नेचुपचाप उसक ओर देखा, फर झपटकर उसनेबनती का आँचल पकडक़र राख छ न ली और गुराता हुआ बोला, ''बदतमीज कह ंक !...राख लेजाएगी-अभागी!'' और झट सेकपड़ेस हत राख फक द और आ नये सेबनती क ओर देखकर फर िसर झुका िलया। लहर म राख एक जहर लेपिनयालेसाँप क तरह लहराती हुई चली जा रह थी। बनती चुपचाप िससक रह थी। ''नह ंचुप होगी!'' च दर नेपागल क तरह बनती को ढकेल दया, बनती नेबाँस पकड़ िलया और चीख पड़ । चीख सेच दर जैसेहोश म आ गया। थोड़ देर चुपचाप रहा फर झुककर अंजिल म पानी लकेर महँुधोया और बनती केआँचल सेप छकर बहुत मधुर वर म बोला, '' बनती, रोओ मत! मरे समझ म नह ंआता कुछ भी! रोओ मत!'' च दर का गला भर आया और आँख म आँसूछलक आय-े''चुप हो जाओ, रानी! म अब इस तरह कभी नह ं क ँगा-उठो! अब हम दोन को िनभाना है, बनती!'' च दर नेत त पर छ ना-झपट म बखर हुई राख चुटक म उठायी और बनती क माँग म भरकर माँग चूम ली। उसकेहोठ राख म सन गय।े िसतारेटूट चुकेथे। तफूान ख म हो चुका था। नाव कनारेपर आकर लग गयी थी-म लाह को चुपचाप पयेदेकर बनती का हाथ थामकर च दर ठोस धरती पर उतर पड़ा...मदुा चाँदनी म दोन छायाएँिमलती-जुलती हुई चल द ं। गंगा क लहर म बहता हुआ राख का साँप टूट-फूटकर बखर चुका था और नद फर उसी तरह बहनेलगी थी जैसेकभी कुछ हुआ ह न हो।


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